Monday, August 13, 2012

ऊर्जा बढ़ाएं चार स्टेप्स


खुद को तरोताजा करने के लिए चाय, कॉफी की चुस्की या झपकी लेने की जरूरत नहीं है। आप योग से खुद को चुस्त-दुरुस्त कर सकते हैं। यह साबित हो चुका है कि योग से न सिर्फ थकान कम होती है, बल्कि कार्टिसोल हार्मोन भी संतुलित होता है, जिसकी कमी से हमारी एनर्जी खत्म हो जाती है। नीचे दिए गए चार स्टेप करके आप अपनी एनर्जी वापस पा सकते हैं। आप चारों स्टेप की हर पोजीशन में 10 बार गहरी सांस जरूर लें। दूसरी साइड से भी इन पोजीशन को दोहराएं। दिन मंे तीन बार दोनों साइड से इन स्टेप को करें।

1.पुश-अप की पोजीशन में आएं और कमर वाले हिस्से को
ऊपर उठाएं। पांच बार लंबी सांस लें और दाएं पैर को जितना हो सके, उतना ऊपर तक ले जाएं। धीरे-धीरे बाएं हाथ को कोहनी तक फर्श पर लाएं और इसके बाद दोनों हथेली को पूरी तरह फर्श पर टिका लें।

2.फ्दोनों हाथ सीधे करके सामने की तरफ इस तरह झुकें कि 90 डिग्री का कोण बन जाए। दाएं पैर को ऐसे रखें कि वो दोनों हाथों के बीच में हो। बायां पैर हाथों की सीध में उठाकर सीधा करें, इससे शरीर का सारा वजन अपने आप दाएं पैर पर आ जाएगा। दोनों हाथ और कमर का हिस्सा सीधे और जमीन के समानांतर होने चाहिए।

3.दोनों हाथ और पैर जमीन पर टिकाएं। कमर का हिस्सा बाईं तरफ घुमाएं और बायां हाथ छत की तरफ उठा लें। बायां पैर पीछे की तरफ मोड़ लें और बाएं हाथ से उसे कमर के पीछे से पकड़ें। इस पोजीशन में आपका दायां हाथ और दायां पैर जमीन पर टिका रहना चाहिए।

4.खुद को वापस उसी पोजीशन मंे ले आएं, जो आपने तीसरी पोजीशन की शुरुआत में की थी। अपनी मुख्य मांसपेशियों का इस्तेमाल करते हुए खड़े हो जाएं। बायां तलवा दाईं जांघ पर रखें और दोनों हाथ सीधे ऊपर उठा लें।


नींद हमेशा आरामदायक नहीं होती


बच्चे लगातार कई घंटे तक खेलते हैं तो उन्हें थकान नहीं होती। लेकिन शरारत करने पर स्कूल में टीचर ने अगर खड़े रहने के लिए कह दिया तो समझ में आ जाता है कि सीधे खड़े रहना सजा क्यों है। बचपन ही नहीं, लगभग हर उम्र में काफी देर तक लगातार खड़े रहने वालों का हाल कुछ ऐसा ही होता है।
 
दरअसल हमें खड़े रहना, बाकी सभी चीजों से ज्यादा थकाता है। आपने भी लोगों को कहते सुना होगा कि 'मैं कई किलोमीटर पैदल चल सकता हूं, लेकिन सिर्फ एक घंटे खड़े होने से थक जाता हूं।' खड़े रहने से जो थकान होती है, उसकी वजह शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी है। बगैर कोई
काम किए खड़े होने की स्थिति में हम बोरियत के शिकार होते हैं। हमारे दिमाग का सारा फोकस सीधे खड़े होने पर रहता है।
पहला कारण
 
खड़े रहते हुए आप कुछ नहीं कर रहे, इसके बावजूद ऐसा लगता है कि यह आपको पैदल चलने से ज्यादा थका रहा है। इससे जुड़ी एक अवधारणा 'गैलरी फीट' है, जिसमें बताया गया है कि किसी आर्ट गैलरी या म्यूजियम में चलना, वॉक करने से कहीं ज्यादा थकाने वाली कवायद होती है। ऐसा क्यों होता है? यहां इसके कुछ जवाब दिए जा रहे हैं, जो कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़े मालूम होते हैं।
खड़े रहना आराम करना नहीं: जब हम सीधे खड़े होते हैं, तो हमारा शरीर धीरे-धीरे आगे-पीछे होता रहता है और दबाव पड़ता है टखने पर। इसलिए हमें खड़े रहने की प्रक्रिया के दौरान अपनी मांसपेशियों में तालमेल बैठाना पड़ता है।
फ्सारा दबाव कुछ ही मांसपेशियों पर: जब हम खड़े होते हैं, तो कुछ मांसपेशियों पर ही ज्यादा वक्त तक दबाव बनता है। इसी वजह से पिंडली की मांसपेशियों में थकान होना लाजिमी है। पैदल चलने की प्रक्रिया में कई मांसपेशियों की भूमिका रहती है, ऐसे में दबाव बंट जाता है।
चलने में आराम:जब हम चलते हैं, तो एक वक्त में एक पैर का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में दूसरा पैर और उसकी मांसपेशियों को आराम मिलता रहता है। पैर को जितना आराम मिल रहा है, वह भले कम हो, लेकिन कुल मिला कर यह काफी होता है।
 
दूसरा कारण
खड़े होने के दौरान दिल इतना सक्षम नहीं होता कि टखनों, पिंडलियों और पांव से वापस पर्याप्त खून पंप कर सके, इसलिए इसमें पुराना खून एकत्र होता रहता है। ऑक्सीजन, न्यूट्रिएंट देने वाला और टॉक्सिन हटाने वाला ताजा खून न होने की वजह से मांसपेशियां दर्द महसूस करने लगती हैं। वजह सीधी-सी है। ज्यादा काम और कम भोजन का सीधा मतलब है कि आपकी मांसपेशियां तकलीफ महसूस करेंगी। जब आप चलते हैं तो आपकी मांसपेशियों के लिए इस बढ़े हुए काम की वजह से यह आपके हार्ट की तरफ खून का प्रवाह बना रहता है और मांसपेशियों को हर हाल में ताजा खून मिलता रहता है।
जब आप अपना कामकाजी दिन पूरा होने के बाद पैरों पर गौर करेंगे, तो देखेंगे कि उनमें सूजन आ गई है या फिर जूते कसे हुए लग रहे हैं। इससे निपटने का काम पैर की कुछ नसें करती हैं, जो दिल तक जाती है।
 
तीसरा कारण
खड़े होने पर जो थकान होती है, उसका ताल्लुक दिमाग से भी है। फर्ज कीजिए कि आप खड़े होकर रोजमर्रा का सामान खरीद रहे हैं। ऐसे में आपका फोकस सिर्फ खड़े रहने पर होता है। मुमकिन है कि बीच-बीच में आपका ध्यान सामान उठाने की ओर भी जाए, लेकिन ज्यादातर समय तब भी खड़े होने पर खर्च हो रहा है। कुछ हद तक आप बोर भी हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में आपका शरीर पैरों से आने वाले उन संकेतों को ज्यादा देर तक नजरअंदाज नहीं कर सकता कि वे थके हुए हैं और अब बैठना चाहिए। इसकी वजह से आपका ध्यान पैरों की तरफ जाता है और दर्द ज्यादा महसूस होने लगता है। अब इसकी तुलना दौड़ने या जॉगिंग से कीजिए। आपके दिमाग को यह पता होता है कि सड़कों पर गड्ढे, अवरोध, गाड़ियां और दूसरे लोग भी होंगे। आपके मानसपटल पर इन सभी चीजों की आकृतियां खिंची रहती हैं। आपके कान जो सुन रहे हैं, आपका ध्यान उस ओर भी जाता है। आप पैरों से मिलने वाली प्रतिक्रिया का इस्तेमाल करते हैं, ताकि हर कदम के साथ आने वाली छोटी-मोटी दिक्कत दूर की जा सके। जबकि इस बात से ध्यान हट जाता है कि शुरुआत से ही आप अपने पैरों को थका रहे हैं। आपके पैरों में केवल तभी भीषण दर्द होगा, जब थकान बहुत ज्यादा हो। क्योंकि उस समय आपका दिमाग आसपास के माहौल और चीजों पर ध्यान न देकर दर्द पर ध्यान देगा। इसमें काफी वक्त लगता है और आपकी काफी जॉगिंग हो चुकी होती है। इसके अलावा जब आप दौड़ते हैं, तो शरीर में एड्रेनलिन नामक रस उत्पन्न होता है, जो आपको ज्यादा ऑक्सीजन और पैरों को सपोर्ट मुहैया कराता है। दर्द के सिग्नल का असर भी खत्म करता है।

सांवले हैं तो ज्यादा विटामिन 'डी' लें

विटामिन 'डी'असल में विटामिन नहीं है। यह एक हार्मोन है। जब सूरज की रोशनी हमारी त्वचा पर पड़ती है, तब हमारा शरीर इस हार्मोन को बनाता है। फिर यह कोलेस्ट्रॉल जैसे पदार्थ में बदलने के बाद आखिरकार विटामिन बन जाता है। इसकी खास पहचान कैल्शियम और फॉस्फोरस को पचाने में मददगार होने की वजह से है। इसी वजह से हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन 'डी' जरूरी है। नई रिसर्च में कहा जा रहा है कि विटामिन 'डी' ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने, कैंसर से लड़ने और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने में मददगार है। नवंबर 2010 में अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिसिन ने विशेषज्ञों की एक सभा में शरीर के लिए जरूरी विटामिन 'डी' की मात्रा को लेकर  अपनी सिफारिशें जारी की हैं जिसे इंटरनेशनल यूनिट्स (आईयू) में मापा जाता है। इन सिफारिशों के मुताबिक 1-70 साल की उम्र तक के लोगों के लिए 600 आईयू विटामिन 'डी' पर्याप्त है। 70 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए यह 800 आईयू होना चाहिए। पहले बताए गए 400 आईयू विटामिन 'डी' की तुलना में यह बहुत ज्यादा है। इस वजह से उम्मीद की जा रही है कि अक्सर सामने आने वाली विटामिन 'डी' की कमी संबंधी शिकायतें अब दूर होंगी। लेकिन सूरज की रोशनी के जरिए विटामिन 'डी' हासिल कर पाना कई लोगों के लिए चुनौती भरा काम है। जिन लोगों के शरीर में आमतौर पर विटामिन 'डी' की मात्रा कम पाई जाती है, उनमें शामिल हैं:

-जिनकी त्वचा का रंग गहरा होता है
-जो लोग मोटापे के शिकार होते हैं
-घर से बाहर धूप में कम निकलते हैं
-सनस्क्रीन लोशन का इस्तेमाल करते हैं
-धूप में निकलते वक्त उनका पूरा शरीर कपड़ों से ढंका होता है
-ऐसे लोगों को पेट में जलन, डायरिया और पाचन संबंधी बीमारियां होती हैं। इस वजह से इनके लिए विटामिन 'डी' को पचाना मुश्किल हो जाता है।

भोजन शरीर के लिए जरूरी विटामिन हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका है, लेकिन विटामिन 'डी' के मामले में ऐसा नहीं है। यह सामन, टुना और सार्डीन मछलियों और अतिरिक्त पोषक तत्वों से तैयार किए गए आहार जैसी कुछ गिनी-चुनी चीजों में ही मिलता है। इनमें एक बार के आहार में 100 आईयू विटामिन 'डी' मिल जाता है। विटामिन 'डी' का सही मात्रा में सुरक्षित है और यह सेहत के लिए अच्छा भी है। ऐसे में विटामिन 'डी' प्राप्त करने के लिए इन्हें सप्लिमेंट्स यानी कैप्सूल के रूप में लेना अच्छा है।
 

 

Tuesday, July 10, 2012

दहेज के लिए हर किसी से रेप का शिकार हुई युवती


व्यवहार
य ह युग व्यवहार का है। आप कितने व्यावहारिक हैं, यह उस
समय पता चलता है जब आप किसी मुसीबत में हों। मुसीबत
यानी किसी सरकारी काम से किसी कार्यालय में जाना पड़ जाए
तो आपको नानी-दादी याद आने लगती है।


वहीं तो व्यवहार काम आता है। ऎसे स्थानों पर अक्सर टेबल के
नीचे से हाथ का व्यवहार रिश्तों में मित्रता के भाव पैदा करता है।
दफ्तरों में जिन कर्मचारियों को टेबल के नीचे हाथ के व्यवहार की
कला आती है, उनका हाथ कभी खाली नहीं रहता और वे अपने
साहबों के सामने टेबल पर शान से बैठ सकते हैं, क्योंकि सामने
से साहब के टेबल के नीचे से आए हाथ को बंद करने की क्षमता
उनमें होती है। हाथ होते भी नीचे से मिलाने के लिए ही हंै।



हमारे लापरवाह किस्म के अधिकारी कभी टेबल के ऊपर से कुछ
लेने की गलती करते हैं और फिर पछताते हैं। अब इस "अर्थ"
के साथ भी दिक्कत है। यह कब बढ़ जाती है ,पता ही नहीं
चलता। आदमी की नौकरी की कमाई जितनी हो उससे कई
गुना अर्थप्राप्ति हो जाया करती है।


अब वे पूछें कि इतनी दौलत कहां से आई तो बेचारा अफसर
क्या जवाब दे? लक्ष्मी किसी से कहकर थोड़े ही आती है। "अर्थ"
शब्द में ही कई अर्थ छिपे हुए हैं, जो जितनी कोशिश करे,
उतने अर्थ मिल सकते हैं। अर्थ से कई अनर्थ भी हो जाते हैं,
पर उससे घबराने की आवश्यकता नहीं। आखिर जो "कुछ"
करेगा वही तो गलती करेगा।


"अर्थ" के अर्थ को जो गंभीरता से समझेगा उसी से अनर्थ
भी होगा। समझदार किस्म के लोग अक्सर यह कहते हैं
कि यह जगत नश्वर है। आज तक कोई भी अपने साथ
एक कौड़ी नहीं ले जा सका। जब ले जा नहीं सकते तो इकटा
करने से क्या फायदा। जीवन का भरोसा भी नहीं। यदि इसका
वेलीडिटी पीरियड होता तो उतने टाईम की एफ.डी करवा
सकते थे, मगर यह संभव नहीं है। इसलिए मानव को धन
संग्रह के लिए कभी लालची नहीं होना चाहिए।


यह सैद्धांतिक बात है और हम जानते हैं कि इस तरह
की बातें व्यक्ति तभी सोचता है, जब उसे कुछ कर
दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता। असल बात तो
व्यावहारिक होने की है। व्यवहार के बीच कई उत्प्रेरक
आ चुके हैं। धन भी उनमें एक है। इसमें व्यवहार का
क्या दोष?

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दहेज के लिए हर किसी से रेप
का शिकार हुई युवती
Rape























भोपाल।।
मध्य प्रदेश के सागर जिले में दहेज की मांग पूरी न
कर पाने के कारण एक 20 साल की युवती को ससुरालवालों के
जुल्म का शिकार होना पड़ा। पिछले तीन साल से महिला को
तबेले में जंजीरों से बांध कर रखा गया। इतना ही नहीं, इस
दौरान उसके पति, रिश्तेदारों और यहां तक कि पड़ोसियों ने
बार-बार उसके साथ बलात्कार किया।

युवती पर जुल्म की इंतहा यह थी कि तीन सालों तक
उसका रेप किया गया। इस साल मई में 50 हजार रुपये के
लिए उसे एक महाजन को बेच दिया गया। सिर्फ इसलिए
क्योंकि उसके परिवारवालों के पास दहेज देने के लिए पैसे
नहीं थे। युवती एक बार काफी बीमार हो गई, उस वक्त
एक पड़ोसी उसे अस्पताल ले गया, लेकिन उसने भी
अस्पताल ले जाते समय कथित तौर पर उसका रेप किया।
युवती के साथ हुए इस बर्बर व्यवहार का उस समय पता
चला, जब उसके एक रिश्तेदार ने सौभाग्य से उसे महाजन
के घर पर देख लिया और इस बात की जानकारी उसके
परिवारवालों को दी।

1 जुलाई को महिला अपने रिश्तेदारों के साथ राहतगढ़ पुलिस
स्टेशन गई और इस अपने ऊपर हुए जुल्म ही यह भयावह
कहानी सुनाई। पुलिस अधिकारी एस. पी सागर के अनुसार,
महिला की शादी सागर जिले के पराश्री टूंडा गांव के आनंद
कुर्मी के साथ पांच साल पहले हुई थी। शादी के कुछ दिन
बाद से ही ससुरालवालों ने दहेज के लिए उसे मानसिक
और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

पीड़िता के किसान पिता रामकिशन ने बताया, 'शादी के
समय ससुरालवालों ने एक लाख रुपये की मांग की थी,
जो उन्हें दे दिए गए थे। लेकिन वह बार-बार चीजों की मांग
करने लगे। उन्होंने कलर टीवी, मोटरसाइकल, ट्रैक्टर के
साथ-साथ एक लाख रुपये नकद और मांगे। इसके लिए
बार-बार उन्होंने मेरी बेटी के साथ मारपीट की।' रामकिशन
ने कहा, जब मेरी बेटी गर्भवती हुई तो सास और परिवार के
दूसरे लोगों ने मिलकर जबरन उसका गर्भपात करवा दिया।
शादी के दो साल बाद उन लोगों ने कहा कि अब उनकी बेटी
वहां नहीं रह सकती।'

इसके बाद ससुरालवालों ने उसे तबेले में गाय-भैसों के साथ
जंजीर से बांधकर रखा। कुछ दिन बाद उसका पति आनंद
कुर्मी उसे पास के एक गांव खुरई में राम सिंह नाम के अपने
रिश्तेदार के यहां छोड़ आया। राम सिंह और उसके बेटों नरेंद्र
और लोकेंद्र ने युवती को घर में बंद करके रखा और करीब 20
दिन तक उसके साथ रेप किया।

इसके बाद राम सिंह ने उसे एक दूसरे गांव महुना के महाजन
द्वारका प्रसाद को उसे बेच दिया। यहां भी उसके साथ बार-बार
रेप किया गया। इस बीच एक दिन महिला काफी बीमार पड़ गई
तो महाजन का पड़ोसी खड़ग सिंह उसे अस्पताल ले गया,
लेकिन रास्ते में उसने भी उससे रेप किया।

बाद में महाजन के घर लौटते समय महिला को रिश्तेदार ने देख
लिया और पहचान लिया। तब जाकर महिला के घरवालों को
इसकी जानकारी मिली और किसी तरह उसे वहां से छुड़ाया
गया। 28 जून को महिला को छुड़ाकर उसके घर वाले अपने
 पास ले आए और दो दिन बाद इस मामले की रिपोर्ट पुलिस
 मे लिखवाई।

पुलिस ने महिला के पति, ससुरालवालों, रेप के दूसरे
आरोपियों सहित महाजन के खिलाफ केस दर्ज किया है।
फिलहाल पुलिस ने तीन आरोपियों जिसमें युवती के
साथ अस्पताल ले जाते समय रेप करने का आरोपी खड़ग
सिंह भी शामिल है, को गिरफ्तार किया है।




Monday, June 18, 2012

हर चीज का होता है एक जीवनचक्र

पुरुष के हाथ से किसी बच्चे का पिता बनने का सबसे सुरक्षित समझा जाने वाला जॉब भी अगले दस सालों में छिन जाएगा, क्योंकि इस जॉब की लाइफसाइकिल बदल रही या खत्म हो रही है। हर जॉब की एक लाइफसाइकिल होती है और इसे खत्म होने से बचाने के लिए इसके तौर-तरीकों में बदलाव करना जरूरी है।

इस दुनिया में हरेक उत्पाद या इंसान समेत प्रत्येक प्रजाति का एक जीवनचक्र होता है, जिसके बाद यह खत्म हो जाता 
या मर जाता है। इसी तरह हर जॉब की भी एक लाइफसाइकिल होती है और यदि इसमें अपग्रेडेशन या बदलाव न किया जाए, तो यह कुछ समय बाद मरने लगता है। इसी वजह से कहते हैं कि दुनिया में एक ही चीज स्थायी है और वह है बदलाव। सजीव प्राणियों का सर्वाधिक अहम जॉब है प्रजनन। हजारों वर्र्षों से तमाम प्रजातियों के नर व मादा साथ मिलकर अपनी संतति को आगे बढ़ाते चले आ रहे हैं। लेकिन अब यह चक्र पूरा हो गया है। नए शोध से पता चला है कि मादा द्वारा नर प्रजाति की मदद के बगैर भी बच्चे पैदा किए जा सकते हैं। हाल ही में दो मादा चूहों ने मिलकर एक चुहिया को जन्म दिया है, जिसका नाम कगुयु रखा गया है। जापान में शोधार्थी दो अंडाणुओं को एक साथ जोड़ते हुए इनसे एक भ्रूण को विकसित करने में सफल रहे, जिसे बाद में एक वयस्क चुहिया की कोख में प्रत्यारोपित कर दिया गया।

पिछले हफ्ते अपनी लंदन यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात भारतीय मूल की लंदन-बेस्ड बॉयोलॉजिस्ट व जेनेटिसिस्ट आरती प्रसाद से हुई, जिनकी अगले महीने एक किताब 'लाइक ए वर्जिन : द साइंस ऑफ सेक्सलेस फ्यूचर' आने वाली है। वह अपनी किताब में लिखती हैं कि किस तरह महिलाएं किसी पुरुष के बगैर बच्चा पैदा कर सकती हैं। उनकी किताब, जो भारत में अगस्त में प्रकाशित होगी, में यह भी बताया गया है कि किस तरह पुरुष भी खासतौर पर उन्हीं के लिए बनी सिलिकॉन कोख के जरिए गर्भधारण कर सकते हैं। बड़े जंतुओं में वर्जिन बर्थ के मामले पहले भी प्रकाश में आते रहे हैं। आरती की किताब में दुनियाभर के ऐसे कई प्राणियों की केस स्टडीज हंै। इन्हीं में से एक बोनट-हेड मादा शार्क भी है, जिसे एक अमेरिकी जंतु वाटिका में अलग-थलग रखा गया था और जिसका कभी नर शार्क से आमना-सामना नहीं हुआ। इसके बावजूद उसने वयस्क की तरह एक स्वस्थ नन्हीं शार्क को जन्म दिया।

1980 से वैज्ञानिक बच्चे पैदा करने की ऐसी प्रक्रिया पर काम कर रहे थे, लेकिन पहली सफलता टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर में दर्ज की गई। अब 2012 में वैज्ञानिक लेबोरेटरी में इंसान की बोन-मैरो कोशिकाओं से अंडाणु व शुक्राणु तैयार करने में सफल रहे हैं। इससे पुरुष व महिलाओं को विपरीत लिंगियों की सहायता के बगैर अपने बच्चे पैदा करने में मदद मिलेगी। इंसान व चूहे की जेनेटिक संरचना एक जैसी होती है। इसलिए यदि ऐसा चूहों में संभव है, तो इंसानों में भी मुमकिन हो सकता है। एक बाधा यह है कि दो अंडाणुओं के सम्मिलन से एक भ्रूण के विकास को तो गति मिल सकती है, लेकिन यह भ्रूण मादा होगा। यदि आपको नर शिशु चाहिए, तो उसके लिए कुछ अलग तकनीक अपनानी पड़ेगी।

आरती अपनी किताब के आखिर में लिखती हैं कि अगले दस से पंद्रह वर्र्षों में यह तकनीक क्लीनिक्स में इस्तेमाल के लायक हो जाएगी। दुनियाभर में नपुंसकता की दर जिस तेजी से बढ़ रही है, उसमें ऐसी रिसर्च इंसानी पीढिय़ों को प्रजनन के वैकल्पिक रूपों के जरिए पनपने में मदद करेगी। इससे लगता है कि अगले दस वर्र्षों में पुरुष शिशुओं के निर्माण का जॉब भी खो देंगे और प्रजनन की प्रक्रिया नए सिरे से परिभाषित होगी।


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दलाल+पीडी+कर्मचारी=खूनी कारोबार



खून की खरीद-फरोख्त के धंधे में निजी ब्लड बैंक के कर्मचारी, दलाल और प्रोफेशनल डोनर (पीडी) की तिकड़ी काम कर रही है। प्रबंधन ब्लड बैंक चलाने के लिए दलालों को प्रश्रय दे रहे हैं और दलाल प्रोफेशनल डोनर का नेटवर्क तैयार कर खून उपलब्ध करा रहे हैं। इस तिकड़ी ने शहर में रक्त का अवैध बाजार खड़ा कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि अधिकतर निजी ब्लड बैंकों का काम प्रोफेशनल डोनर के बिना नहीं चलता। दलाल पीडी का नेटवर्क तैयार करते हैं और इन्हें ब्लड बैंक तक लाते हैं। पीडी चंद रूपयों के लालच में खून बेच देते हैं।

लालच का रक्तदान
रक्तदान के नियमों के मुताबिक कोई रक्तदाता एक बार रक्तदान करने के बाद तीन माह बाद ही अगला रक्तदान कर सकता है। पर पीडी के मामले में सेहत की हिफाजत के इस नियम को भी ब्लड बैंक व दलाल ताक पर रख देते हैं। ब्लड बैंक की जरूरत के कारण कई बार पीडी सप्ताह भर में या 15 दिन में ही दोबारा ब्लड दे देता है। ब्लड बैंक भी एचबी बढ़ाने के लिए पीडी को आयरन की गोलियां खिलाते रहते हैं।

सेहत के लिहाज से यह खतरनाक प्रैक्टिस है। एक बार में ब्लड डोनर का अधिकतम 300 एमएल रक्त ही लिया जा सकता है, लेकिन ब्लड बैंक के धंधे का एक काला सच और भी सामने आया है। एक ब्लड बैंक के कर्मचारी ने बताया कि कई बार प्रोफेशनल डोनर की जानकारी के बिना 300 की जगह 500 एमएल तक ब्लड निकाल लिया जाता है।

जांच का शॉर्टकट
जब कोई डोनर ब्लड बैंक जाता है, तो उसके रक्त के नमूने के पांच टेस्ट होते हैं। इसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, वीडीआरएल और मलेरिया की जांच शामिल हैं। सामान्य तौर पर इन जांचों की प्रक्रिया पूरी होने में तीन-चार घंटे लगते हैं। इससे पता चलता है कि रक्तदाता का ब्लड अन्य व्यक्ति को चढ़ाने लायक है या नहीं? पर कुछ निजी ब्लड बैंकों में शॉर्टकट अपनाया जाता है। इससे मरीज को संक्रमित ब्लड चढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर नशेड़ी, ऑटो चालक, पान वाले आदि पीडी के रूप में काम करते हैं। नशेड़ी पीडी या किसी बीमारी से ग्रस्त डोनर का ब्लड चढ़ जाए तो इससे मरीज को संक्रमण का खतरा हो सकता है। मरीज को बैठे-बिठाए कोई अन्य बीमारी हो सकती है।

निचले कर्मचारी भी शामिल
कुछ जगह अस्पताल और नर्सिüग होम में काम करने वाले गार्ड, निचले स्तर के कर्मचारी भी इस धंधे में शामिल होते हैं। भोपाल के सरकारी ब्लड बैंकों के आसपास भी इस तरह के दलालों की उपस्थिति बताई जाती है। निजी ब्लड बैंक के अलावा ये दलाल सरकारी अस्पतालों में भी घुसपैठ बनाने की कोशिश करते हैं। स्वैच्छिक रक्तदान की कमी के कारण इन तत्वों का धंधा चल रहा है।


मोबाइल पर चलता है पूरा नेटवर्क
ब्लड की खबर के साथ जोड़ खून के दलालों का नेटवर्क मोबाइल पर चलता है। दलाल सरकारी और प्रायवेट अस्पतालों के पार्किüग कर्मचारी, चपरासी, गार्ड, सफाईकर्मी, आसपास की चाय और पान की दुकान वालो से संबंध स्थापित करते हैं। इसके बाद इन्हें अपना मोबाइल नंबर दे देते हैं। साथ ही यह भी बताते हंै कि अगर किसी को ब्लड की जरूरत हो तो संपर्क कर लेना, इसके बदले सूचना देने वाले को कमीशन देने का प्रलोभन भी दिया जाता है।
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Monday, June 4, 2012

ग्रामीण विकास के रोड़े



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वैसे तो भारत में ग्राम पंचायतों की अवधारणा सदियों पुरानी है, लेकिन आजादी के बाद देश में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक अधिकार देकर उसे मजबूत बनाने की कोशिश की गई है। खासकर संविधान के 73वें संशोधन में पंचायतों को वित्तीय अधिकारों के अलावा ग्रामसभा के सशक्तिकरण की दिशा में अनेक योजनाएं बनीं। यही वजह है कि आज देश के लगभग सभी राज्यों में पंचायतों के चुनाव नियमित हो रहे हैं। वहीं केंद्र सरकार इन पंचायतों के विकास लिए अपने खजाने से सालाना अरबों रुपये आवंटित कर रही है ताकि गांवों का सही विकास हो सके, लेकिन इतनी धनराशि आने के बावजूद देश में गांवों की बदहाली दूर नहीं हो पा रही है। असल में ग्राम स्वराज और ग्राम्य विकास का जो सपना महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने देखा था वह अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। जिस तरह संसदीय लोकतंत्र में देश के सर्वोच्च प्रतीक संसद और विधानसभाओं का महत्व है उसी तरह ग्रामसभा लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई है। इसे सामान्य शब्दों में हम ग्राम संसद भी कहते हैं, लेकिन कमजोर अधिकारों के कारण ग्रामसभा उस तरह मजबूत नहीं हो पाई जैसी परिकल्पना राष्ट्रपिता और लोकनायक जयप्रकाश ने की थी। जिस तरह सांसद और विधायक करोड़ों रुपये की निधि का इस्तेमाल सही तरीके से नहीं करते उसी तरह पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि भी कमोबेश उसी राह पर चल रहे हैं।

 

ग्राम स्वराज का असल मकसद तभी पूरा होगा जब गांवों की सत्ता में ग्रामीणों को उचित भागीदारी मिले और विकास से जुड़े तमाम फैसले लेने का अधिकार ग्राम सभा को हो। उदाहरण के तौर पर गांव में सड़कें कहां बनानी हैं, ग्रामसभा की जमीन का किस तरह व्यावसायिक इस्तेमाल हो, इसके अंतिम निर्णय का अधिकार कलेक्टर और बीडीओ को नहीं, बल्कि पंचायत के सरपंच और प्रधान को मिलना चाहिए। संविधान के 73वें संशोधन के बाद दिल्ली से जारी होने वाली धनराशि पंचायतों के विकास के लिए पहुंचती है। अमूमन हर पंचायत में पांच साल के दौरान लाखों रुपये मिलते हैं। अगर इन पैसों का सही जगह इस्तेमाल किया जाए तो देश के समस्त गांवों की तस्वीर बदल सकती है, लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था में ऐसा नहीं हो पा रहा है, क्योंकि पंचायतों को मिले रुपये कहां खर्च किए जाएं यह फैसला ग्रामीणों की सहमति के बगैर नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पंचायतों के प्रधान और सरपंच अपने चहते लोगों और अधिकारियों से साठगांठ कर उन योजनाओं को मंजूरी दिलाते हैं जिसमें बंपर कमीशन काटने की गुंजाइश होती है। यही वजह है कि देश के अधिकांश राज्यों में ग्रामसभा को निरंतर कमजोर करने की साजिश की जा रही है। इस मामले में बिहार का उदाहरण लिया जा सकता है। राज्य के तकरीबन सभी गांवों में अक्षय ऊर्जा योजना के नाम पर ग्राम प्रधानों ने सौर बिजली लगाने की योजना बनाई।

 

बावजूद इसके बिहार के गांवों में अंधेरा अब भी कायम है, क्योंकि लगभग नब्बे फीसदी सोलर लाइटें खराब हो चुकी हैं। इस तरह बड़े पैमाने पर सोलर लाइटें लगाने की एकमात्र वजह थी मोटा कमीशन। अगर विकास योजनाएं ग्रामीणों की सहमति से बनाई जाए तो इस तरह की मनमानी और लूटपाट को रोका जा सकता है। गांवों का विकास ग्रामीणों की मर्जी से होना चाहिए ऐसा कहने के पीछे तर्क यह है कि ग्रामसभा को अधिक से अधिक विकेंद्रीकृत किया जाए। अगर संभव हो तो उसे वार्ड सभा और टोला सभा में तब्दील किया जाए, क्योंकि जिस तरह गांव का प्रधान कुछ हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह एक पंचायत में चुने जाने वाले दर्जनों पंचायत सदस्य और पंच भी सैकड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनके साथ भेदभाव किया जाना ठीक नहीं। इस तरह के सौतेले बर्ताव से भला हम गांवों का सर्वागीण विकास कैसे कर पाएंगे? दिल्ली स्थित सेंटर फॉर सोशल इंपावरमेंट ऐंड रिसर्च जो ग्रामीण विकास के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने के अभियानों से जुड़ी है। इस संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि पंचायतों के चुनाव में भी धनबल और बाहुबल का उपयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह होने लगा है। अध्ययन से पता चलता है कि पिछले साल उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव में सैकड़ों प्रत्याशी ऐसे थे जिनके पास करोड़ों की चल-अचल संपत्ति थी।

 

पंचायतों के चुनाव में मारामारी का आलम यह था कि ग्रामप्रधान और जिला पंचायत की एक सीट के लिए औसतन डेढ़ दर्जन उम्मीदवारों ने नामजदगी के पर्चे भरे। सीएसईआर के अनुसार उत्तर प्रदेश में हुए पंचायतों के चुनाव में ग्रामप्रधान के उम्मीदवारों ने जहां पांच लाख से सात लाख रुपये खर्च किए वहीं जिला पंचायत के लिए उम्मीदवारों ने औसतन दस लाख से सोलह लाख रुपये पानी की तरह बहाए। लोकतंत्र की नर्सरी कहे जाने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव में धन की यह धार सकारात्मक संकेत नहीं है। इन सबके बावजूद ग्राम विकास की उम्मीदें खत्म नहीं होतीं। निश्चित तौर पर बदलाव अचानक नहीं होता, लेकिन इसकी शुरुआत तो हो ही सकती है। उम्मीदों की ऐसी ही एक किरण कृष्ण नगरी मथुरा के मुखराई पंचायत में देखने को मिली। गोवर्धन तहसील से सटे इस पंचायत के प्रत्येक जनशिकायतों का समाधान ग्रामसभा की खुली बैठकों में ही किया जाता है। कुछ अरसे पहले यहां के ग्रामीण भी अन्य गांव वालों की तरह मानते थे कि गांव के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। यही वजह था कि यहां के लोग अपने प्रधान और जिला पंचायत के सदस्यों से उनकी कार्यशैली के बाबत कोई पूछताछ नहीं करते थे। गांव के मुखिया विकास की कौन-कौन सी योजनाएं संचालित करते हैं, ग्राम सभा की बैठकें नियमित क्यों नहीं होती हैं आदि बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं था।

 

हालांकि अब ऐसा नहीं है, क्योंकि मुखराई लोग ग्रामीण विकास को लेकर पूरी तरह सजग हो चुके हैं। यहां के कुछ लोग सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नित नई जानकारियां हासिल कर रहे हैं। मुखराई के लोगों का मुख्य पेशा कृषि और पशुपालन है। हालांकि कुछ समय पहले नीलगायों की वजह से यहां के किसान काफी त्रस्त थे। ग्रामीणों ने इस बाबत लिखित सूचना जिला प्रशासन को पूर्व में भी देते रहे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। नतीजतन यहां के लोगों ने इस समस्या को ग्राम सभा की खुली बैठकों में उठाया और उसके बाद यह मामला राज्य के शीर्ष अधिकारियों के पास पहुंचा। आपसी एकजुटता की वजह से यहां की ग्रामसभा आज पूरी तरह सशक्त बन चुकी है। इसे ग्रामीणों की चेतना का ही असर कहें कि मुखराई के ग्राम प्रधान अपने विकास कार्यो का लेखा-जोखा और एक-एक पैसे का हिसाब ग्राम सभा की बैठकों में देते हैं। बेशक देवभूमि मथुरा की मुखराई पंचायत देश भर के ग्राम सभाओं के लिए एक मिसाल है। अपनी मुखरता से मुखराई के लोग ग्रामीण विकास की दिशा में एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं।

धुंए की धीमी मौत के तथ्य

1- धूम्रपान (smoking) करते समय आप निकोटिन, पायरिडीन, अमोनिया, कार्बन मोनो ऑक्साइड, फ्यूरल, फर्माल्डिहाइड, एसीटोन, आर्सेनिक एसिड जैसे 4800 घातक रसायनों (lethal chemicals) को अपने फेफड़ों और खून मे भरते हैं जिनमें से 69 (International Agency For Research On Cancer के अनुसार 43) कैंसर के लिए सीधे उत्तरदायी हैं।
2- एक सिगरेट से आप 100 mg निकोटिन शरीर में भरते हैं, 500 mg एकसाथ इंजेक्शन से ले लें तो तुरन्त मृत्यु निश्चित है।3- एक सिगरेट में पाया जाने वाला 30-40 mg "टार" कैंसर का सीधा पिता होता है।
4- धूम्रपान करने वाले 61% पुरुषों व 62% महिलाएं 30-69 वर्ष की आयु के बींच किसी भी समय मृत्यु के मुंह मे समा सकते हैं।
5- धूम्रपान से भारत में प्रति मिनट लगभग 2 लोग मौत के मुंह मे समा जाते हैं।
6- भारत में कुल बीमारियों की 40% तम्बाकू धूम्रपान से होती हैं।
7- अमेरिका में धूम्रपान से प्रतिवर्ष 4,4000 लोग मरते हैं।
8- पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 50 लाख से 60 लाख लोग तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरते हैं।
9- WHO के अनुसार अप्रत्यक्ष धूम्रपान से प्रतिवर्ष मरने वालों की संख्या 6,00,000 है।
10- धूम्रपान ब्लडप्रैशर, हार्ट अटैक, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, एस्फ़ीसीमा, अलसर, टोबैको एम्ब्लीयोपिया (अंधापन), लीवर सिरोसिस आदि पचासों दर्दनाक बीमारियों के लिए सीधे प्रवेशद्वार है।
11- तम्बाकू जनित बीमारियों के इलाज में भारत में प्रतिवर्ष 30,800 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं जबकि भारत का 2012 का स्वास्थ्य बजट 34,488 करोड़ रुपए रहा, 2011 में यह केवल 30,456 करोड़ ही था।
12- अमेरिका में धूम्रपान से पैदा होने वाली बीमारियों पर कुल $150billion अर्थात 8,40,000 करोड़ रुपए खर्च होते हैं, यदि अमेरीकन बनने की कोशिश में लगे आज के युवा यह बराबरी कर लेते हैं तो देश वर्तमान बजट का कुल 59% धुएँ पर खर्च करना होगा जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा पर बजट का 11-12% ही (2011-12 में अधिकतम लगभग 12.97%) दिया जा पाता है|
13- अमेरिका के कम से कम 20% किशोर धूम्रपान के शिकार हैं और ऐसे ही 3000 बच्चे रोज सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं।
14- भारत में इन नशों के लती 50% किशोर इनके परिणाम स्वरूप होने वाली कैंसर जैसी बीमारियों से मरेंगे।
15- एक सर्वेक्षण के अनुसार अभी भारत में 15 से 18 वर्ष की आयु के 15% बच्चे तम्बाकू/धूम्रपान के फंदे में फंस चुके हैं।
16- सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के अनुसार भारत में वर्ष 2011-12 में 116.166 अरब (billion) सिगरेट बेंची गईं। अर्थात भारत के प्रति व्यक्ति को 96 सिगरेट खफ़त की जा रही हैं। इस वर्ष के आंकड़ों के अनुसार 4.19% अधिक उत्पादन हुआ।
17- मैंने गणना की तो पाया कि 38 करोड़ 72 लाख 20 हजार वृक्षों को केवल 2011-12 में ही सिगरेट पिलाने के लिए काटा गया।
18- विभिन्न मूल्यों पर उपलब्ध मंहगी सस्ती सिगरेट का औसत मूल्य यदि 3 रुपए माना जाए तो लगभग 348 अरब रुपये गत वर्ष धुएँ में उड़ा दिये गए जोकि इसी वर्ष भारत के कुल बजट से लगभग दोगुना है।
यह आंकड़ें एक बानगी मात्र हैं क्योंकि यदि एक पेड़ की कीमत, एक पेड़ से होने वाली वातावरणिक क्षति का आंकलन करें, फिर तदनुसार 387220000 पेड़ काटने के परिणाम का आंकलन करें, इससे होने वाले वातावरणिक परिवर्तन तथा प्रति व्यक्ति क्षति निकालें तो ये आंकड़ें बहुत आगे पहुँच जाएंगे। तम्बाकू-धूम्रपान आपके व्यक्तिगत जीवन को ही नहीं वरन पूरे देश, पूरी पृथ्वी व प्रत्येक मनुष्य को मौत के मुंह में धकेल रहे है। आपको सिगरेट पिलाने के लिए सरकार भले ही कंपनियों को निमंत्रण देती है किन्तु तम्बाकू दिवस पर तम्बाकू/सिगरेट की बुराई में करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च करने पड़ते हैं। यह बड़ी विडम्बना के साथ साथ धूम्रपान के कारण देश का एक अतिरिक्त खर्च है। यह विडम्बना मौत के इस भारी भरकम व्यापार में छिपी है जिसकी ताकत केवल सरकारों को ही नहीं वरन विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था WHO को भी इस मामले पर ठोस कदम उठाने से रोक देती है। मार्च में WHO द्वारा कंपनियों के दबाब में एल्कोहौल उपभोग में 2025 तक 10% कमी के अपने लक्ष्य को अपनी प्रस्तावना सूची से हटा लिया।
इसी जानकारी के साथ मैं सभी धूम्रपान करने वाले बंधुओं को तम्बाकू दिवस (मुक्ति) दिवस की हार्दिक शुभकामनायें कि आप इस भयावह मृत्युपाश से मुक्त हो सकें। यदि आप में से कोई भी इस दुर्व्यसन से ग्रस्त है और इस लेख को पढ़कर इस व्यसन त्याग का साहस करने में सफल होता है तो कृपया प्रतिक्रिया में सूचित करें, तभी इस लेख की सार्थकता होगी।



 
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Sunday, May 27, 2012

बच्चा जब पूछे कुछ ऐसा...

बच्चे कई बार सेक्स संबंधित ऐसे सवाल पैरंट्स से पूछ बैठते हैं , जिनका जवाब देना उलझन भरा काम होता है। कई बार मां-बाप ऐसे सवालों को टाल जाते हैं तो कई बार बच्चों को डांट देते हैं। दोनों ही चीजें बच्चे के मानसिक विकास के लिए नुकसानदायक हैं। फिर क्या करें ? बच्चे के ऐसे हर सवाल का खास तरीके से जवाब दें। कैसे , एक्सपर्ट्स से मिली जानकारी के आधार

4-9 साल के बच्चों के सवाल

बच्चे कहां से आते हैं ? मैं कहां से आया ? पड़ोस वाली आंटी का पेट बड़ा क्यों है ?( प्रेगनेंट महिला को देखकर)
यह एक ऐसा सवाल है , जो इस उम्र के लगभग हर बच्चे के दिमाग में उठता है। ऐसे सवाल पूछने पर बच्चे को डांटना या उसकी बात को आई-गई करना ठीक नहीं है , क्योंकि इस 
जिज्ञासा को अगर आपने शांत नहीं किया तो वह कहीं और से जानने की कोशिश करेगा और ऐसे में बहुत मुमकिन है कि वह भ्रमित हो जाए। इस उम्र के बच्चे कुदरत और जानवरों के उदाहरणों से किसी बात को अच्छी तरह समझ लेते हैं।

ऐसे में , इस सवाल का जवाब देने के लिए आप उसे कहीं गार्डन या बाहर वॉक पर ले जाएं। फूलों का उदाहरण देकर समझाएं कि कैसे वे पैदा होते हैं और फिर मां के शरीर से अलग होकर खुद अपनी बढ़ोतरी करते हैं। आप उसे सीधे-सीधे यह भी कह सकते हैं कि तुम्हारी मां के शरीर में एक खास अंग है , जिसे गर्भाशय कहते हैं। तुम वहीं से आए हो। इस उम्र में जन्म की पूरी प्रक्रिया के बारे में बताने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसी कोई बात बच्चे को कहें कि वह भगवान के यहां से आया या उसे किसी साधु बाबा के यहां से लाए थे। उसे साफ-साफ बताएं कि वह मां के शरीर से पैदा हुआ है। प्रेग्नेंट महिला के बारे में भी बता सकते हैं कि इसी तरह उन आंटी के शरीर से भी एक बेबी पैदा होगा।

अरे , इसमें सबकी फोटो है , मेरी क्यों नहीं है ? ( पैरंट्स की शादी की ऐल्बम देखकर)
इस सवाल को हैंडल करने के कई तरीके हो सकते हैं। 4-6 साल के बच्चों को असली बात समझा पाना मुश्किल है। इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह दे सकते हैं कि तुम्हें तब तक मां-पापा इसे दुनिया में लाए ही नहीं थे। भ्रमित करने वाले जवाब देने से बचना चाहिए।

लड़कियों और लड़कों के प्राइवेट पार्ट्स अलग-अलग क्यों होते हैं ? ( कई बार बच्चे एक-दूसरे के कपड़ों में झांकते हैं और उनकी जिज्ञासा बढ़ती है।)
इतनी छोटी उम्र में आप बच्चे को शरीर के अंगों की जानकारी नहीं दे सकते। इसलिए उसे समझाएं कि दुनिया में हर शख्स अलग होता है और अलग ही दिखाई देता है। ईश्वर ने हर शख्स को अलग-अलग बनाया है और इसीलिए उनके शरीर की बनावट भी अलग होती है। मसलन लड़कों के शरीर की बनावट अलग होती है और लड़कियों के शरीर की अलग। इसी तरह कुत्ता , बिल्ली , गाय , भैंस और भी तमाम जीव अपने आप में खास होते हैं। तुम लड़के हो और तुम्हारे अंग लड़कियों से अलग बनाए गए हैं।

घर में रखे या ऐड में देखकर सैनिटरी नैपकिन के बारे में पूछना कि यह क्या है ?
सैनिटरी नैपकिंस के बारे में पूछने पर बच्चों को बता सकते हैं कि ये नैपकिन हैं। जैसे नाक या हाथ पोंछने के लिए तुम सामान्य नैपकिन का इस्तेमाल करते हो , उसी तरह शरीर के प्राइवेट पार्ट्स को पोंछने और उन्हें साफ रखने के लिए मां इनका इस्तेमाल करती है। ये नैपकिन उन नैपकिन से थोड़े अलग होते हैं जिनका इस्तेमाल तुम करते हो , लेकिन इनका काम वही है। इस उम्र में इससे ज्यादा बच्चे को बताने की जरूरत नहीं है।

कॉन्डम क्या होता है ? ( टीवी आदि में ऐड देखकर)
कॉन्डम के बारे में बच्चे की जिज्ञासा बेहद नॉर्मल है। अगर घर में कॉन्डम को छिपाकर भी रखा जाए तो भी इस बात की पूरी संभावना है कि बच्चे टीवी ऐड या सड़कों पर लगे विज्ञापनों के जरिए इस शब्द से परिचित हो चुके हों और इस बारे में आपसे जानने की कोशिश करें। इतने छोटे बच्चों को बता सकते हैं कि जैसे हाथों को किसी बीमारी से बचाने के लिए हम ग्लव्स पहन लेते हैं , उसी तरह कॉन्डम भी एक ग्लव्स की तरह होता है , जो पुरुषों को बीमारियों से बचाता है। अगर बच्चा 10-12 साल के आसपास है तो उसे यह भी कह सकते हैं कि कॉन्डम सेक्स के दौरान पुरुषों को बीमारी से बचाने और बेबी होने से रोकने के काम आता है। सेक्स शब्द का प्रयोग करने से घबराएं नहीं , क्योंकि बच्चे को शिक्षा देने के लिए एक-न-एक दिन इस शब्द का इस्तेमाल करना ही है।

कुत्ता या दूसरे किसी जानवर को मैथुन करते देखकर कि ये क्या कर रहे हैं ?
ऐसी स्थिति आमतौर पर नहीं आती लेकिन कभी-कभार ऐसा हो भी सकता है। ऐसी स्थिति में बच्चों के पूछने पर यह कह सकते हैं कि ये आपस में खेल रहे हैं।

9-14 साल के बच्चों के सवाल

मेरे शरीर में ये अचानक बदलाव क्यों आ रहे हैं ? मसलन दाढ़ी मूंछ आना , प्राइवेट पार्ट्स पर बाल , मुहांसों की शुरुआत आदि।
10 साल की उम्र किसी बच्चे को यौवन के बारे में जानकारी देने का सही समय है। बच्चों को सबसे पहले इस बात का एहसास दिलाया जाए कि उनके शरीर में जो भी बदलाव आ रहे हैं , वे बिल्कुल नॉर्मल हैं और जरूरी भी। उन्हें बताएं कि तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंगों पर आने वाले बाल , आवाज में आने वाला बदलाव , मुंहासे निकलना आदि सभी कुछ नॉर्मल है और ऐसा हॉर्मोनल बदलाव की वजह से हो रहा है। ऐसा सभी के साथ होता है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ था। लड़कियों और लड़कों दोनों में ही ऐसे बदलाव आते हैं , हालांकि कुछ चीजें लड़कों और लड़कियों दोनों में अलग-अलग हो सकती हैं।

पीरियड्स क्या होते हैं ?
यह जानना जरूरी है कि लड़कियों को पीरियड्स की जानकारी उस समय ही दे दी जानी चाहिए , जब उनके पीरियड्स शुरू नहीं हुए हों और होने वाले हों। यह ऐसा सवाल है , जिसका जवाब मां को बेटी के पूछने से पहले ही दे देना है। ऐसी अवस्था कौन-सी होगी , इसका फैसला मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता , फिर भी आमतौर पर 10 साल की उम्र यह सब जानकारी देने के लिए ठीक है। इस बारे में जानकारी देने का काम मां खुद करे या फिर स्कूलों में इंस्ट्रक्श्नल बुक्स और विडियो के जरिए भी यह जानकारी अच्छे ढंग से दी जा सकती है। उन्हें बताया जा सकता है कि यह नॉर्मल है और सभी लड़कियों के साथ ऐसा होता है। बेटियों के साथ मां अपना पर्सनल अनुभव भी शेयर कर सकती हैं और उन्हें सभी बातें विस्तार से बता सकती हैं। मां उन्हें बता सकती हैं कि उनके साथ भी जब ऐसा हुआ था , तो उन्हें भी अजीब-सा लगा था और दर्द भी हुआ लेकिन बाद में यह बिल्कुल नॉर्मल चीज बन गई।

नाइटफॉल क्या होता है ? मास्टरबेशन करना गलत है क्या ?
आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों में यौवन थोड़ी देर से आता है। मसलन जहां यह सब जानकारी देने का वक्त लड़कियों में 9 साल है , वहीं लड़कों को इस बारे में 11-12 साल की उम्र में बता देना चाहिए। नाइटफॉल या मास्टरबेशन ऐसी बातें हैं , जिनके बारे में आपका बच्चा अगर आपसे पूछ रहा है तो हो सकता है वह इन चीजों से गुजर चुका हो। नाइटफॉल के बारे में आप उसे समझा सकते हैं - नाइटफॉल होना बिल्कुल नॉर्मल और प्राकृतिक है और इस बात का संकेत है कि तुम यौवन अवस्था में हो। तुम्हारे शरीर में हर वक्त सीमेन बनता रहता है और जब यह ज्यादा इकट्ठा हो जाता है तो सोते वक्त बाहर निकल जाता है। ज्यादातर लड़कों को ऐसा होता है। इसी तरह यही सीमेन जब अपने आप प्राइवेट पार्ट्स को टच करके बाहर निकाला जाता है , तो उसे मास्टरबेशन कहते हैं। सीमेन किसी भी तरह से बाहर निकले , उससे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता और न ही ऐसा करने से कोई कमजोरी आती है , लेकिन अति तो हर चीज की बुरी होती है। वैसे भी इस उम्र में मन को तमाम दूसरी क्रिएटिव चीजों में लगाना चाहिए , मसलन संगीत , आर्ट , कोई खेल आदि। ऐसा करने से तुम्हारा विकास भी होगा और मन बार-बार उस ओर नहीं भागेगा।

बच्चा कैसे पैदा किया जाता है ? मां के शरीर से वह बाहर कैसे आता है ?
इस उम्र तक आते-आते बच्चे की समझ इतनी विकसित हो जाती है कि वह बच्चा पैदा होने के बारे में थोड़ा-बहुत समझ ले। उसे बता सकते हैं कि बच्चा मां के पेट में होता है। जब बच्चा पैदा होने वाला होता है तो मां के पेट के अंत में मौजूद सर्विक्स फैलने लगती है। वहां की मांसपेशियां बच्चे को
बाहर धकेलने लगती हैं और बच्चा मां के प्राइवेट पार्ट के जरिए बाहर आ जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ घंटों का वक्त लग जाता है।

क्या मैं बच्चा पैदा कर सकती/सकता हूं ?
लड़कियों और लड़कों दोनों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या वे भी ऐसा कर सकते हैं। उन्हें इस सवाल का जवाब इस तरह दे सकते हैं - नहीं , तुम ऐसा नहीं कर सकते। बच्चा पैदा करने के लिए हमें शारीरिक , मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत और विकसित होना बहुत जरूरी है। अभी तुम्हारा शरीर उतना विकसित नहीं है। तुम्हारे शरीर के अंदर अभी वे सभी प्रक्रियाएं भी शुरू नहीं हुई हैं , जो बच्चा पैदा करने के लिए जरूरी हैं , लेकिन जब तुम बड़े हो जाओगे , तो तुम्हारा शरीर इस काम के लिए तैयार हो जाएगा।

बाल यौन शोषण(चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज)
बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोग दिखने में सामान्य ही होते हैं , लेकिन देखा गया है कि ऐसे लोग बच्चों के साथ जरूरत से ज्यादा वक्त बिताते हैं और उनके साथ ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को पकड़ना या उनकी पहचान कर पाना आसान नहीं है। कई बार ऐसे लोग आपके बेहद नजदीकी भी हो सकते हैं , जिन पर आप शक भी नहीं कर पाएंगे। ऐसे में बेहतर यही है कि बच्चे को बाल यौन शोषण के बारे में परिचित कराएं और उसे साफ-साफ बताएं कि अगर कोई भी उसके साथ ऐसी हरकत करता है तो वह फौरन आपको बताए।

ऐसे समझाएं बच्चे को
यौन शोषण से बच्चे खुद को बचा सकें , इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि उन्हें पूरी सेक्स एजुकेशन ही दी जाए। देखिए , एक जागरूक और समझदार मां अपनी पांच साल की बेटी को कैसे बता रही है इस सबके बारे में। आप भी यह तरीका अपना सकते हैं:
- बेटा , टच तीन तरह के होते हैं। गुड टच , बैड टच और सीक्रेट टच।
- गुड टच वह टच होता है , जिससे तुम्हें खुशी मिलती है। जैसे कोई तुम्हें गले से लगा ले , तुमसे हाथ मिला ले , तुम्हारी पीठ थपथपा दे या हाई फाइव करे।
- दूसरी तरफ बैड टच तुम्हें परेशान करता है। इससे तुम्हें बुरा लगता है। मसलन कोई तुम्हें नोच ले , चिकोटी काट ले या किक मार दे।
- अब बात सीक्रेट टच की। सीक्रेट टच के दो हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा यह है कि यह टच तुम्हारे प्राइवेट पार्ट्स पर किया जाता है यानी शरीर के उन हिस्सों पर जो स्विम सूट पहनने के दौरान कवर हो जाते हैं। मोटे तौर पर ये तीन अंग हैं: सीना , बॉटम और आगे का हिस्सा। याद रखो , ये प्राइवेट हिस्से हैं और इन्हें देखने और टच करने का अधिकार किसी को नहीं है। सीक्रेट टच का दूसरा हिस्सा यह होता है कि ऐसा टच करने वाला व्यक्ति तुम्हें यह कहेगा कि इस बात को किसी को मत बताना। हो सकता है , वह तुम्हें डराए और धमकाए कि यह बात किसी को नहीं बतानी है।

यहां यह जानना जरूरी है कि नहलाते वक्त मां ऐसा कर सकती है। वह सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि वह कभी नहीं कहती कि यह बात किसी को बताना मत। इसी तरह डॉक्टर अगर तुम्हें इन जगहों पर टच करते हैं , तो वह भी सीक्रेट टच नहीं है क्योंकि डॉक्टर भी यह कभी नहीं कहते कि यह किसी से कहना मत। हालांकि डॉक्टर तुम्हारे इन अंगों को चेक तभी कर सकते हैं , जब तुम्हारे मां या पापा में से कोई साथ हो। लेकिन अगर कोई शख्स तुम्हें ऐसी जगहों पर टच करे और तुम्हें धमकाए या कहे कि यह बात किसी को मत बताना तो यह बात तुम्हें फौरन अपने मम्मी या पापा को जरूर बतानी है।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. सय्यारा अंसारी चाइल्ड साइकायट्रिस्ट , कोलंबिया एशिया अस्पताल
डॉ. समीर पारिख , साइकायट्रिस्ट , मैक्स हेल्थ केयर

एक्सपर्ट्स से पूछें
हर बच्चा अपने आप में यूनीक है और हर बच्चे के मन में उठने वाले सवालों का स्तर भी। हमने कई आम सवालों को छूने की कोशिश की है , फिर भी अगर आपका बच्चा कोई ऐसा सवाल पूछता है जिसका यहां जिक्र होने से रह गया है , तो आप हमें अपना सवाल हिंदी या अंग्रेजी में लिख सकते हैं। मेल करें: sundaynbt@gmail.com पर। हमारे एक्सपर्ट आपको बताएंगे कि उस सवाल का सही जवाब बच्चे को कैसे दिया जाए। आपके सवाल हमें मंगलवार तक मिल जाने चाहिए।

कुछ उलझन भरी स्थितियां
- अगर बच्चा पैरंट्स को लवमेकिंग करते देख ले।
अगर बच्चा पैरंट्स को प्राइवेट पलों में देख ले , तो उसके मन पर इसका गहरा असर हो सकता है। ऐसे में उसे हर बात समझाना जरूरी है। अगर पैरंट्स ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि बच्चे के सामने आ सकें और बच्चा अचानक कमरे में आ जाता है , तो हड़बड़ाएं नहीं। उसे आराम से कह दें , बेटा अभी मां-पापा को प्राइवेट टाइम चाहिए। अभी अपने कमरे में चले जाओ , तो कुछ ही मिनट में हम आपसे बात करेंगे। बाद में बच्चे को समझाएं कि मां-पापा एक-दूसरे को प्यार कर रहे थे। ऐसा करते वक्त हम दरवाजा बंद कर लेते हैं क्योंकि यह सब प्राइवेट होता है , लेकिन आज हम दरवाजा बंद करना भूल गए। अब बच्चे के रिएक्शन देखें। अगर बच्चा अभी भी परेशान है तो उसे समझाएं कि न तो उसने ऐसे अचानक आकर कोई गलती की है और न ही मां-पापा कोई गलत काम कर रहे थे। यह सब नॉर्मल है। कोशिश करें कि बच्चे के मन में कहीं भी यह भाव न पनपने पाए कि पापा मां को परेशान कर रहे थे।

- अगर टीवी देखते हुए कोई लवमेकिंग या किसिंग सीन आ जाता है।
टीवी देखते वक्त अगर अचानक किसिंग या लवमेकिंग सीन आ जाए तो हड़बड़ाएं नहीं और न ही टीवी बंद करने या चैनल बदलने की कोशिश करें। सहज भाव से उसे वैसे ही चलने दें और जब सीन खत्म हो जाए तो बच्चे को देखें। अगर वह असहज है या खुद ही उसके बारे में पूछ बैठता है तो इसे शिक्षा देने का एक मौका समझें। बच्चे को उसकी उम्र के मुताबिक , इस बारे में समझा सकते हैं। मसलन ये लोग आपस में प्यार कर रहे थे या यह दो बड़े लोगों के बीच प्यार करने का एक तरीका होता है। अगर आप असहज हो गए या चैनल बदला तो बच्चे पर गलत असर हो सकता है , लेकिन उसे सही सूचना देने से उस पर गलत असर कभी नहीं होगा।

- अगर बच्चा बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते चुपचाप देखने की कोशिश करता है।
जिज्ञासा के चलते बच्चे छुपकर बड़ों को कपड़े बदलते या नहाते देखने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा होना नॉर्मल है। ऐसे में , उन्हें समझाएं कि यह गलत बात हैं। किसी को भी छिपकर नहीं देखना चाहिए। उनसे कहें- तुम्हें भी यह अच्छा नहीं लगेगा कि तुम्हें कोई छिपकर देखे। इसलिए तुम्हें भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए। भूलकर भी बच्चे को डांटें नहीं। उसे यह एहसास न होने दें कि उसने कोई गलत काम कर दिया है। अगर बच्चे को थोड़ी समझ है तो इस मौके पर उसे पुरुष और स्त्री के अंगों के बारे में भी थोड़ी जानकारी दी जा सकती है।

समझाते वक्त पैरंट्स रखें ध्यान
- बच्चे को सेक्स से संबंधित ज्ञान देने की कोई उम्र नहीं होती। यह हर बच्चे के स्तर पर निर्भर करता है। वैसे बच्चे की सेक्स एजुकेशन तभी शुरू हो जाती है , जब वह पालने में होता है।
- बच्चे जब भी सेक्स से संबंधित कोई सवाल पूछें तो उसे एक ऐसे मौके के तौर पर देखना चाहिए , जब आप बच्चे की सेक्स एजुकेशन की शुरुआत कर सकते हैं।
- बच्चे जब भी इस तरह के सवाल पूछें , तो कोशिश यह होनी चाहिए कि उनके इन सवालों के जवाब एकांत में दिए जाएं। अगर बच्चा किसी के सामने सवाल पूछ बैठता है तो उसे प्यार से कह दें कि इसके बारे में हम तुम्हें बाद में बताएंगे और फिर इस वादे को पूरा करें।
- किसी भी सवाल का जवाब इस अंदाज में न दिया जाए , जो बालक की भावनाओं को भड़काए या उत्तेजित करे।
- बच्चे के साथ सख्त और गैर-दोस्ताना रवैया न रखें। आप जो भी बता रहे हैं , वह उसके विकासकाल के मुताबिक होना चाहिए। वैसे ज्यादा ज्ञान भी दे देंगे तो उसका कोई नुकसान नहीं होगा। ज्ञान कभी हानिकारक हो ही नहीं सकता।
- बच्चा अगर शांत स्वाभाव का है तो उसे इस विषय की ज्यादा बातें बता सकते हें , जबकि चंचल बच्चों को थोड़ा कम ज्ञान देना ही ठीक रहता है।
- अगर कभी बच्चे के किसी सवाल का जवाब मालूम नहीं है या उसने कोई ऐसा प्रश्न पूछ डाला जिसका जवाब देने में आप झिझकते हैं या देना नहीं चाहते तो आप उससे कह सकते हैं - तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है , लेकिन हमें भी इसका जवाब पता नहीं है। हम इसका जवाब मालूम करने की कोशिश करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।
- ध्यान रखें , मां-बाप का आपस में और बच्चे के प्रति जैसा बर्ताव होगा , बच्चा सेक्स संबंधी ज्ञान को उसी के अनुरूप लेगा। जिन मां-बाप के बीच प्रेम होता है और जो बच्चे को भी इस बात का एहसास कराते हैं कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं , उनके बच्चों के सेक्स संबंधी ज्ञान में ज्यादा और बेहतरीन तरीके से बढ़ोतरी होती है।



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रेव का रोग

एक रेव पार्टी में सच्चाई यह है कि महानगरों के धनाढ्य तबकों तक सिमटे मौज-मस्ती के ऐसे आयोजन अब छोटे शहरों में भी अपने पांव पसारने लगे हैं। नशे में डूबे चरम मौज-मस्ती के लिए जाने जाने वाले इन आयोजनों में जैसा भोंडा प्रदर्शन होता है, वह किसी भी समाज और संस्कृति को अंधी खाई की ओर ले जाने वाला है। मादक पदार्थों के सेवन के बाद झूमते युवाओं की दुनिया रेव पार्टी के उस हॉल के भीतर सिमटी होती है, जहां उन्हें अपनी यौन ग्रंथियों के सार्वजनिक प्रदर्शन की भी खुली छूट होती है। दरअसल, हाल के वर्षों में समाज के एक तबके के बीच सार्वजनिक जीवन में पैसे के प्रदर्शन की जो प्रवृत्ति पैदा हुई है, उसमें मनोरंजन का रास्ता इसी तरह के अतिवादी ठिकानों की ओर जाता है। ऐसी पार्टियों का आयोजन अखबारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों या इंटरनेट पर 'फ्रेंडशिप क्लब' और 'दोस्त बनाएं' जैसे विज्ञापनों की आड़ में और गोपनीय मोबाइल संदेशों के जरिए किया जाता है। इसके आयोजक जरूरत से ज्यादा पैसे होने से उपजी नकारात्मक ग्रंथियों को भुनाने के मकसद से अपना धंधा चलाते हैं। उनके जाल में ऐसे युवा आसानी से फंस जाते हैं, जिनके पास पैसे की कमी नहीं होती और जिनके लिए नशे में तमाम वर्जनाओं को ताक पर रख देना ही मनोरंजन है। विडंबना है कि ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ न कोई कार्रवाई हो पाती है न इन्हें छापने वाले समाचार माध्यम अपनी जिम्मेदारी समझ पा रहे हैं। अब तक जितनी जगहों पर पुलिस  
ने छापे मारे, वहां अश्लील हरकतों में लिप्त सौ से ज्यादा युवा पकड़े गए और भारी मात्रा में चरस, अफीम आदि नशीले पदार्थ बरामद हुए। जाहिर है, ऐसी पार्टियां मौज-मस्ती के नाम पर नशाखोरी, देह-व्यापार और दूसरी गैरकानूनी हरकतों के लिए जगह मुहैया कराती हैं।
यह सही है कि पश्चिमी देशों से आयातित इस शौक का दायरा अभी समाज के एक छोटे तबके तक सीमित है, जिसके पास खूब पैसा है। वह अपना हर पल ऐसे माहौल में बिताना चाहता है जहां आर्थिक या सामाजिक, किसी भी तरह के प्रभुत्व से उपजी कुंठाओं के प्रदर्शन की खुली छूट हो। उसे व्यापक समाज या मानवीय संवेदनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। मगर चिंता की बात है कि अगर इसका दायरा फैलता है तो बाकी समाज भी इसके असर से अछूता नहीं रहेगा। समाज का एक तबका अपने मनोरंजन के लिए कोई खास तरीका अपनाता है तो इस पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर यह कोई सकारात्मक असर छोड़ने और व्यापक स्वीकार्यता के बजाय न सिर्फ नकारात्मक पहलुओं की बुनियाद पर खड़ा होता, बल्कि उसको बढ़ावा देता है तो निश्चित तौर पर यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। रेव पार्टियां इस कसौटी पर कहां हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनमें चोरी-छिपे शामिल होने वाले तमाम पक्ष खुद एक अपराधबोध से भरे रहते हैं। यह बेवजह नहीं है कि जब पुलिस छापों में लोग पकड़े जाते हैं तो बचाव के लिए उनके पास कोई दलील नहीं होती। ऐसे आयोजनों के ठिकाने प्रशासन की नजर से ओझल नहीं हैं। इससे विचित्र क्या होगा कि बड़े होटलों तक में इनका इंतजाम होने लगा है। अगर संजीदगी दिखाई जाए तो रेव पार्टियों के आयोजन पर लगाम कसना मुश्किल नहीं है।
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शिक्षा की मुश्किलें


कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि शिक्षा का अधिकार कानून निजी स्कूलों पर भी लागू होता है। मगर सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को मानने के लिए उन्हीं स्कूलों को बाध्य किया जा सकता है जो सरकार के शिक्षा विभाग में पंजीकृत हैं। देश में बिना पंजीकरण के चलने वाले स्कूलों की तादाद इतनी बड़ी है कि कई राज्य सरकारों के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल पंजाब में नौ हजार आठ सौ में से तीन हजार आठ सौ स्कूल बिना पंजीकरण के चल रहे हैं। समझा जा सकता है कि इस तरह कितने सारे निजी स्कूल पंजीकरण की तकनीकी अनिवार्यता पूरी न करने का फायदा उठा रहे होंगे। इसलिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के सभी स्कूलों को अपने राज्य के शिक्षा विभाग में अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने का निर्देश दिया है, ताकि वहां भी इस कानून पर अमल सुनिश्चित कराया जा सके। इसके तहत सभी स्कूलों के लिए राज्य के शिक्षा विभाग की ओर से तय की गई कसौटियों और शर्तों को पूरा करने के बाद पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है। कमी पाए जाने पर विभाग संबंधित स्कूल का पंजीकरण रद्द कर सकता है।
दरअसल, जब से शिक्षा व्यवसाय का एक बेहतर माध्यम बन गई है, जहां-तहां स्कूल खुलने लगे हैं। इसमें बहुत सारे लोग स्कूल खोलने के लिए तय मानकों का पालन करना जरूरी नहीं समझते। यही वजह है कि बहुत सारे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, प्रयोगशाला, पुस्तकालय आदि के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। बहुत सारे स्कूलों के भवन तक आधे-अधूरे बने हैं। उनमें शिक्षकों की भर्ती वगैरह के मामले में भी तय   मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता। ऐसे स्कूलों का इरादा पहले फीस से कमाई करने और फिर उससे जरूरी संसाधन जुटाने का होता है। जब यह स्थिति बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर दिखाई देती है तो छोटे शहरों और कस्बों में क्या हालत होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है, ऐसे स्कूल पंजीकरण से बचने की कोशिश करते हैं। इसमें स्कूल खोलने संबंधी लचीले नियम-कायदों से भी उन्हें बल मिलता है। ऐसे में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के ताजा आदेश का वे कितना पालन कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। जब से छह से चौदह साल के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ है, सबसे बड़ी उलझन इस बात को लेकर रही है कि निजी स्कूलों में इन नियम-कायदों को सहजता से कैसे अमल में लाया जाए। महज मुनाफे को अपना मकसद मानने वाले निजी स्कूल इस कानून के तहत पचीस फीसद सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करने के प्रावधान से बचने की कोशिश करते रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अदालत का भी सहारा लिया था। इस तरह केवल निजी स्कूलों में इन कानूनों पर अमल से समस्या का समाधान निकालना आसान नहीं है। हकीकत है कि देश भर में शिक्षकों के लाखों पद खाली पड़े हैं। जहां भर्तियां हो भी रही हैं, वहां प्रशिक्षित शिक्षकों के बजाय बहुत कम वेतन पर शिक्षा-मित्र या अप्रशिक्षित लोगों से काम चलाया जा रहा है। बहुत सारे स्कूल बिना भवन के चल रहे हैं। नए स्कूल खोलना कठिन बना हुआ है। स्कूलों में अगर बुनियादी ढांचे से लेकर शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात और शैक्षिक गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो शिक्षा का अधिकार कानून महज औपचारिकता बन कर रह जाएगा।

Saturday, May 26, 2012

प्रशंसा जरूर कीजिए, मगर...

एक कक्षा में रजत नाम के चार विद्यार्थी थे। उनमें से तीन रजत तो पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे थे, मगर एक रजत कमजोर था। पढ़ने-लिखने की बजाय वह शरारतों में ही अपना सारा समय निकाल देता। एक दिन उसके अध्यापक कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें शरारती रजत के पिता मिले। रजत के पिता ने अध्यापक से अपने बेटे की पढ़ाई के बारे में पूछा। अध्यापक उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाए कि वो कौन से रजत के पिता हैं। उन्होंने उसे दूसरे रजत का पिता समझा जो कक्षा में सबसे अच्छा था और कहा कि रजत तो कक्षा में सबसे अच्छा लड़का है। उसकी पढ़ाई ठीक चल रही है। घर आकर शरारती रजत के पिता ने जब यह बात रजत को बताई तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ।

अगले दिन रजत जब स्कूल गया तो उसने अपने अध्यापक से
पूछा- सर, क्या कल आपने मेरे पिताजी से कहा था कि मैं एक अच्छा लड़का हूं और मेरी पढ़ाई ठीक चल रही है? अध्यापक को अपनी भूल का पता चला, लेकिन उन्होंने कहा- हां, तुम एक अच्छे लड़के हो और तुम्हारी पढ़ाई भी ठीक चल रही है।

वह एक अच्छा लड़का है और उसकी पढ़ाई भी ठीक चल रही है, यह सुनकर पहले तो खुद रजत को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन फिर वह अनोखी खुशी से भर गया। बार-बार उसके भीतर से यह आवाज आने लगी, वह एक अच्छा लड़का है और उसकी पढ़ाई भी ठीक चल रही है। रजत का आत्मविश्वास लौटने लगा। उसने उसी क्षण से शरारत छोड़ दी और वह उस बात को वास्तविकता में बदलने के लिए जोर-शोर से पढ़ाई में जुट गया। उस साल वार्षिक परीक्षा में वह बहुत अच्छे अंकों से पास हुआ। रजत सचमुच एक अच्छा विद्यार्थी बन चुका था। यह हुआ अध्यापक द्वारा उसकी प्रशंसा किए जाने पर।

अच्छे विद्यार्थी अपने माता-पिता और अध्यापकों के विश्वास को कभी नहीं तोड़ते। इसलिए अपने बच्चों और विद्यार्थियों की प्रशंसा करें। यह प्रशंसा उन्हें आगे बढ़ने में मदद करती है। प्रशंसा करना और प्रशंसा पाना, दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। आलोचना करना सरल है, पर प्रशंसा करना थोड़ा कठिन। प्रशंसा वही कर सकता है, जो सकारात्मक दृष्टिकोण रखता हो।

प्रशंसा उस धूप के समान है जो सीलन, नमी और फफूंदी को दूर कर देती है। प्रशंसा संगीत है, एक कला है। जिसने इस कला को सीख लिया, उसने अपना और दूसरों का दृष्टिकोण संवार दिया। यह सकारात्मक दृष्टिकोण ही तो है जो हमें हर प्रकार की सफलता दिलवाने में सहायक होता है। इसलिए सफलता पाने के लिए प्रशंसा करना सीखें।

लेकिन ध्यान रखें, प्रशंसा का मतलब चापलूसी हर्गिज नहीं है। एक चापलूस व्यक्ति न स्वयं आगे बढ़ता है और न वह व्यक्ति जिसे चापलूसी पसंद होती है। कई बार किसी से काम निकलवाने या काम ठीक से करवाने के लिए हम कुछ प्रलोभन अथवा पुरस्कार भी देते हैं। लेकिन इसका प्रभाव कभी स्थायी नहीं होता। लेकिन ईमानदार प्रशंसा का प्रभाव स्थायी होता है। प्रशंसा सबसे बड़ा प्रलोभन अथवा पुरस्कार है। सात्विक भाव से की गई गलत प्रशंसा का भी अच्छा ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन जहां तक हो सके, प्रशंसा करने में ईमानदार रहें।

जो कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते, उन्हें कर्मशील बनाने के लिए तो प्रशंसा और भी जरूरी है। ईमानदारी से की गई प्रशंसा स्वीकार्य बनाती है। प्रशंसित व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा हो जाता है, क्योंकि गलत काम के लिए तो कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता। प्रशंसा व्यक्ति की हो अथवा उसके काम की, प्रशंसा वास्तव में काम की ही होती है। इसलिए प्रशंसित व्यक्ति जो कुछ भी करेगा अच्छा ही करेगा।

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विकास

विकास जहां होता है, वहां लोग भाग्यशाली होते हैं। आपकी आप जानें मगर हम तो इस मायने में जरूरत से ज्यादा भाग्यशाली हैं। हमें विकास की राह नहीं देखना पड़ती है। विकास हमारे आगे-आगे चलता है। एक काम हुआ नहीं कि दूसरा शुरू हो जाता है। विकास के लिए विकास होना आवश्यक है। हमारे यहां तो विकास निरंतर दौड़ रहा है। हमारे यहां विकास के प्रति जनप्रतिनिधि इतने सजग हैं कि हर काम फुर्ती से करवाते हैं। करवाते ही नहीं उसकी निरंतर निगरानी भी करते हैं। विकास की व्यवस्था को समझने वाले जिस तरह हमारे यहां हैं वैसे सभी दूर होना चाहिए।

अब देखिए कितनी ऊंची सोच है हमारे जनप्रतिनिधियों की। पहले सड़क बनवाते हैं और उसके बाद पाइप लाइन डालने का कार्य करवाते हैं। जब पाइप लाइन डलती है तो सड़क पूरी खुद जाती है, लिहाजा सड़क फिर से बनाई जाती है। सड़क बन गई तो अब केबल डालने का कार्य होता है इसमें सड़क फिर खुद जाती है। सड़क तीसरी बार बनाई जाती है। सड़क बनी और फिर योजना बन जाती है सीवर व्यवस्था को मजबूत करने की। तो फिर से सड़क खुदती है और बनती हैं। अगर आपको हमारी बात पर विश्वास हो तो इसे सच मानें कि हमारे यहां की सड़कें एक साल में चार बार बन चुकी है और अभी भी बन रही है। ऎसा आपके यहां भी हो रहा होगा यानी आप भी कम भाग्यशाली नहीं हैं। दरअसल विकास की अवधारणा भी यही होती है। निरंतर विकास कार्य होते रहें यह आवश्यक है।

विकास के कार्य निरंतर होने से ही जनप्रतिनिधियों का विकास हो पाता है। कोई अपने क्षेत्र में सीमेन्ट की सड़कें बनवा दें तो अगला प्रतिनिधि उसे उखड़वा सकता है क्योंकि वह सीमेंटेड सड़को की बजाए डामर की सड़कों का पक्षधर होता है। डामर की सड़कें होंगी तो वर्षभर मरम्मत कार्य चलता रहेगा। विकास के पाठ का एक बिन्दु यह भी है जो अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मूल निर्माण कार्य से अधिक "स्कोप" मरम्मत कार्य में होता है। तालाब बनाना हो तो फटाफट बन जाए मगर तालाब की एक पाल की मरम्मत करना हो तो महीनों लग जाएं। यानी मरम्मत का कार्य पूर्ण गंभीरता से करना होता है। मरम्मत के कार्य में खरपतवार का हस्तक्षेप भी नहीं हो पाता है। खरपतवार वही जो किसी भी फसल के साथ जबरन उगकर मूल फसल की वृद्धि में रूकावट पैदा करती है। विकास के कार्य में भी ऎसी खरपतवार पैदा हो ही जाती है।

कोई कार्य स्वीकृत हुआ नहीं कि अपना कमीशन पाने की जुगाड़ में ये खरपतवारनुमा व्यक्ति लार टपकाते पहुंच ही जाते हैं। हर किसी को कमीशन देते-देते ठेकेदार के मन में वैराग्य भाव उत्पन्न हो जाते हैं। वह सोचने लगता है कि मेहनत मैं करूं और खिलाऊं इन्हें? यानी वह इस खरपतवार से परेशान हो जाता है।

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प्रशंसा जरूर कीजिए, मगर...

एक कक्षा में रजत नाम के चार विद्यार्थी थे। उनमें से तीन रजत तो पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे थे, मगर एक रजत कमजोर था। पढ़ने-लिखने की बजाय वह शरारतों में ही अपना सारा समय निकाल देता। एक दिन उसके अध्यापक कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें शरारती रजत के पिता मिले। रजत के पिता ने अध्यापक से अपने बेटे की पढ़ाई के बारे में पूछा। अध्यापक उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाए कि वो कौन से रजत के पिता हैं। उन्होंने उसे दूसरे रजत का पिता समझा जो कक्षा में सबसे अच्छा था और कहा कि रजत तो कक्षा में सबसे अच्छा लड़का है। उसकी पढ़ाई ठीक चल रही है। घर आकर शरारती रजत के पिता ने जब यह बात रजत को बताई तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ।

अगले दिन रजत जब स्कूल गया तो उसने अपने अध्यापक से
पूछा- सर, क्या कल आपने मेरे पिताजी से कहा था कि मैं एक अच्छा लड़का हूं और मेरी पढ़ाई ठीक चल रही है? अध्यापक को अपनी भूल का पता चला, लेकिन उन्होंने कहा- हां, तुम एक अच्छे लड़के हो और तुम्हारी पढ़ाई भी ठीक चल रही है।

वह एक अच्छा लड़का है और उसकी पढ़ाई भी ठीक चल रही है, यह सुनकर पहले तो खुद रजत को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन फिर वह अनोखी खुशी से भर गया। बार-बार उसके भीतर से यह आवाज आने लगी, वह एक अच्छा लड़का है और उसकी पढ़ाई भी ठीक चल रही है। रजत का आत्मविश्वास लौटने लगा। उसने उसी क्षण से शरारत छोड़ दी और वह उस बात को वास्तविकता में बदलने के लिए जोर-शोर से पढ़ाई में जुट गया। उस साल वार्षिक परीक्षा में वह बहुत अच्छे अंकों से पास हुआ। रजत सचमुच एक अच्छा विद्यार्थी बन चुका था। यह हुआ अध्यापक द्वारा उसकी प्रशंसा किए जाने पर।

अच्छे विद्यार्थी अपने माता-पिता और अध्यापकों के विश्वास को कभी नहीं तोड़ते। इसलिए अपने बच्चों और विद्यार्थियों की प्रशंसा करें। यह प्रशंसा उन्हें आगे बढ़ने में मदद करती है। प्रशंसा करना और प्रशंसा पाना, दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। आलोचना करना सरल है, पर प्रशंसा करना थोड़ा कठिन। प्रशंसा वही कर सकता है, जो सकारात्मक दृष्टिकोण रखता हो।

प्रशंसा उस धूप के समान है जो सीलन, नमी और फफूंदी को दूर कर देती है। प्रशंसा संगीत है, एक कला है। जिसने इस कला को सीख लिया, उसने अपना और दूसरों का दृष्टिकोण संवार दिया। यह सकारात्मक दृष्टिकोण ही तो है जो हमें हर प्रकार की सफलता दिलवाने में सहायक होता है। इसलिए सफलता पाने के लिए प्रशंसा करना सीखें।

लेकिन ध्यान रखें, प्रशंसा का मतलब चापलूसी हर्गिज नहीं है। एक चापलूस व्यक्ति न स्वयं आगे बढ़ता है और न वह व्यक्ति जिसे चापलूसी पसंद होती है। कई बार किसी से काम निकलवाने या काम ठीक से करवाने के लिए हम कुछ प्रलोभन अथवा पुरस्कार भी देते हैं। लेकिन इसका प्रभाव कभी स्थायी नहीं होता। लेकिन ईमानदार प्रशंसा का प्रभाव स्थायी होता है। प्रशंसा सबसे बड़ा प्रलोभन अथवा पुरस्कार है। सात्विक भाव से की गई गलत प्रशंसा का भी अच्छा ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन जहां तक हो सके, प्रशंसा करने में ईमानदार रहें।

जो कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते, उन्हें कर्मशील बनाने के लिए तो प्रशंसा और भी जरूरी है। ईमानदारी से की गई प्रशंसा स्वीकार्य बनाती है। प्रशंसित व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा हो जाता है, क्योंकि गलत काम के लिए तो कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता। प्रशंसा व्यक्ति की हो अथवा उसके काम की, प्रशंसा वास्तव में काम की ही होती है। इसलिए प्रशंसित व्यक्ति जो कुछ भी करेगा अच्छा ही करेगा।

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विकास

विकास जहां होता है, वहां लोग भाग्यशाली होते हैं। आपकी आप जानें मगर हम तो इस मायने में जरूरत से ज्यादा भाग्यशाली हैं। हमें विकास की राह नहीं देखना पड़ती है। विकास हमारे आगे-आगे चलता है। एक काम हुआ नहीं कि दूसरा शुरू हो जाता है। विकास के लिए विकास होना आवश्यक है। हमारे यहां तो विकास निरंतर दौड़ रहा है। हमारे यहां विकास के प्रति जनप्रतिनिधि इतने सजग हैं कि हर काम फुर्ती से करवाते हैं। करवाते ही नहीं उसकी निरंतर निगरानी भी करते हैं। विकास की व्यवस्था को समझने वाले जिस तरह हमारे यहां हैं वैसे सभी दूर होना चाहिए।

अब देखिए कितनी ऊंची सोच है हमारे जनप्रतिनिधियों की। पहले सड़क बनवाते हैं और उसके बाद पाइप लाइन डालने का कार्य करवाते हैं। जब पाइप लाइन डलती है तो सड़क पूरी खुद जाती है, लिहाजा सड़क फिर से बनाई जाती है। सड़क बन गई तो अब केबल डालने का कार्य होता है इसमें सड़क फिर खुद जाती है। सड़क तीसरी बार बनाई जाती है। सड़क बनी और फिर योजना बन जाती है सीवर व्यवस्था को मजबूत करने की। तो फिर से सड़क खुदती है और बनती हैं। अगर आपको हमारी बात पर विश्वास हो तो इसे सच मानें कि हमारे यहां की सड़कें एक साल में चार बार बन चुकी है और अभी भी बन रही है। ऎसा आपके यहां भी हो रहा होगा यानी आप भी कम भाग्यशाली नहीं हैं। दरअसल विकास की अवधारणा भी यही होती है। निरंतर विकास कार्य होते रहें यह आवश्यक है।

विकास के कार्य निरंतर होने से ही जनप्रतिनिधियों का विकास हो पाता है। कोई अपने क्षेत्र में सीमेन्ट की सड़कें बनवा दें तो अगला प्रतिनिधि उसे उखड़वा सकता है क्योंकि वह सीमेंटेड सड़को की बजाए डामर की सड़कों का पक्षधर होता है। डामर की सड़कें होंगी तो वर्षभर मरम्मत कार्य चलता रहेगा। विकास के पाठ का एक बिन्दु यह भी है जो अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मूल निर्माण कार्य से अधिक "स्कोप" मरम्मत कार्य में होता है। तालाब बनाना हो तो फटाफट बन जाए मगर तालाब की एक पाल की मरम्मत करना हो तो महीनों लग जाएं। यानी मरम्मत का कार्य पूर्ण गंभीरता से करना होता है। मरम्मत के कार्य में खरपतवार का हस्तक्षेप भी नहीं हो पाता है। खरपतवार वही जो किसी भी फसल के साथ जबरन उगकर मूल फसल की वृद्धि में रूकावट पैदा करती है। विकास के कार्य में भी ऎसी खरपतवार पैदा हो ही जाती है।

कोई कार्य स्वीकृत हुआ नहीं कि अपना कमीशन पाने की जुगाड़ में ये खरपतवारनुमा व्यक्ति लार टपकाते पहुंच ही जाते हैं। हर किसी को कमीशन देते-देते ठेकेदार के मन में वैराग्य भाव उत्पन्न हो जाते हैं। वह सोचने लगता है कि मेहनत मैं करूं और खिलाऊं इन्हें? यानी वह इस खरपतवार से परेशान हो जाता है।

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अकेले पड़ते ईमानदार लोग

अकेले पड़ते ईमानदार लोग
यह हो सकता है कि एस.पी. महांतेश नाम के अधिकारी के बारे में आपने नहीं सुना हो। कर्नाटक के चीफ जस्टिस के घर के सामने इस अधिकारी की धारदार हथियारों से हत्या कर दी गई। जब तक यह अधिकारी अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ता रहा कर्नाटक के मुख्यमंत्री जो उसी विभाग के मंत्री हैं, देखने तक नहीं गए। महांतेश कर्नाटक के कॉपरेटिव ऑडिट महानिदेशालय में उपनिदेशक थे। इनके आते ही कर्नाटक में ढेरों कॉपरेटिव घोटालों का पर्दाफाश होने लगा। कई बार मारने और डराने की कोशिशों के बाद भी महांतेश का इरादा कमजोर नहीं हुआ। अफसोस, अब यह अधिकारी हमारे बीच नहीं है, क्योंकि हमारे ईमानदार भविष्य के लिए लड़ते हुए मार दिया गया है। मुझे नहीं मालूम कि आप नीमच, शिवपुरी, बंगलूरू, कोलकाता, श्रीगंगानगर और अलवर में महांतेश के बारे में पढ़ते हुए क्या सोच रहे होंगे। शायद यही कि सिस्टम से कौन लड़े। कोई नहीं लड़ सकता। गनीमत है कि महांतेश ने हमारी तरह नहीं सोचा। हमारी सहानुभूति की भी परवाह नहीं की। अपनी और अपने परिवार की जिंदगी दांव पर लगाकर एक के बाद एक घोटाले का पर्दाफाश करते चले गए।

अप्रेल के महीने में दिल्ली में रवींदर बलवानी की हत्या हो गई। पुलिस दुर्घटना बताती रही है। परिवार के लोग हर दूसरे दिन हाथ में बैनर लिए खड़े रहते हैं कि आरटीआई कार्यकर्ता रवींदर बलवानी की हत्या हुई है। उनकी बेटियां समाज और सरकार से गुहार लगाती फिर रही हैं, लेकिन सौ-पांच सौ लोगों के अलावा किसी का कलेजा नहीं पसीजता। जुलाई 2010 में गुजरात हाई कोर्ट के करीब आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। ईमानदार अफसरों के सिस्टम से लड़ने और मारे जाने की घटनाएं मीडिया में जगह तो पा जाती हैं, मगर सरकारों पर असर नहीं पड़ता। ईमानदारी का बिगुल बजाने वाले अफसरों को सुरक्षा देने का कानून अटक-लटक कर ही चल रहा है। अगर हम अपने ईमानदार सिपाहियों के प्रति इतने ही सजग होते, तो एक मजबूत कानून बनने में दस साल न लगते। यही नहीं, अनेक सरकारी संस्थानों और निजी संस्थानों में भी ईमानदार लोगों को परेशान करने की खबरें आती रहती हैं।

संसद में व्हिसिल ब्लोअर विधेयक पड़ा हुआ है। इस बिल में सताने यानी उत्पीड़न को भी विस्तार से नहीं बताया गया है। गुमनाम शिकायत को स्वीकार न करने की बात कही गई है और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले को पीडित करने वाले अफसरों के लिए दंड की कोई व्याख्या नहीं की गई है। इस कानून की खामियों पर कई बार चर्चा हो चुकी है। दरअसल किसी बिगुल बजाने वाले को सुरक्षा देने के लिए कानून का इंतजार करना भी ठीक नहीं है। 2004 में ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून बनने से पहले भी सुरक्षा का प्रावधान होना चाहिए। इसके बाद भी महांतेश को कोई सुरक्षा नहीं दी गई।

क्या आप जानते हैं कि सत्येन्द्र दूबे ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में तीस हजार करोड़ रूपये के घोटाले की बात कही थी? क्या आपको पता है कि उन आरोपों का क्या हुआ? क्या सत्येन्द्र दूबे की मौत का इंसाफ सिर्फ इसी बात से मिल जाता है कि कुछ लोगों को आजीवन कैद की सजा दिला दी गई। हमारे सिस्टम ने ऎसा क्या किया, जिससे किसी सत्येन्द्र दूबे को जान जोखिम में डालने की नौबत ही न आए?

इतना ही नहीं, हमारा ध्यान ऎसे लड़ाकों पर तभी जाता है, जब वो मार दिए जाते हैं। मैं ऎसे कई लोगों को जानता हूं, जिन्होंने बैंक से लेकर कॉपरेटिव तक के बड़े घोटाले उजागर किए हैं, मगर उनके विभाग ने उन्हें तरह-तरह से प्रताडित कर मानसिक रूप से विक्षिप्त कर दिया है। आरटीआई ने बिगुल बजाने वालों को हथियार तो दे दिया, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया है। जो भ्रष्ट हैं, वो बुलेटप्रूफ जैकेट में चल रहे हैं और जो भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं, वो दिन दहाड़े मारे जा रहे हैं। अब मान लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर समाज और सियासत का पक्का गठजोड़ हो गया है। जब तक इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, महांतेश, मंजूनाथ, नरेन्द्र कुमार जैसे ईमानदार मारे जाते रहेंगे।

व्यवस्था से लड़ना किसी जंग से कम नहीं है। मध्य प्रदेश में ही लोकायुक्त के जरिये ढाई सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त हो चुकी है। जिस स्तर के अधिकारी पकड़े गए हैं उससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार में व्यवस्था के कौन-कौन लोग शामिल हैं। एक सवाल खुद से कीजिए। क्या आपको पता नहीं कि यह सब हो रहा है? क्या आप अपने सामाजिक जीवन में ऎसे भ्रष्ट लोगों से नहीं मिलते हैं? आपकी सहनशीलता तब क्यों नहीं टूटती, जब ऎसे लोग सामने होते हैं? तब आप सवाल क्यों नहीं करते? सवाल करने का ढोंग तभी क्यों करते हैं, जब कोई ईमानदार मार दिया जाता है।

दरअसल हम ईमानदारों के इस जंग में ईमानदारी से शामिल नहीं हैं। यह कैसा समय और समाज है कि नरेन्द्र कुमार और महांतेश के मार दिए जाने के बाद कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई चीत्कार नहीं है। राजनीति भी तो इसी समाज से आती है। तभी तो व्हिसिल ब्लोअर्स को सुरक्षा देने वाला विधेयक लोकसभा में पास हो जाने के बाद राज्य सभा में पेश होने का इंतजार ही कर रहा है। जल्दी न राजनीति को है न समाज को। हम अपनी पसंद के दल के भ्रष्टाचार से आंखें मूंद लेते हैं और विरोधी दलों पर सवाल उठाते हैं। अपना बचाकर दूसरे का दिखाने से सवाल का जवाब नहीं मिलता। हम आईपीएल जैसे तमाशे में पैसा खर्च करके भीड़ बन जाते हैं, मगर इन ईमानदार लोगों के लिए सड़कों पर नहीं निकलते। हमारे इसी दोहरेपन की दुधारी तलवार पर ईमानदार अफसरों की गर्दनें कट रही हैं।

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Friday, May 25, 2012

आधा पानी बर्बाद हो रहा है शहरों में

नई दिल्ली : सरकार ने माना है कि शहरी इलाकों में पाइपलाइन में लीकेज होने, पानी के अवैध कनेक्शन और चोरी आदि की घटनाओं से तकरीबन 50 परर्सेंट पानी की बर्बादी होती है।

जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल ने गुरुवार को लोकसभा में कहा, कई स्टडीज से पता चलता है कि शहरी इलाकों में 30 से 50 पर्सेंट पानी की बर्बादी होती है। इसे नॉन रेवेन्यू वॉटर (एनआरडब्ल्यू) कहा जाता है।

उन्होंने कहा कि 2008-09 के दौरान 28 शहरों में की गई पायलट स्टडी से पता चला कि औसत एनआरडब्ल्यू की मात्रा 39 पर्सेंट है। बंसल ने कहा कि शहरी विकास मंत्रालय ने जानकारी दी है कि पाइपलाइन में लीकेज और चोरी आदि की अन्य घटनाओं से पानी की बर्बादी होती है।

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HTML clipboard  मूर्ख कौन?
एक चरवाहे को कहीं से चमकीला पत्थर मिल गया। चमकीला पत्थर लेकर वह बाजार में गया। फुटपाथ पर बैठे दुकानदार ने वह पत्थर उससे आठ आने में खरीदना चाहा, परन्तु उसने उसे बेचा नहीं। आगे गया तो सब्जी बेचने वाले ने उसका मूल्य लगाया दो मूली। कपड़े की दुकान पर गया तो दुकानदार ने उसका दाम लगाया- थान भर कपड़ा। चरवाहे ने फिर भी नहीं बेचा, क्योंकि उसका मूल्य लगातार बढ़ता जा रहा था।

तभी एक व्यक्ति उसके पास आया और बोला, "पत्थर बेचोगे?" "बेचूंगा, सही दाम मिला तो?" "दाम बोलो" "हजार रूपए" "दिन में सपने देखते हो चमकीला है, तो क्या हुआ।" कहकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया। वह जोहरी था। समझ गया कि चरवाहा पत्थर का मूल्य नहीं जानता। वह चला गया कि फिर आता हूं। उसके जाते ही एक दूसरा जोहरी आया।

पत्थर को देखते ही उसकी आंखें खुल गई। दाम पूछा, तो चरवाहे ने बताया डेढ़ हजार रूपए। जोहरी ने डेढ़ हजार में हीरा खरीद लिया।

अब पहले वाला जोहरी उसके पास आया और बोला, "कहां है तुम्हारा पत्थर?" चरवाहे ने कहा, वह तो बेच दिया। "कितने में?" "डेढ़ हजार रूपए में।" जोहरी बोला, "मूर्ख आदमी, वह हीरा था जो लाखों का था। तुमने कौड़ी के भाव बेच दिया। चरवाहा बोला, "मूर्ख मैं नहीं, तुम हो। वह तो मुझे भेड़ चराते हुए मुफ्त में मिला था। मैंने उसे डेढ़ हजार में बेच दिया । लेकिन तुमने उसका मूल्य जानते हुए भी घाटे का सौदा किया। मूर्ख तुम हो या मैं।" जोहरी के पास अब कोई जवाब न था।

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देखते ही देखते
कसम से आदमी कितना बदल जाता है, इसका अनुमान हमें उनसे मिलने के बाद हुआ। वे हमारे बचपन के भायले थे। भायले भी क्या, जिगर के छल्ले थे। जवानी की बात है। वे हंसते थे तो मानो हरसिंगार के फूल झर रहे हों। वे चलते थे तो मानो एक मस्त अरबी घोड़ा चल रहा हो। वो नाचते थे तो मानो सारी कायनात को अपने संग नचा रहे हों।

उस जमाने में जब आदमी की उम्र इश्क-हुस्न पर शेर कहने की होती थी, तब वे कहा करते थे, "देखते ही देखते दुनिया से उठ जाऊंगा मैं; देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे।" उनके मुंह से यह शेर सुनकर हम धक से रह जाते, क्योंकि भरी जवानी में दुनिया से उठने की बात कौन करता है। और सचमुच ऎसा ही हुआ। वे दुनिया से तो नहीं उठे, लेकिन दुनियादारी से उठ गए। दुनियादारी यानी यारबाजी, मस्ती, हंसना-हंसाना और वह सब, जो दुनिया के लिए जरूरी होती है।

ऎसा नहीं कि उन्होंने ब्याह नहीं किया। ऎसा भी नहीं कि उन्होंने बाल- बच्चे पैदा न किए। ऎसा नहीं कि उन्होंने घर नहीं बनाया। उन्होंने इस जहान में वे सारे काम किए, जो एक इंसान करता है, पर बावजूद वे हमें दुनिया से उठे-उठे नजर आए। दुनिया से कटने और दुनिया से उठने में अन्तर है। दुनिया से कटने वाले संन्यासी कहलाते हैं और दुनिया से उठने वाले पैगम्बर। लेकिन हम हैरत में पड़ गए कि वे दुनिया से कटने और उठने के बावजूद न संन्यासी बने और न पैगम्बर।

अभी एक दिन टकरा गए। हमने पूछा, कैसे हो? उन्होंने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न किया, तुम्हें कैसा लगता हूं? हमने कहा, "ठीक ही लग रहे हैं।" वे बोले, "तुम्हें क्या पता कि मैं ठीक हूं?" हमने कहा, "हमने तो अनुमान लगाया। बेटे-बेटी का ब्याह निपटा दिया। ठीक से नौकरी कर ली। रिटायरी अच्छी कट रही है। घर में कार है। अपनी मरजी के मालिक हो।

और क्या चाहिए।" वे बोले, क्या सच वही है जो दिखलाई देता है। भ्रम भी तो सच हो सकता है। मैं बड़ा दुखी हूं। इतना दुखी कोई नहीं था। उनकी बातें सुन हमने कहा, "दुनिया में थोड़ा-थोड़ा दुखी तो सभी हैं। इसीलिए तो तथागत ने उस मृत पुत्र की मां से कहा था कि जाओ उस घर से एक मुटी सरसों ले आओ, जिस घर में कोई दुखी न हो।"

वे बोले, मैं तो जन्म से ही दुखी हूं। हमने कहा, यह असंभव है। क्या आपके जीवन में कभी सुख नहीं आया। वे बोले, मेरा तो जन्म ही एक दुर्घटना है। उनका दार्शनिक अंदाज में कहा गया यह वाक्य सुनकर हमारी बोलती बंद हो गई। लेकिन मन ही मन हमने एक शेर कहा, "जो होनी थी वो बात हो ली कहारों, चलो ले चलो इनकी डोली कहारों।"


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लाखों की खदान, पर गरीब
 

इंदौर/भोपाल। जिनके पास दो वक्त की रोटी का भरोसा नहीं है, वह लाखों की खदान के मालिक हैं। लाखों रूपए का खनिज उनकी खदान से निकलकर बाजार में बिक रहा है, लेकिन उनके आशियाने अब भी को मकान ही हैं। क्या यह संभव है कि लाखों की खदानों के मालिक की हालत ऎसी हो, लेकिन अपने प्रदेश में है। पन्ना जिले के दो मजदूर परिवार कागजों में खदानों के मालिक हैं, लेकिन खदानें दीगर लोगों के पास हैं और वे बिचौलिया बनकर खदान से निकले खनिज को कृषि राज्य मंत्री बृजेद्र प्रताप सिंह के परिजनों को बेच रहे है।

देश के दूसरे हिस्सों की तरह अपने प्रदेश में भी जनजातीय वर्ग, दलितो, पिछडों और गरीबो को भूखंड व खदानों के पटटे सिर्फ इसलिए दिए जाते है ताकि उनकी रेाजी-रेाटी का इंतजाम होने के साथ जीवन स्तर में कुछ सुधार आ सके, मगर सरकारेां की मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। इसका उदाहरण है लखुआ अहिरवार व दयाराम। गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले लखुआ व दयाराम के कोटमी बंडोरा में खदान के पटटे हैं, यह पटटे 10-10 वर्ष के लिए दिए गए है, मगर वे सिर्फ कागजी।

ऎसा इसलिए क्योंकि इन दोनों की ही खदानों का संचालन कोई और कर रहा है। दयाराम की खदान को नत्थू सिंह व लुखआ की खदान का संचालन जितेंद्र सिंह कर रहा है। इन दोनों ने सादे कागज पर अनुबंध कर दयाराम व लखुआ से खदाने आठ हजार व नौ हजार रूपए वार्षिक पर अपने कब्जे में ले रखी है।


अवैध खनन के दाग मंत्री के दामन पर
लखुआ और दयाराम की खदानों से निकलने वाले खनिज को नत्थू सिंह व जितेंद्र सिंह राधिका टेडर्स को बेचते है। यह राधिका टेडर्स राज्य के कृषि राज्यमंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह के छोटे भाई लोकेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी अंजू सिंह की है। नत्थू व जितेंद्र की अधिकृत फर्म नहीं है और न ही उसका पंजीयन है, फिर भी वह धडल्ले से गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले दयाराम व लखुआ की खदानों का खनिज बेचे जा रहे है। राधिका टैडर्स खरीदे गए खनिज को राज्य के बाहर भेजता है।


जिम्मेदारों ने माना हो रही गड़बड़ी
खदान की लीज किसी भी स्थिति में हस्तांतरित नहीं की जा सकती है, अगर कोई खदान चलाने की स्थिति में नहीं है तो उसे खदान सरकार को ही वापस करना होगी। किसी दूसरे को देना वैधानिक नही है।
शैलेंद्र सिंह, खनिज सचिव


भाई की पत्नी की कंपनी
कृषि राज्यमंत्री बृजेद्र प्रताप सिंह से जब इस बारे में बातचीत की गई तो उन्होंने माना कि राधिका टेडर्स उनके भाई की पत्नी के नाम पर है और खनिज का करोबार किया जा रहा है। साथ ही वे बताते है कि राधिका टेडर्स खनिज की खरीदी नत्थू सिंह व जितेंद्र से करते है, इन दोनों की फर्म पंजीकृत नहीं है, लिहाजा ऎसी स्थिति में राधिका टेडर्स द्वारा दोनों से खरीदे गए खनिज पर एक प्रतिषत अतिरिक्त विRयकर का भुगतान किया जाता है।

सिंह के मुताबिक ऎसा प्रावधान है कि गैर पंजीकृत संस्था से माल खरीदने पर एक प्रतिषत अतिरिक्त विRयकर जमा किया जाना चाहिए। इस नियम का पालन किया जा रहा है। सिंह स्वीकारते है कि राधिका टेडर्स सीधे तौर पर दयाराम व लखुआ से खनिज की खरीदी नहीं करता। उनके पास इस बात का कोई जवाब नही है कि राधिका टेडर्स के दस्तावेजों में विRेता के तौर पर नत्थू व जितेंद्र का नाम दर्ज न होकर दयाराम व लखुआ का ही दर्ज है। इतना ही नहीं खरीदे गए माल का भुगतान किस रूप में अर्थात नगद या चैके द्वारा होता है, इसका भी वे खुलासा नहीं कर पाए।

2 रू. के लिए लड़की को जलाया आइसक्रीम के नाम पर जमा हुआ तेल खा रहे हैं आप

2 रू. के लिए लड़की को जलाया
 

हैदराबाद। भूख से बेजार सात साल की बच्ची ने मंदिर के दानपात्र से दो रूपए क्या उठा लिए, वहां आए एक विद्वान ने सारी इंसानियत भूल बच्ची को गर्म सलाख से दाग डाला। तब बच्ची की मां मजदूरी करने गई हुई थी। घटना विशाखापटनम जिले के मधुरावाड़ा स्थित सिद्धेश्वर स्वामी मंदिर की है। पुलिस के अनुसार मंदिर में पूजा के लिए 17 विद्वानों का दल आदिलाबादसे आया था। शाम को पूजा के दौरान 7 साल की श्रीदेवी ने भगवान के सामने रखी प्लेट से दो रूपए उठा लिए। मंदिर के सफाईकर्मी ने बच्ची को पूजा के लिए आए विद्वान आसवन के सामने पेश कर दिया। आसवन ने मंदिर में चोरी को गंभीर अपराध बताते हुए बालिका की दोनों बाहें गर्म सलाखों से दाग दी।

भूख मिटाने को की चोरी
पुलिस का कहना है कि बच्ची की मां सुबह मजदूरी के लिए गई थी। बच्ची दिन भर भूखी थी। कुछ खाना चाहती थी। इसलिए थाली से दो रूपए उठाए थे। काम से लौटी मजदूर मां की शिकायत पर आसवन को पुलिस ने पकड़ लिया। उसने अपना अपराध कबूल कर लिया है।

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आइसक्रीम के नाम पर जमा हुआ तेल खा रहे हैं आप

अगर हम आपसे कहें कि आप आइसक्रीम के नाम पर जो खा रहे हैं, असल में वह आइसक्रीम है ही नहीं तो? चौंकिए मत, हकीकत कुछ यही है। इन दिनों बिक रहे फ्रोज़न डेज़र्ट दिखने और खाने में भले आपको बिल्कुल आइसक्रीम की तरह ही लगेंगे, लेकिन इनमें मिल्क फैट की जगह सब्जियों के फैट का इस्तेमाल किया जाता है। यह कारोबार खूब फल-फूल रहा है। भारत के 1800 करोड़ के आइसक्रीम मार्केट के 40 पर्सेंट हिस्से पर इसका कब्जा है।

ज्यादातर कंस्यूमर्स को इसका अहसास भी नहीं है कि वे जिस आइसक्रीम को इतने चाव से खा रहे हैं, वह वास्तव में आइसक्रीम है ही नहीं। हिंदुस्तान यूनिलीवर की क्वालिटी वॉल्स, वाडीलाल, लाजा आइसक्रीम और क्रीम कैंडी, कोन और कप में आइसक्रीम के बजाय फ्रोजन डेजर्ट बेचते हैं। इसकी शुरुआत सबसे पहले क्वालिटी वॉल्स ने की थी। दो दशकों से भी कम वक्त में इस प्रॉडक्ट ने देश में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, लेकिन फूड अथॉरिटी के अधिकारियों और अमूल एवं मदर डेयरी जैसी ऑरिजनल आइसक्रीम मेकर कंपनियों का मानना है कि आइसक्रीम के नाम पर फ्रोजन डेजर्ट बेचना ग्राहकों को गुमराह करना है।

रीयल आइसक्रीम दूध के फैट से बनती है, वहीं ये फ्रोज़न डेज़र्ट सब्जियों के फैट से तैयार किए जाते हैं, जो करीब 80 पर्सेंट सस्ता पड़ता है। गुजरात फूड ऐंड ड्रग कंट्रोल


एडमिनिस्ट्रेशन कमिश्नर एच.जी. कोशिया ने कहा,'जिस तरह फ्रोजन डेजर्ट की लेबलिंग होती है और जैसे टीवी कमर्शल के जरिए इसकी मार्केटिंग की जाती है, वह बड़ी चिंता का कारण है।' उन्होंने कहा, 'कंस्यूमर्स को यह मालूम होना चाहिए कि दोनों अलग-अलग उत्पाद हैं। फिर उनकी मर्जी, वे जो चुनें।'

आइसक्रीम मेकर जैसे अमूल, मदर डेयरी जो केवल डेरी फैट का इस्तेमाल करते हैं का कहना है कि फ्रोज़न डेज़र्ट बनाने वाली ये कंपनियां इसे आइसक्रीम बताकर लोगों को गुमराह करने का काम करती हैं। मदर डेयरी में (डेयरी प्रॉडक्ट डिविज़न) के हेड मुनीष सोनी कहते हैं, 'लोग इस फ्रोज़न डेज़र्ट को आइसक्रीम समझकर खाते हैं।'

अमूल और मदर डेयरी जैसी कंपनियां आइसक्रीम के लिए सिर्फ डेयरी फैट का इस्तेमाल करती हैं। मदर डेयरी के हेड (डेयरी प्रॉडक्ट डिविजन) मुनीश सोनी ने कहा, 'कंस्यूमर आइसक्रीम समझकर फ्रोजेन डेजर्ट खा रहे हैं।' आइसक्रीम बाजार में सबसे ज्यादा 40 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले अमूल का कहना है कि ये कंपनियां आइसक्रीम के दाम पर कंस्यूमर को फ्रोजन डेजर्ट खिला रही हैं। गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (अमूल) के मैनेजिंग डायरेक्टर आर.एस. सोढ़ी ने कहा, 'कंस्यूमरों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। ये दोनों देखने में तकरीबन एक जैसी हैं। ज्यादातर ब्रैंड बहुत छोटे लेटर में फ्रोजन डेजर्ट के बारे में जानकारी देते हैं।' उन्होंने कहा कि डेयरी फैट की कीमत जहां 300 रुपये प्रति किलोग्राम है, वहीं वेजिटेबल फैट सिर्फ 50 रुपए प्रति किलोग्राम में मिल जाता है।

सेहत को नुकसान नहीं
न्यूट्रिशनिस्ट का कहना है कि वेजिटेबल फैट से कोई नुकसान नहीं है। इंडियन कुकिंग में खानेवाले तेल का इस्तेमाल आम बात है, लेकिन यह मिल्क फैट से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।

अनदेखी की बुनियाद

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, खासकर निर्माण-कार्य में लगे लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा आदि से जुड़ी समस्याओं का कोई व्यावहारिक समाधान निकालना सरकार के लिए बड़ी चुनौती रही है। इसके मद्देनजर केंद्र ने निर्माण कंपनियों पर भवन एवं अन्य निर्माण मजदूर कल्याण उप-कर का प्रावधान किया। इसके तहत राज्य सरकारों ने निर्माण कंपनियों से छह हजार छह सौ सोलह करोड़ रुपए इकट्ठा किए। मगर विचित्र है कि उसमें से केवल नौ सौ पैंसठ करोड़ रुपए यानी महज चौदह फीसद राशि ही खर्च की जा सकी। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि निर्माण मजदूरों के पंजीकरण पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक देश में करीब चार करोड़ छियालीस लाख लोग निर्माण मजदूर के रूप में काम करते हैं। मगर उनमें से करीब बयासी लाख पंचानबे हजार लोगों का ही पंजीकरण हो पाया है। जाहिर है कि पंजीकरण से वंचित लोगों को उनके कल्याण के लिए जुटाए धन का लाभ नहीं मिल पाता। यह छिपी बात नहीं है कि निर्माण-क्षेत्र में लगातार विस्तार हो रहा है। इसमें काम करने वाले ज्यादातर लोगों को अपने घर से दूर विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है। उन जगहों पर उन्हें न तो रहन-सहन संबंधी माकूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, न जरूरत पड़ने पर उनकी चिकित्सा संबंधी जरूरतें पूरी हो पाती हैं। जिन लोगों के परिवार साथ रहते हैं, उनके बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पोषाहार, नियमित जांच, प्रतिरोधक टीके लगाने, शिक्षा आदि से जुड़ी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। यही वजह है कि कुपोषण और   विषम परिस्थितियों में रहने की वजह से पैदा होने वाली बीमारियों के चलते हर साल लाखों लोग असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं।
निर्माण मजदूरों की समस्याओं पर कई अध्ययन हो चुके हैं और कई उपयोगी सुझाव भी सामने आए हैं। पर जब उनके लिए उप-कर के जरिए जुटाई गई राशि का इस्तेमाल करने के लिए सरकारें तत्पर नहीं हैं तो बाकी उपायों के बारे में क्या कहा जाए!
निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के पंजीकरण में कुछ दिक्कतें समझी जा सकती हैं। बहुत-से लोग खेती-बाड़ी के काम से फुरसत पाकर कुछ समय के लिए इस क्षेत्र में मजदूरी करने आते हैं। कुछ समय बाद कई मजदूर अपने काम बदल लेते हैं। ऐसे में निर्माण कंपनियों और पंजीकरण से जुड़े महकमे का तर्क होता है कि निर्माण मजदूर के रूप में उनकी पहचान सुनिश्चित करना कठिन है। मगर हकीकत है कि ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है, जो मुख्य रूप से निर्माण मजदूरी पर निर्भर हैं। लिहाजा, इनका पंजीकरण नहीं हो पाता तो इसमें निर्माण कंपनियों की चालाकी ही सबसे बड़ा कारण है। पंजीकरण को लेकर कंपनियां कन्नी काटती हैं ताकि काम में निहित जोखिम से जुड़ी अपनी जवाबदेहियों से बच सकें। चूंकि ज्यादातर निर्माण मजदूर दिहाड़ी पर काम करते हैं, इसलिए उनकी उपस्थिति आदि का पक्का ब्योरा नहीं रखा जाता। उनके रहन-सहन, स्वास्थ्य आदि से जुड़ी सुविधाओं का ध्यान रखना तो दूर, उनकी मजदूरी तय करने, किसी दुर्घटना में मारे जाने या अपंग हो जाने पर मुआवजे के भुगतान आदि में भी कंपनियां मनमानी करती हैं। सबूत के अभाव या फिर अदालती खर्च उठा पाने का सामर्थ्य न होने के कारण बहुत सारे मजदूर कानून के सहारे अपना हक हासिल नहीं कर पाते। ऐसे में अगर राज्य सरकारें उनके कल्याण कोष के उपयोग के मामले में लापरवाही बरतती हैं तो इसे उनकी असंवेदनशीलता ही जाहिर होती है।

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यह कैसा पढ़ाई का दबाव


गुना। स्कूल टीचर और परिवार के सदस्यों का बच्चों पर पढ़ाई का बढ़ता दबाव अब घर से भागने की वजह के रूप में सामने आया है। एक साल में ऎसे एक सैकड़ा से अधिक मामले सामने आए हैं। इनमें बीस फीसदी बच्चों ने घूमने का शौक पूरा करने घर छोड़ा, तो लड़कियों के घर छोड़ने की वजह परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाना और समय से पहले शादी का बढ़ता दबाव रहा। घर छोड़ने के बाद कई बच्चे नशे की गिरफ्त में हैं। इस सच्चाई का खुलासा विशेष किशोर पुलिस इकाई के आंकड़े करते हैं।


एक साल के आंकड़ों पर गौर करें, तो जिले व अन्य शहरों से 160 बच्चे घर से भागे, जिन्हें पुलिस इकाई ने काउंसलिंग के बाद परिजनों को सौंपा। इनमें दस से 14 वर्ष तक के करीब एक सैकड़ा से अधिक बच्चे ऎसे पाए गए, जिन्होंने घर में बढ़ते पढ़ाई के दबाव में घर छोड़ दिया। ऎसे बच्चों से घर छोड़ने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि घर और स्कूल में अक्सर पढ़ाई पर जोर दिया जाता था। इससे घर से भागना ही मुनासिब समझा। वहीं लड़कियों के मामले में स्थिति पूरी तरह उलट है। इसमें घर छोड़ने की वजह परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाने और उम्र से पहले शादी का दबाव रहा।

विशेष किशोर पुलिस इकाई में ऎसी लड़कियों की संख्या करीब एक दर्जन है।

फैक्ट फाइल


घर से भागने वाले बच्चों में अशोकनगर जिले के बच्चे अधिक
बीस फीसदी बच्चों ने ट्रेन में घूमने छोड़ दिया घर
पचास प्रतिशत बच्चे नहीं सह पाए पढ़ाई का दबाव
तीस फीसदी बच्चे घर छोड़ने के बाद नशे का शिकार
छह लावारिस बच्चों को उज्ौन के बालगृह में भेजा गया

लावारिस बच्चों का होगा सर्वे


जिले में लावारिस बच्चों की पहचान करने अब महिला बाल विकास विभाग सर्वे करेगा। विभाग के अधिकारी आरसी त्रिपाठी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र और शहरी परियोजनाओं में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ अन्य फील्ड वर्कर को सर्वे की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। सड़कों और गली-मोहल्लों में आवारा घूमने वाले बच्चों की भी जानकारी जुटाई जाएगी, ताकि ऎसे बच्चों के पोषण और पुनर्वास का प्रबंध किया जा सके।


विशेष किशोर पुलिस इकाई द्वारा एक साल में घर से भागे 160 बच्चों को परिजनों के हवाले किया गया है। काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि ज्यादातर लड़के पढ़ाई का दबाव नहीं झेल सके, तो कुछ ने गरीबी के कारण घर छोड़ा। कई लड़कियां ऎसी भी रहीं, जो परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाने और शादी के लिए मजबूर करने के कारण घर से भागीं। मंजू तिर्की, एसआई व इकाई प्रभारी गुना

"मैं पढ़ना चाहती थी"


बमोरी क्षेत्र से कुछ महीने पहले एक लड़की घर से भाग गई थी। इसके बाद पुलिस ने उसे लावारिस हालत में मिलने पर इकाई के हवाले किया। इकाई के सदस्य रामवीरसिंह कुशवाह ने बताया कि काउंसलिंग के दौरान लड़की ने बताया कि वह पढ़ना चाहती है, लेकिन परिजन पढ़ाई छुड़ाकर समय से पहले शादी कराना चाहते थे। इसी वजह से उसने परिवार से नाता तोड़ लिया। इकाई में वह लगभग सात दिन रही। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की मंजूरी के बाद अब इकाई इस बच्ची को शिक्षित करेगी।

नशे से लड़कर संभाला परिवार


पिता की शराब की लत और मां के साथ अक्सर मारपीट ने अशोकनगर के 14 वर्षीय बालक को घर छोड़ने मजबूर कर दिया। तभी गलत लोगों की संगत ने उसे केमिकल नशे का आदी बना दिया। इस बीच पुलिस ने तीन बार बालक को बरामद कर किशोर इकाई के हवाले किया। लेकिन शराबी पिता के कारण वह घर से भागता रहा। इकाई के सदस्यों की मानें, तो उचित काउंसलिंग के बाद आज वह बालक गुना में रहकर न सिर्फ रोजगार से जुड़ा है।

बल्कि परिजनों को आर्थिक मदद कर सहारा बना हुआ है।

बच्चे को बनाया भिखारी
किशोर इकाई में वर्ष 2011 में बाल शोषण का मामला भी आया, जो कोर्ट में विचाराधीन है। सदस्यों के मुताबिक एक बच्चा घर से गायब हो गया था, जिसकी परिजनों से पुलिस में गुमशुदगी भी दर्ज कराई। इस बीच पुलिस को बच्चा सड़क पर भीख मांगता हुआ मिला। पूछताछ में बच्चे ने बताया कि डरा-धमकाकर उससे भीख मंगाई जा रही है। इसके बाद बच्चे को किशोर इकाई में भेजा गया, जहां से उसे काउंसलिंग के बाद परिजनों को सौंप दिया गया। किशोर इकाई के अनुसार मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है।

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डाक्टर ने इलाज के लिए मंगवाई "भीख"
 

चित्रकूट। गरीबी पत्थर से भी कठोर होती है, इसका जीता-जागता उदाहरण उस समय देखने को मिला जब उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के सरकारी अस्पताल के डज्ञक्टर ने एक गरीब बच्चे का इलाज अस्पताल में करने के बजाय उसे अपने घर पर फीस के साथ आने को कहा, मगर फीस का जुगाड़ न होने पर इस गरीब को बीमार बच्चे के साथ सरेआम सड़क पर "भीख" मांगनी पड़ी।

मामला कुछ यूं है कि गरीबी से तंगहाल रैपुरा थाना क्षेत्र के खजुरिहा गांव का बलवंता कर्ज लेकर गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने 10 साल के भतीजे राहुल को लेकर बुधवार को चित्रकूट के सरकारी अस्पताल में इस उम्मीद से पहुंचा कि यहां महज एक रूपए के पर्चे पर बच्चे का उपचार हो जाएगा। उसे क्या मालूम था कि सरकारी चिकित्सक भीख मांगने के लिए मजबूर कर देगा।

बलवंता ने अस्पताल में पर्चा तो बनवा लिया, मगर आपातकालीन सेवा में तैनात एक सरकारी चिकित्सक ने बच्चे को देखते ही सलाह दे दी कि इस बच्चे को गंभीर बीमारी है। अस्पताल में इलाज संभव नहीं है, इसलिए वह फीस का इंतजाम कर आवास में आए।

मजबूर बलवंता क्या करता? उसने बीमार बच्चे के साथ जिला कचहरी से लगी सड़क में सरेआम "भीख" मांगना शुरू कर दिया। बलवंता ने बताया कि कई दिनों से उसका भतीजा राहुल किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित है।

उसने बताया कि आर्थिक हालत इतनी कमजोर है कि सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए भी उसे गांव में कर्ज लेना पड़ा है। उसने बताया कि सरकारी अस्पताल के चिकित्सक ने अपने घर में इलाज के लिए बुलाया था, मगर उसके पास पैसे नहीं है कि वह डॉक्टर की फीस चुका पाए। इसलिए, भीख मांगना मजबूरी है।

इस मसले पर सरकारी अस्पताल चित्रकूट के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. देशराज सिंह ने बताया कि अस्पताल के बजाय घर में बुलाना शासन की मंशा के विपरीत है, मैं इस मामले की खुद जांच करूंगा और दोषी चिकित्सक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।

चित्रकूट के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. आर.डी. राम ने बताया कि उन्हें मीडिया के जरिए इस मामले की जानकारी मिली है। उप मुख्य चिकित्साधिकारी सदर को जांच सौंप दी गई है।

इस मामले से लोगों के इस आरोप पर मुहर लग गई है कि बलवंता जैसे तमाम गरीब रोजाना सरकारी चिकित्सकों की लापरवाही के शिकार हो रहे हैं और महज "कुछ" पाने की लालच में चिकित्सक अपने कर्तव्य को धता बता रहे हैं। इससे जहां सरकार की मंशा को ठेस पहुंचती है, वहीं मानवता भी तार-तार हो रही है।


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