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Monday, August 13, 2012
Tuesday, July 10, 2012
दहेज के लिए हर किसी से रेप का शिकार हुई युवती
व्यवहार य ह युग व्यवहार का है। आप कितने व्यावहारिक हैं, यह उस समय पता चलता है जब आप किसी मुसीबत में हों। मुसीबत यानी किसी सरकारी काम से किसी कार्यालय में जाना पड़ जाए तो आपको नानी-दादी याद आने लगती है। वहीं तो व्यवहार काम आता है। ऎसे स्थानों पर अक्सर टेबल के नीचे से हाथ का व्यवहार रिश्तों में मित्रता के भाव पैदा करता है। दफ्तरों में जिन कर्मचारियों को टेबल के नीचे हाथ के व्यवहार की कला आती है, उनका हाथ कभी खाली नहीं रहता और वे अपने साहबों के सामने टेबल पर शान से बैठ सकते हैं, क्योंकि सामने से साहब के टेबल के नीचे से आए हाथ को बंद करने की क्षमता उनमें होती है। हाथ होते भी नीचे से मिलाने के लिए ही हंै। हमारे लापरवाह किस्म के अधिकारी कभी टेबल के ऊपर से कुछ लेने की गलती करते हैं और फिर पछताते हैं। अब इस "अर्थ" के साथ भी दिक्कत है। यह कब बढ़ जाती है ,पता ही नहीं चलता। आदमी की नौकरी की कमाई जितनी हो उससे कई गुना अर्थप्राप्ति हो जाया करती है। अब वे पूछें कि इतनी दौलत कहां से आई तो बेचारा अफसर क्या जवाब दे? लक्ष्मी किसी से कहकर थोड़े ही आती है। "अर्थ" शब्द में ही कई अर्थ छिपे हुए हैं, जो जितनी कोशिश करे, उतने अर्थ मिल सकते हैं। अर्थ से कई अनर्थ भी हो जाते हैं, पर उससे घबराने की आवश्यकता नहीं। आखिर जो "कुछ" करेगा वही तो गलती करेगा। "अर्थ" के अर्थ को जो गंभीरता से समझेगा उसी से अनर्थ भी होगा। समझदार किस्म के लोग अक्सर यह कहते हैं कि यह जगत नश्वर है। आज तक कोई भी अपने साथ एक कौड़ी नहीं ले जा सका। जब ले जा नहीं सकते तो इकटा करने से क्या फायदा। जीवन का भरोसा भी नहीं। यदि इसका वेलीडिटी पीरियड होता तो उतने टाईम की एफ.डी करवा सकते थे, मगर यह संभव नहीं है। इसलिए मानव को धन संग्रह के लिए कभी लालची नहीं होना चाहिए। यह सैद्धांतिक बात है और हम जानते हैं कि इस तरह की बातें व्यक्ति तभी सोचता है, जब उसे कुछ कर दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता। असल बात तो व्यावहारिक होने की है। व्यवहार के बीच कई उत्प्रेरक आ चुके हैं। धन भी उनमें एक है। इसमें व्यवहार का क्या दोष? दहेज के लिए हर किसी से रेप का शिकार हुई युवती भोपाल।। मध्य प्रदेश के सागर जिले में दहेज की मांग पूरी न कर पाने के कारण एक 20 साल की युवती को ससुरालवालों के जुल्म का शिकार होना पड़ा। पिछले तीन साल से महिला को तबेले में जंजीरों से बांध कर रखा गया। इतना ही नहीं, इस दौरान उसके पति, रिश्तेदारों और यहां तक कि पड़ोसियों ने बार-बार उसके साथ बलात्कार किया। युवती पर जुल्म की इंतहा यह थी कि तीन सालों तक उसका रेप किया गया। इस साल मई में 50 हजार रुपये के लिए उसे एक महाजन को बेच दिया गया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके परिवारवालों के पास दहेज देने के लिए पैसे नहीं थे। युवती एक बार काफी बीमार हो गई, उस वक्त एक पड़ोसी उसे अस्पताल ले गया, लेकिन उसने भी अस्पताल ले जाते समय कथित तौर पर उसका रेप किया। युवती के साथ हुए इस बर्बर व्यवहार का उस समय पता चला, जब उसके एक रिश्तेदार ने सौभाग्य से उसे महाजन के घर पर देख लिया और इस बात की जानकारी उसके परिवारवालों को दी। 1 जुलाई को महिला अपने रिश्तेदारों के साथ राहतगढ़ पुलिस स्टेशन गई और इस अपने ऊपर हुए जुल्म ही यह भयावह कहानी सुनाई। पुलिस अधिकारी एस. पी सागर के अनुसार, महिला की शादी सागर जिले के पराश्री टूंडा गांव के आनंद कुर्मी के साथ पांच साल पहले हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद से ही ससुरालवालों ने दहेज के लिए उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। पीड़िता के किसान पिता रामकिशन ने बताया, 'शादी के समय ससुरालवालों ने एक लाख रुपये की मांग की थी, जो उन्हें दे दिए गए थे। लेकिन वह बार-बार चीजों की मांग करने लगे। उन्होंने कलर टीवी, मोटरसाइकल, ट्रैक्टर के साथ-साथ एक लाख रुपये नकद और मांगे। इसके लिए बार-बार उन्होंने मेरी बेटी के साथ मारपीट की।' रामकिशन ने कहा, जब मेरी बेटी गर्भवती हुई तो सास और परिवार के दूसरे लोगों ने मिलकर जबरन उसका गर्भपात करवा दिया। शादी के दो साल बाद उन लोगों ने कहा कि अब उनकी बेटी वहां नहीं रह सकती।' इसके बाद ससुरालवालों ने उसे तबेले में गाय-भैसों के साथ जंजीर से बांधकर रखा। कुछ दिन बाद उसका पति आनंद कुर्मी उसे पास के एक गांव खुरई में राम सिंह नाम के अपने रिश्तेदार के यहां छोड़ आया। राम सिंह और उसके बेटों नरेंद्र और लोकेंद्र ने युवती को घर में बंद करके रखा और करीब 20 दिन तक उसके साथ रेप किया। इसके बाद राम सिंह ने उसे एक दूसरे गांव महुना के महाजन द्वारका प्रसाद को उसे बेच दिया। यहां भी उसके साथ बार-बार रेप किया गया। इस बीच एक दिन महिला काफी बीमार पड़ गई तो महाजन का पड़ोसी खड़ग सिंह उसे अस्पताल ले गया, लेकिन रास्ते में उसने भी उससे रेप किया। बाद में महाजन के घर लौटते समय महिला को रिश्तेदार ने देख लिया और पहचान लिया। तब जाकर महिला के घरवालों को इसकी जानकारी मिली और किसी तरह उसे वहां से छुड़ाया गया। 28 जून को महिला को छुड़ाकर उसके घर वाले अपने पास ले आए और दो दिन बाद इस मामले की रिपोर्ट पुलिस मे लिखवाई। पुलिस ने महिला के पति, ससुरालवालों, रेप के दूसरे आरोपियों सहित महाजन के खिलाफ केस दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस ने तीन आरोपियों जिसमें युवती के साथ अस्पताल ले जाते समय रेप करने का आरोपी खड़ग सिंह भी शामिल है, को गिरफ्तार किया है। |
Monday, June 18, 2012
हर चीज का होता है एक जीवनचक्र
दलाल+पीडी+कर्मचारी=खूनी कारोबार
खून की खरीद-फरोख्त के धंधे में निजी ब्लड बैंक के कर्मचारी, दलाल और प्रोफेशनल डोनर (पीडी) की तिकड़ी काम कर रही है। प्रबंधन ब्लड बैंक चलाने के लिए दलालों को प्रश्रय दे रहे हैं और दलाल प्रोफेशनल डोनर का नेटवर्क तैयार कर खून उपलब्ध करा रहे हैं। इस तिकड़ी ने शहर में रक्त का अवैध बाजार खड़ा कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि अधिकतर निजी ब्लड बैंकों का काम प्रोफेशनल डोनर के बिना नहीं चलता। दलाल पीडी का नेटवर्क तैयार करते हैं और इन्हें ब्लड बैंक तक लाते हैं। पीडी चंद रूपयों के लालच में खून बेच देते हैं। लालच का रक्तदान रक्तदान के नियमों के मुताबिक कोई रक्तदाता एक बार रक्तदान करने के बाद तीन माह बाद ही अगला रक्तदान कर सकता है। पर पीडी के मामले में सेहत की हिफाजत के इस नियम को भी ब्लड बैंक व दलाल ताक पर रख देते हैं। ब्लड बैंक की जरूरत के कारण कई बार पीडी सप्ताह भर में या 15 दिन में ही दोबारा ब्लड दे देता है। ब्लड बैंक भी एचबी बढ़ाने के लिए पीडी को आयरन की गोलियां खिलाते रहते हैं। सेहत के लिहाज से यह खतरनाक प्रैक्टिस है। एक बार में ब्लड डोनर का अधिकतम 300 एमएल रक्त ही लिया जा सकता है, लेकिन ब्लड बैंक के धंधे का एक काला सच और भी सामने आया है। एक ब्लड बैंक के कर्मचारी ने बताया कि कई बार प्रोफेशनल डोनर की जानकारी के बिना 300 की जगह 500 एमएल तक ब्लड निकाल लिया जाता है। जांच का शॉर्टकट जब कोई डोनर ब्लड बैंक जाता है, तो उसके रक्त के नमूने के पांच टेस्ट होते हैं। इसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, वीडीआरएल और मलेरिया की जांच शामिल हैं। सामान्य तौर पर इन जांचों की प्रक्रिया पूरी होने में तीन-चार घंटे लगते हैं। इससे पता चलता है कि रक्तदाता का ब्लड अन्य व्यक्ति को चढ़ाने लायक है या नहीं? पर कुछ निजी ब्लड बैंकों में शॉर्टकट अपनाया जाता है। इससे मरीज को संक्रमित ब्लड चढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर नशेड़ी, ऑटो चालक, पान वाले आदि पीडी के रूप में काम करते हैं। नशेड़ी पीडी या किसी बीमारी से ग्रस्त डोनर का ब्लड चढ़ जाए तो इससे मरीज को संक्रमण का खतरा हो सकता है। मरीज को बैठे-बिठाए कोई अन्य बीमारी हो सकती है। निचले कर्मचारी भी शामिल कुछ जगह अस्पताल और नर्सिüग होम में काम करने वाले गार्ड, निचले स्तर के कर्मचारी भी इस धंधे में शामिल होते हैं। भोपाल के सरकारी ब्लड बैंकों के आसपास भी इस तरह के दलालों की उपस्थिति बताई जाती है। निजी ब्लड बैंक के अलावा ये दलाल सरकारी अस्पतालों में भी घुसपैठ बनाने की कोशिश करते हैं। स्वैच्छिक रक्तदान की कमी के कारण इन तत्वों का धंधा चल रहा है। मोबाइल पर चलता है पूरा नेटवर्क ब्लड की खबर के साथ जोड़ खून के दलालों का नेटवर्क मोबाइल पर चलता है। दलाल सरकारी और प्रायवेट अस्पतालों के पार्किüग कर्मचारी, चपरासी, गार्ड, सफाईकर्मी, आसपास की चाय और पान की दुकान वालो से संबंध स्थापित करते हैं। इसके बाद इन्हें अपना मोबाइल नंबर दे देते हैं। साथ ही यह भी बताते हंै कि अगर किसी को ब्लड की जरूरत हो तो संपर्क कर लेना, इसके बदले सूचना देने वाले को कमीशन देने का प्रलोभन भी दिया जाता है। |
Monday, June 4, 2012
ग्रामीण विकास के रोड़े
वैसे तो भारत में ग्राम पंचायतों की अवधारणा सदियों पुरानी है, लेकिन आजादी के बाद देश में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक अधिकार देकर उसे मजबूत बनाने की कोशिश की गई है। खासकर संविधान के 73वें संशोधन में पंचायतों को वित्तीय अधिकारों के अलावा ग्रामसभा के सशक्तिकरण की दिशा में अनेक योजनाएं बनीं। यही वजह है कि आज देश के लगभग सभी राज्यों में पंचायतों के चुनाव नियमित हो रहे हैं। वहीं केंद्र सरकार इन पंचायतों के विकास लिए अपने खजाने से सालाना अरबों रुपये आवंटित कर रही है ताकि गांवों का सही विकास हो सके, लेकिन इतनी धनराशि आने के बावजूद देश में गांवों की बदहाली दूर नहीं हो पा रही है। असल में ग्राम स्वराज और ग्राम्य विकास का जो सपना महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने देखा था वह अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। जिस तरह संसदीय लोकतंत्र में देश के सर्वोच्च प्रतीक संसद और विधानसभाओं का महत्व है उसी तरह ग्रामसभा लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई है। इसे सामान्य शब्दों में हम ग्राम संसद भी कहते हैं, लेकिन कमजोर अधिकारों के कारण ग्रामसभा उस तरह मजबूत नहीं हो पाई जैसी परिकल्पना राष्ट्रपिता और लोकनायक जयप्रकाश ने की थी। जिस तरह सांसद और विधायक करोड़ों रुपये की निधि का इस्तेमाल सही तरीके से नहीं करते उसी तरह पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि भी कमोबेश उसी राह पर चल रहे हैं।
ग्राम स्वराज का असल मकसद तभी पूरा होगा जब गांवों की सत्ता में ग्रामीणों को उचित भागीदारी मिले और विकास से जुड़े तमाम फैसले लेने का अधिकार ग्राम सभा को हो। उदाहरण के तौर पर गांव में सड़कें कहां बनानी हैं, ग्रामसभा की जमीन का किस तरह व्यावसायिक इस्तेमाल हो, इसके अंतिम निर्णय का अधिकार कलेक्टर और बीडीओ को नहीं, बल्कि पंचायत के सरपंच और प्रधान को मिलना चाहिए। संविधान के 73वें संशोधन के बाद दिल्ली से जारी होने वाली धनराशि पंचायतों के विकास के लिए पहुंचती है। अमूमन हर पंचायत में पांच साल के दौरान लाखों रुपये मिलते हैं। अगर इन पैसों का सही जगह इस्तेमाल किया जाए तो देश के समस्त गांवों की तस्वीर बदल सकती है, लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था में ऐसा नहीं हो पा रहा है, क्योंकि पंचायतों को मिले रुपये कहां खर्च किए जाएं यह फैसला ग्रामीणों की सहमति के बगैर नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पंचायतों के प्रधान और सरपंच अपने चहते लोगों और अधिकारियों से साठगांठ कर उन योजनाओं को मंजूरी दिलाते हैं जिसमें बंपर कमीशन काटने की गुंजाइश होती है। यही वजह है कि देश के अधिकांश राज्यों में ग्रामसभा को निरंतर कमजोर करने की साजिश की जा रही है। इस मामले में बिहार का उदाहरण लिया जा सकता है। राज्य के तकरीबन सभी गांवों में अक्षय ऊर्जा योजना के नाम पर ग्राम प्रधानों ने सौर बिजली लगाने की योजना बनाई।
बावजूद इसके बिहार के गांवों में अंधेरा अब भी कायम है, क्योंकि लगभग नब्बे फीसदी सोलर लाइटें खराब हो चुकी हैं। इस तरह बड़े पैमाने पर सोलर लाइटें लगाने की एकमात्र वजह थी मोटा कमीशन। अगर विकास योजनाएं ग्रामीणों की सहमति से बनाई जाए तो इस तरह की मनमानी और लूटपाट को रोका जा सकता है। गांवों का विकास ग्रामीणों की मर्जी से होना चाहिए ऐसा कहने के पीछे तर्क यह है कि ग्रामसभा को अधिक से अधिक विकेंद्रीकृत किया जाए। अगर संभव हो तो उसे वार्ड सभा और टोला सभा में तब्दील किया जाए, क्योंकि जिस तरह गांव का प्रधान कुछ हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह एक पंचायत में चुने जाने वाले दर्जनों पंचायत सदस्य और पंच भी सैकड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनके साथ भेदभाव किया जाना ठीक नहीं। इस तरह के सौतेले बर्ताव से भला हम गांवों का सर्वागीण विकास कैसे कर पाएंगे? दिल्ली स्थित सेंटर फॉर सोशल इंपावरमेंट ऐंड रिसर्च जो ग्रामीण विकास के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने के अभियानों से जुड़ी है। इस संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि पंचायतों के चुनाव में भी धनबल और बाहुबल का उपयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह होने लगा है। अध्ययन से पता चलता है कि पिछले साल उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव में सैकड़ों प्रत्याशी ऐसे थे जिनके पास करोड़ों की चल-अचल संपत्ति थी।
पंचायतों के चुनाव में मारामारी का आलम यह था कि ग्रामप्रधान और जिला पंचायत की एक सीट के लिए औसतन डेढ़ दर्जन उम्मीदवारों ने नामजदगी के पर्चे भरे। सीएसईआर के अनुसार उत्तर प्रदेश में हुए पंचायतों के चुनाव में ग्रामप्रधान के उम्मीदवारों ने जहां पांच लाख से सात लाख रुपये खर्च किए वहीं जिला पंचायत के लिए उम्मीदवारों ने औसतन दस लाख से सोलह लाख रुपये पानी की तरह बहाए। लोकतंत्र की नर्सरी कहे जाने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव में धन की यह धार सकारात्मक संकेत नहीं है। इन सबके बावजूद ग्राम विकास की उम्मीदें खत्म नहीं होतीं। निश्चित तौर पर बदलाव अचानक नहीं होता, लेकिन इसकी शुरुआत तो हो ही सकती है। उम्मीदों की ऐसी ही एक किरण कृष्ण नगरी मथुरा के मुखराई पंचायत में देखने को मिली। गोवर्धन तहसील से सटे इस पंचायत के प्रत्येक जनशिकायतों का समाधान ग्रामसभा की खुली बैठकों में ही किया जाता है। कुछ अरसे पहले यहां के ग्रामीण भी अन्य गांव वालों की तरह मानते थे कि गांव के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। यही वजह था कि यहां के लोग अपने प्रधान और जिला पंचायत के सदस्यों से उनकी कार्यशैली के बाबत कोई पूछताछ नहीं करते थे। गांव के मुखिया विकास की कौन-कौन सी योजनाएं संचालित करते हैं, ग्राम सभा की बैठकें नियमित क्यों नहीं होती हैं आदि बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं था।
हालांकि अब ऐसा नहीं है, क्योंकि मुखराई लोग ग्रामीण विकास को लेकर पूरी तरह सजग हो चुके हैं। यहां के कुछ लोग सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नित नई जानकारियां हासिल कर रहे हैं। मुखराई के लोगों का मुख्य पेशा कृषि और पशुपालन है। हालांकि कुछ समय पहले नीलगायों की वजह से यहां के किसान काफी त्रस्त थे। ग्रामीणों ने इस बाबत लिखित सूचना जिला प्रशासन को पूर्व में भी देते रहे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। नतीजतन यहां के लोगों ने इस समस्या को ग्राम सभा की खुली बैठकों में उठाया और उसके बाद यह मामला राज्य के शीर्ष अधिकारियों के पास पहुंचा। आपसी एकजुटता की वजह से यहां की ग्रामसभा आज पूरी तरह सशक्त बन चुकी है। इसे ग्रामीणों की चेतना का ही असर कहें कि मुखराई के ग्राम प्रधान अपने विकास कार्यो का लेखा-जोखा और एक-एक पैसे का हिसाब ग्राम सभा की बैठकों में देते हैं। बेशक देवभूमि मथुरा की मुखराई पंचायत देश भर के ग्राम सभाओं के लिए एक मिसाल है। अपनी मुखरता से मुखराई के लोग ग्रामीण विकास की दिशा में एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं। |
धुंए की धीमी मौत के तथ्य
1- धूम्रपान (smoking) करते समय आप निकोटिन, पायरिडीन, अमोनिया, कार्बन मोनो ऑक्साइड, फ्यूरल, फर्माल्डिहाइड, एसीटोन, आर्सेनिक एसिड जैसे 4800 घातक रसायनों (lethal chemicals) को अपने फेफड़ों और खून मे भरते हैं जिनमें से 69 (International Agency For Research On Cancer के अनुसार 43) कैंसर के लिए सीधे उत्तरदायी हैं। |
Sunday, May 27, 2012
बच्चा जब पूछे कुछ ऐसा...
रेव का रोग
| एक रेव पार्टी में सच्चाई यह है कि महानगरों के धनाढ्य तबकों तक सिमटे मौज-मस्ती के ऐसे आयोजन अब छोटे शहरों में भी अपने पांव पसारने लगे हैं। नशे में डूबे चरम मौज-मस्ती के लिए जाने जाने वाले इन आयोजनों में जैसा भोंडा प्रदर्शन होता है, वह किसी भी समाज और संस्कृति को अंधी खाई की ओर ले जाने वाला है। मादक पदार्थों के सेवन के बाद झूमते युवाओं की दुनिया रेव पार्टी के उस हॉल के भीतर सिमटी होती है, जहां उन्हें अपनी यौन ग्रंथियों के सार्वजनिक प्रदर्शन की भी खुली छूट होती है। दरअसल, हाल के वर्षों में समाज के एक तबके के बीच सार्वजनिक जीवन में पैसे के प्रदर्शन की जो प्रवृत्ति पैदा हुई है, उसमें मनोरंजन का रास्ता इसी तरह के अतिवादी ठिकानों की ओर जाता है। ऐसी पार्टियों का आयोजन अखबारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों या इंटरनेट पर 'फ्रेंडशिप क्लब' और 'दोस्त बनाएं' जैसे विज्ञापनों की आड़ में और गोपनीय मोबाइल संदेशों के जरिए किया जाता है। इसके आयोजक जरूरत से ज्यादा पैसे होने से उपजी नकारात्मक ग्रंथियों को भुनाने के मकसद से अपना धंधा चलाते हैं। उनके जाल में ऐसे युवा आसानी से फंस जाते हैं, जिनके पास पैसे की कमी नहीं होती और जिनके लिए नशे में तमाम वर्जनाओं को ताक पर रख देना ही मनोरंजन है। विडंबना है कि ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ न कोई कार्रवाई हो पाती है न इन्हें छापने वाले समाचार माध्यम अपनी जिम्मेदारी समझ पा रहे हैं। अब तक जितनी जगहों पर पुलिस ने छापे मारे, वहां अश्लील हरकतों में लिप्त सौ से ज्यादा युवा पकड़े गए और भारी मात्रा में चरस, अफीम आदि नशीले पदार्थ बरामद हुए। जाहिर है, ऐसी पार्टियां मौज-मस्ती के नाम पर नशाखोरी, देह-व्यापार और दूसरी गैरकानूनी हरकतों के लिए जगह मुहैया कराती हैं। यह सही है कि पश्चिमी देशों से आयातित इस शौक का दायरा अभी समाज के एक छोटे तबके तक सीमित है, जिसके पास खूब पैसा है। वह अपना हर पल ऐसे माहौल में बिताना चाहता है जहां आर्थिक या सामाजिक, किसी भी तरह के प्रभुत्व से उपजी कुंठाओं के प्रदर्शन की खुली छूट हो। उसे व्यापक समाज या मानवीय संवेदनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। मगर चिंता की बात है कि अगर इसका दायरा फैलता है तो बाकी समाज भी इसके असर से अछूता नहीं रहेगा। समाज का एक तबका अपने मनोरंजन के लिए कोई खास तरीका अपनाता है तो इस पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर यह कोई सकारात्मक असर छोड़ने और व्यापक स्वीकार्यता के बजाय न सिर्फ नकारात्मक पहलुओं की बुनियाद पर खड़ा होता, बल्कि उसको बढ़ावा देता है तो निश्चित तौर पर यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। रेव पार्टियां इस कसौटी पर कहां हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनमें चोरी-छिपे शामिल होने वाले तमाम पक्ष खुद एक अपराधबोध से भरे रहते हैं। यह बेवजह नहीं है कि जब पुलिस छापों में लोग पकड़े जाते हैं तो बचाव के लिए उनके पास कोई दलील नहीं होती। ऐसे आयोजनों के ठिकाने प्रशासन की नजर से ओझल नहीं हैं। इससे विचित्र क्या होगा कि बड़े होटलों तक में इनका इंतजाम होने लगा है। अगर संजीदगी दिखाई जाए तो रेव पार्टियों के आयोजन पर लगाम कसना मुश्किल नहीं है। शिक्षा की मुश्किलें कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि शिक्षा का अधिकार कानून निजी स्कूलों पर भी लागू होता है। मगर सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को मानने के लिए उन्हीं स्कूलों को बाध्य किया जा सकता है जो सरकार के शिक्षा विभाग में पंजीकृत हैं। देश में बिना पंजीकरण के चलने वाले स्कूलों की तादाद इतनी बड़ी है कि कई राज्य सरकारों के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल पंजाब में नौ हजार आठ सौ में से तीन हजार आठ सौ स्कूल बिना पंजीकरण के चल रहे हैं। समझा जा सकता है कि इस तरह कितने सारे निजी स्कूल पंजीकरण की तकनीकी अनिवार्यता पूरी न करने का फायदा उठा रहे होंगे। इसलिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के सभी स्कूलों को अपने राज्य के शिक्षा विभाग में अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने का निर्देश दिया है, ताकि वहां भी इस कानून पर अमल सुनिश्चित कराया जा सके। इसके तहत सभी स्कूलों के लिए राज्य के शिक्षा विभाग की ओर से तय की गई कसौटियों और शर्तों को पूरा करने के बाद पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है। कमी पाए जाने पर विभाग संबंधित स्कूल का पंजीकरण रद्द कर सकता है। दरअसल, जब से शिक्षा व्यवसाय का एक बेहतर माध्यम बन गई है, जहां-तहां स्कूल खुलने लगे हैं। इसमें बहुत सारे लोग स्कूल खोलने के लिए तय मानकों का पालन करना जरूरी नहीं समझते। यही वजह है कि बहुत सारे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, प्रयोगशाला, पुस्तकालय आदि के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। बहुत सारे स्कूलों के भवन तक आधे-अधूरे बने हैं। उनमें शिक्षकों की भर्ती वगैरह के मामले में भी तय मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता। ऐसे स्कूलों का इरादा पहले फीस से कमाई करने और फिर उससे जरूरी संसाधन जुटाने का होता है। जब यह स्थिति बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर दिखाई देती है तो छोटे शहरों और कस्बों में क्या हालत होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है, ऐसे स्कूल पंजीकरण से बचने की कोशिश करते हैं। इसमें स्कूल खोलने संबंधी लचीले नियम-कायदों से भी उन्हें बल मिलता है। ऐसे में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के ताजा आदेश का वे कितना पालन कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। जब से छह से चौदह साल के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ है, सबसे बड़ी उलझन इस बात को लेकर रही है कि निजी स्कूलों में इन नियम-कायदों को सहजता से कैसे अमल में लाया जाए। महज मुनाफे को अपना मकसद मानने वाले निजी स्कूल इस कानून के तहत पचीस फीसद सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करने के प्रावधान से बचने की कोशिश करते रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अदालत का भी सहारा लिया था। इस तरह केवल निजी स्कूलों में इन कानूनों पर अमल से समस्या का समाधान निकालना आसान नहीं है। हकीकत है कि देश भर में शिक्षकों के लाखों पद खाली पड़े हैं। जहां भर्तियां हो भी रही हैं, वहां प्रशिक्षित शिक्षकों के बजाय बहुत कम वेतन पर शिक्षा-मित्र या अप्रशिक्षित लोगों से काम चलाया जा रहा है। बहुत सारे स्कूल बिना भवन के चल रहे हैं। नए स्कूल खोलना कठिन बना हुआ है। स्कूलों में अगर बुनियादी ढांचे से लेकर शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात और शैक्षिक गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो शिक्षा का अधिकार कानून महज औपचारिकता बन कर रह जाएगा। |
Saturday, May 26, 2012
प्रशंसा जरूर कीजिए, मगर...
प्रशंसा जरूर कीजिए, मगर...
अकेले पड़ते ईमानदार लोग
Friday, May 25, 2012
आधा पानी बर्बाद हो रहा है शहरों में
नई दिल्ली : सरकार ने माना है कि शहरी इलाकों में पाइपलाइन में लीकेज होने, पानी के अवैध कनेक्शन और चोरी आदि की घटनाओं से तकरीबन 50 परर्सेंट पानी की बर्बादी होती है। जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल ने गुरुवार को लोकसभा में कहा, कई स्टडीज से पता चलता है कि शहरी इलाकों में 30 से 50 पर्सेंट पानी की बर्बादी होती है। इसे नॉन रेवेन्यू वॉटर (एनआरडब्ल्यू) कहा जाता है। उन्होंने कहा कि 2008-09 के दौरान 28 शहरों में की गई पायलट स्टडी से पता चला कि औसत एनआरडब्ल्यू की मात्रा 39 पर्सेंट है। बंसल ने कहा कि शहरी विकास मंत्रालय ने जानकारी दी है कि पाइपलाइन में लीकेज और चोरी आदि की अन्य घटनाओं से पानी की बर्बादी होती है। 00000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000 एक चरवाहे को कहीं से चमकीला पत्थर मिल गया। चमकीला पत्थर लेकर वह बाजार में गया। फुटपाथ पर बैठे दुकानदार ने वह पत्थर उससे आठ आने में खरीदना चाहा, परन्तु उसने उसे बेचा नहीं। आगे गया तो सब्जी बेचने वाले ने उसका मूल्य लगाया दो मूली। कपड़े की दुकान पर गया तो दुकानदार ने उसका दाम लगाया- थान भर कपड़ा। चरवाहे ने फिर भी नहीं बेचा, क्योंकि उसका मूल्य लगातार बढ़ता जा रहा था। तभी एक व्यक्ति उसके पास आया और बोला, "पत्थर बेचोगे?" "बेचूंगा, सही दाम मिला तो?" "दाम बोलो" "हजार रूपए" "दिन में सपने देखते हो चमकीला है, तो क्या हुआ।" कहकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया। वह जोहरी था। समझ गया कि चरवाहा पत्थर का मूल्य नहीं जानता। वह चला गया कि फिर आता हूं। उसके जाते ही एक दूसरा जोहरी आया। पत्थर को देखते ही उसकी आंखें खुल गई। दाम पूछा, तो चरवाहे ने बताया डेढ़ हजार रूपए। जोहरी ने डेढ़ हजार में हीरा खरीद लिया। अब पहले वाला जोहरी उसके पास आया और बोला, "कहां है तुम्हारा पत्थर?" चरवाहे ने कहा, वह तो बेच दिया। "कितने में?" "डेढ़ हजार रूपए में।" जोहरी बोला, "मूर्ख आदमी, वह हीरा था जो लाखों का था। तुमने कौड़ी के भाव बेच दिया। चरवाहा बोला, "मूर्ख मैं नहीं, तुम हो। वह तो मुझे भेड़ चराते हुए मुफ्त में मिला था। मैंने उसे डेढ़ हजार में बेच दिया । लेकिन तुमने उसका मूल्य जानते हुए भी घाटे का सौदा किया। मूर्ख तुम हो या मैं।" जोहरी के पास अब कोई जवाब न था। 000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000 देखते ही देखते कसम से आदमी कितना बदल जाता है, इसका अनुमान हमें उनसे मिलने के बाद हुआ। वे हमारे बचपन के भायले थे। भायले भी क्या, जिगर के छल्ले थे। जवानी की बात है। वे हंसते थे तो मानो हरसिंगार के फूल झर रहे हों। वे चलते थे तो मानो एक मस्त अरबी घोड़ा चल रहा हो। वो नाचते थे तो मानो सारी कायनात को अपने संग नचा रहे हों। उस जमाने में जब आदमी की उम्र इश्क-हुस्न पर शेर कहने की होती थी, तब वे कहा करते थे, "देखते ही देखते दुनिया से उठ जाऊंगा मैं; देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे।" उनके मुंह से यह शेर सुनकर हम धक से रह जाते, क्योंकि भरी जवानी में दुनिया से उठने की बात कौन करता है। और सचमुच ऎसा ही हुआ। वे दुनिया से तो नहीं उठे, लेकिन दुनियादारी से उठ गए। दुनियादारी यानी यारबाजी, मस्ती, हंसना-हंसाना और वह सब, जो दुनिया के लिए जरूरी होती है। ऎसा नहीं कि उन्होंने ब्याह नहीं किया। ऎसा भी नहीं कि उन्होंने बाल- बच्चे पैदा न किए। ऎसा नहीं कि उन्होंने घर नहीं बनाया। उन्होंने इस जहान में वे सारे काम किए, जो एक इंसान करता है, पर बावजूद वे हमें दुनिया से उठे-उठे नजर आए। दुनिया से कटने और दुनिया से उठने में अन्तर है। दुनिया से कटने वाले संन्यासी कहलाते हैं और दुनिया से उठने वाले पैगम्बर। लेकिन हम हैरत में पड़ गए कि वे दुनिया से कटने और उठने के बावजूद न संन्यासी बने और न पैगम्बर। अभी एक दिन टकरा गए। हमने पूछा, कैसे हो? उन्होंने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न किया, तुम्हें कैसा लगता हूं? हमने कहा, "ठीक ही लग रहे हैं।" वे बोले, "तुम्हें क्या पता कि मैं ठीक हूं?" हमने कहा, "हमने तो अनुमान लगाया। बेटे-बेटी का ब्याह निपटा दिया। ठीक से नौकरी कर ली। रिटायरी अच्छी कट रही है। घर में कार है। अपनी मरजी के मालिक हो। और क्या चाहिए।" वे बोले, क्या सच वही है जो दिखलाई देता है। भ्रम भी तो सच हो सकता है। मैं बड़ा दुखी हूं। इतना दुखी कोई नहीं था। उनकी बातें सुन हमने कहा, "दुनिया में थोड़ा-थोड़ा दुखी तो सभी हैं। इसीलिए तो तथागत ने उस मृत पुत्र की मां से कहा था कि जाओ उस घर से एक मुटी सरसों ले आओ, जिस घर में कोई दुखी न हो।" वे बोले, मैं तो जन्म से ही दुखी हूं। हमने कहा, यह असंभव है। क्या आपके जीवन में कभी सुख नहीं आया। वे बोले, मेरा तो जन्म ही एक दुर्घटना है। उनका दार्शनिक अंदाज में कहा गया यह वाक्य सुनकर हमारी बोलती बंद हो गई। लेकिन मन ही मन हमने एक शेर कहा, "जो होनी थी वो बात हो ली कहारों, चलो ले चलो इनकी डोली कहारों।" 0000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000 लाखों की खदान, पर गरीब इंदौर/भोपाल। जिनके पास दो वक्त की रोटी का भरोसा नहीं है, वह लाखों की खदान के मालिक हैं। लाखों रूपए का खनिज उनकी खदान से निकलकर बाजार में बिक रहा है, लेकिन उनके आशियाने अब भी को मकान ही हैं। क्या यह संभव है कि लाखों की खदानों के मालिक की हालत ऎसी हो, लेकिन अपने प्रदेश में है। पन्ना जिले के दो मजदूर परिवार कागजों में खदानों के मालिक हैं, लेकिन खदानें दीगर लोगों के पास हैं और वे बिचौलिया बनकर खदान से निकले खनिज को कृषि राज्य मंत्री बृजेद्र प्रताप सिंह के परिजनों को बेच रहे है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह अपने प्रदेश में भी जनजातीय वर्ग, दलितो, पिछडों और गरीबो को भूखंड व खदानों के पटटे सिर्फ इसलिए दिए जाते है ताकि उनकी रेाजी-रेाटी का इंतजाम होने के साथ जीवन स्तर में कुछ सुधार आ सके, मगर सरकारेां की मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। इसका उदाहरण है लखुआ अहिरवार व दयाराम। गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले लखुआ व दयाराम के कोटमी बंडोरा में खदान के पटटे हैं, यह पटटे 10-10 वर्ष के लिए दिए गए है, मगर वे सिर्फ कागजी। ऎसा इसलिए क्योंकि इन दोनों की ही खदानों का संचालन कोई और कर रहा है। दयाराम की खदान को नत्थू सिंह व लुखआ की खदान का संचालन जितेंद्र सिंह कर रहा है। इन दोनों ने सादे कागज पर अनुबंध कर दयाराम व लखुआ से खदाने आठ हजार व नौ हजार रूपए वार्षिक पर अपने कब्जे में ले रखी है। अवैध खनन के दाग मंत्री के दामन पर लखुआ और दयाराम की खदानों से निकलने वाले खनिज को नत्थू सिंह व जितेंद्र सिंह राधिका टेडर्स को बेचते है। यह राधिका टेडर्स राज्य के कृषि राज्यमंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह के छोटे भाई लोकेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी अंजू सिंह की है। नत्थू व जितेंद्र की अधिकृत फर्म नहीं है और न ही उसका पंजीयन है, फिर भी वह धडल्ले से गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले दयाराम व लखुआ की खदानों का खनिज बेचे जा रहे है। राधिका टैडर्स खरीदे गए खनिज को राज्य के बाहर भेजता है। जिम्मेदारों ने माना हो रही गड़बड़ी खदान की लीज किसी भी स्थिति में हस्तांतरित नहीं की जा सकती है, अगर कोई खदान चलाने की स्थिति में नहीं है तो उसे खदान सरकार को ही वापस करना होगी। किसी दूसरे को देना वैधानिक नही है। शैलेंद्र सिंह, खनिज सचिव भाई की पत्नी की कंपनी कृषि राज्यमंत्री बृजेद्र प्रताप सिंह से जब इस बारे में बातचीत की गई तो उन्होंने माना कि राधिका टेडर्स उनके भाई की पत्नी के नाम पर है और खनिज का करोबार किया जा रहा है। साथ ही वे बताते है कि राधिका टेडर्स खनिज की खरीदी नत्थू सिंह व जितेंद्र से करते है, इन दोनों की फर्म पंजीकृत नहीं है, लिहाजा ऎसी स्थिति में राधिका टेडर्स द्वारा दोनों से खरीदे गए खनिज पर एक प्रतिषत अतिरिक्त विRयकर का भुगतान किया जाता है। सिंह के मुताबिक ऎसा प्रावधान है कि गैर पंजीकृत संस्था से माल खरीदने पर एक प्रतिषत अतिरिक्त विRयकर जमा किया जाना चाहिए। इस नियम का पालन किया जा रहा है। सिंह स्वीकारते है कि राधिका टेडर्स सीधे तौर पर दयाराम व लखुआ से खनिज की खरीदी नहीं करता। उनके पास इस बात का कोई जवाब नही है कि राधिका टेडर्स के दस्तावेजों में विRेता के तौर पर नत्थू व जितेंद्र का नाम दर्ज न होकर दयाराम व लखुआ का ही दर्ज है। इतना ही नहीं खरीदे गए माल का भुगतान किस रूप में अर्थात नगद या चैके द्वारा होता है, इसका भी वे खुलासा नहीं कर पाए। |