Friday, May 25, 2012

अनदेखी की बुनियाद

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, खासकर निर्माण-कार्य में लगे लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा आदि से जुड़ी समस्याओं का कोई व्यावहारिक समाधान निकालना सरकार के लिए बड़ी चुनौती रही है। इसके मद्देनजर केंद्र ने निर्माण कंपनियों पर भवन एवं अन्य निर्माण मजदूर कल्याण उप-कर का प्रावधान किया। इसके तहत राज्य सरकारों ने निर्माण कंपनियों से छह हजार छह सौ सोलह करोड़ रुपए इकट्ठा किए। मगर विचित्र है कि उसमें से केवल नौ सौ पैंसठ करोड़ रुपए यानी महज चौदह फीसद राशि ही खर्च की जा सकी। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि निर्माण मजदूरों के पंजीकरण पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक देश में करीब चार करोड़ छियालीस लाख लोग निर्माण मजदूर के रूप में काम करते हैं। मगर उनमें से करीब बयासी लाख पंचानबे हजार लोगों का ही पंजीकरण हो पाया है। जाहिर है कि पंजीकरण से वंचित लोगों को उनके कल्याण के लिए जुटाए धन का लाभ नहीं मिल पाता। यह छिपी बात नहीं है कि निर्माण-क्षेत्र में लगातार विस्तार हो रहा है। इसमें काम करने वाले ज्यादातर लोगों को अपने घर से दूर विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है। उन जगहों पर उन्हें न तो रहन-सहन संबंधी माकूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, न जरूरत पड़ने पर उनकी चिकित्सा संबंधी जरूरतें पूरी हो पाती हैं। जिन लोगों के परिवार साथ रहते हैं, उनके बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पोषाहार, नियमित जांच, प्रतिरोधक टीके लगाने, शिक्षा आदि से जुड़ी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। यही वजह है कि कुपोषण और   विषम परिस्थितियों में रहने की वजह से पैदा होने वाली बीमारियों के चलते हर साल लाखों लोग असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं।
निर्माण मजदूरों की समस्याओं पर कई अध्ययन हो चुके हैं और कई उपयोगी सुझाव भी सामने आए हैं। पर जब उनके लिए उप-कर के जरिए जुटाई गई राशि का इस्तेमाल करने के लिए सरकारें तत्पर नहीं हैं तो बाकी उपायों के बारे में क्या कहा जाए!
निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के पंजीकरण में कुछ दिक्कतें समझी जा सकती हैं। बहुत-से लोग खेती-बाड़ी के काम से फुरसत पाकर कुछ समय के लिए इस क्षेत्र में मजदूरी करने आते हैं। कुछ समय बाद कई मजदूर अपने काम बदल लेते हैं। ऐसे में निर्माण कंपनियों और पंजीकरण से जुड़े महकमे का तर्क होता है कि निर्माण मजदूर के रूप में उनकी पहचान सुनिश्चित करना कठिन है। मगर हकीकत है कि ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है, जो मुख्य रूप से निर्माण मजदूरी पर निर्भर हैं। लिहाजा, इनका पंजीकरण नहीं हो पाता तो इसमें निर्माण कंपनियों की चालाकी ही सबसे बड़ा कारण है। पंजीकरण को लेकर कंपनियां कन्नी काटती हैं ताकि काम में निहित जोखिम से जुड़ी अपनी जवाबदेहियों से बच सकें। चूंकि ज्यादातर निर्माण मजदूर दिहाड़ी पर काम करते हैं, इसलिए उनकी उपस्थिति आदि का पक्का ब्योरा नहीं रखा जाता। उनके रहन-सहन, स्वास्थ्य आदि से जुड़ी सुविधाओं का ध्यान रखना तो दूर, उनकी मजदूरी तय करने, किसी दुर्घटना में मारे जाने या अपंग हो जाने पर मुआवजे के भुगतान आदि में भी कंपनियां मनमानी करती हैं। सबूत के अभाव या फिर अदालती खर्च उठा पाने का सामर्थ्य न होने के कारण बहुत सारे मजदूर कानून के सहारे अपना हक हासिल नहीं कर पाते। ऐसे में अगर राज्य सरकारें उनके कल्याण कोष के उपयोग के मामले में लापरवाही बरतती हैं तो इसे उनकी असंवेदनशीलता ही जाहिर होती है।

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यह कैसा पढ़ाई का दबाव


गुना। स्कूल टीचर और परिवार के सदस्यों का बच्चों पर पढ़ाई का बढ़ता दबाव अब घर से भागने की वजह के रूप में सामने आया है। एक साल में ऎसे एक सैकड़ा से अधिक मामले सामने आए हैं। इनमें बीस फीसदी बच्चों ने घूमने का शौक पूरा करने घर छोड़ा, तो लड़कियों के घर छोड़ने की वजह परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाना और समय से पहले शादी का बढ़ता दबाव रहा। घर छोड़ने के बाद कई बच्चे नशे की गिरफ्त में हैं। इस सच्चाई का खुलासा विशेष किशोर पुलिस इकाई के आंकड़े करते हैं।


एक साल के आंकड़ों पर गौर करें, तो जिले व अन्य शहरों से 160 बच्चे घर से भागे, जिन्हें पुलिस इकाई ने काउंसलिंग के बाद परिजनों को सौंपा। इनमें दस से 14 वर्ष तक के करीब एक सैकड़ा से अधिक बच्चे ऎसे पाए गए, जिन्होंने घर में बढ़ते पढ़ाई के दबाव में घर छोड़ दिया। ऎसे बच्चों से घर छोड़ने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि घर और स्कूल में अक्सर पढ़ाई पर जोर दिया जाता था। इससे घर से भागना ही मुनासिब समझा। वहीं लड़कियों के मामले में स्थिति पूरी तरह उलट है। इसमें घर छोड़ने की वजह परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाने और उम्र से पहले शादी का दबाव रहा।

विशेष किशोर पुलिस इकाई में ऎसी लड़कियों की संख्या करीब एक दर्जन है।

फैक्ट फाइल


घर से भागने वाले बच्चों में अशोकनगर जिले के बच्चे अधिक
बीस फीसदी बच्चों ने ट्रेन में घूमने छोड़ दिया घर
पचास प्रतिशत बच्चे नहीं सह पाए पढ़ाई का दबाव
तीस फीसदी बच्चे घर छोड़ने के बाद नशे का शिकार
छह लावारिस बच्चों को उज्ौन के बालगृह में भेजा गया

लावारिस बच्चों का होगा सर्वे


जिले में लावारिस बच्चों की पहचान करने अब महिला बाल विकास विभाग सर्वे करेगा। विभाग के अधिकारी आरसी त्रिपाठी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र और शहरी परियोजनाओं में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ अन्य फील्ड वर्कर को सर्वे की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। सड़कों और गली-मोहल्लों में आवारा घूमने वाले बच्चों की भी जानकारी जुटाई जाएगी, ताकि ऎसे बच्चों के पोषण और पुनर्वास का प्रबंध किया जा सके।


विशेष किशोर पुलिस इकाई द्वारा एक साल में घर से भागे 160 बच्चों को परिजनों के हवाले किया गया है। काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि ज्यादातर लड़के पढ़ाई का दबाव नहीं झेल सके, तो कुछ ने गरीबी के कारण घर छोड़ा। कई लड़कियां ऎसी भी रहीं, जो परिजनों द्वारा पढ़ाई छुड़ाने और शादी के लिए मजबूर करने के कारण घर से भागीं। मंजू तिर्की, एसआई व इकाई प्रभारी गुना

"मैं पढ़ना चाहती थी"


बमोरी क्षेत्र से कुछ महीने पहले एक लड़की घर से भाग गई थी। इसके बाद पुलिस ने उसे लावारिस हालत में मिलने पर इकाई के हवाले किया। इकाई के सदस्य रामवीरसिंह कुशवाह ने बताया कि काउंसलिंग के दौरान लड़की ने बताया कि वह पढ़ना चाहती है, लेकिन परिजन पढ़ाई छुड़ाकर समय से पहले शादी कराना चाहते थे। इसी वजह से उसने परिवार से नाता तोड़ लिया। इकाई में वह लगभग सात दिन रही। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की मंजूरी के बाद अब इकाई इस बच्ची को शिक्षित करेगी।

नशे से लड़कर संभाला परिवार


पिता की शराब की लत और मां के साथ अक्सर मारपीट ने अशोकनगर के 14 वर्षीय बालक को घर छोड़ने मजबूर कर दिया। तभी गलत लोगों की संगत ने उसे केमिकल नशे का आदी बना दिया। इस बीच पुलिस ने तीन बार बालक को बरामद कर किशोर इकाई के हवाले किया। लेकिन शराबी पिता के कारण वह घर से भागता रहा। इकाई के सदस्यों की मानें, तो उचित काउंसलिंग के बाद आज वह बालक गुना में रहकर न सिर्फ रोजगार से जुड़ा है।

बल्कि परिजनों को आर्थिक मदद कर सहारा बना हुआ है।

बच्चे को बनाया भिखारी
किशोर इकाई में वर्ष 2011 में बाल शोषण का मामला भी आया, जो कोर्ट में विचाराधीन है। सदस्यों के मुताबिक एक बच्चा घर से गायब हो गया था, जिसकी परिजनों से पुलिस में गुमशुदगी भी दर्ज कराई। इस बीच पुलिस को बच्चा सड़क पर भीख मांगता हुआ मिला। पूछताछ में बच्चे ने बताया कि डरा-धमकाकर उससे भीख मंगाई जा रही है। इसके बाद बच्चे को किशोर इकाई में भेजा गया, जहां से उसे काउंसलिंग के बाद परिजनों को सौंप दिया गया। किशोर इकाई के अनुसार मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है।

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डाक्टर ने इलाज के लिए मंगवाई "भीख"
 

चित्रकूट। गरीबी पत्थर से भी कठोर होती है, इसका जीता-जागता उदाहरण उस समय देखने को मिला जब उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के सरकारी अस्पताल के डज्ञक्टर ने एक गरीब बच्चे का इलाज अस्पताल में करने के बजाय उसे अपने घर पर फीस के साथ आने को कहा, मगर फीस का जुगाड़ न होने पर इस गरीब को बीमार बच्चे के साथ सरेआम सड़क पर "भीख" मांगनी पड़ी।

मामला कुछ यूं है कि गरीबी से तंगहाल रैपुरा थाना क्षेत्र के खजुरिहा गांव का बलवंता कर्ज लेकर गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने 10 साल के भतीजे राहुल को लेकर बुधवार को चित्रकूट के सरकारी अस्पताल में इस उम्मीद से पहुंचा कि यहां महज एक रूपए के पर्चे पर बच्चे का उपचार हो जाएगा। उसे क्या मालूम था कि सरकारी चिकित्सक भीख मांगने के लिए मजबूर कर देगा।

बलवंता ने अस्पताल में पर्चा तो बनवा लिया, मगर आपातकालीन सेवा में तैनात एक सरकारी चिकित्सक ने बच्चे को देखते ही सलाह दे दी कि इस बच्चे को गंभीर बीमारी है। अस्पताल में इलाज संभव नहीं है, इसलिए वह फीस का इंतजाम कर आवास में आए।

मजबूर बलवंता क्या करता? उसने बीमार बच्चे के साथ जिला कचहरी से लगी सड़क में सरेआम "भीख" मांगना शुरू कर दिया। बलवंता ने बताया कि कई दिनों से उसका भतीजा राहुल किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित है।

उसने बताया कि आर्थिक हालत इतनी कमजोर है कि सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए भी उसे गांव में कर्ज लेना पड़ा है। उसने बताया कि सरकारी अस्पताल के चिकित्सक ने अपने घर में इलाज के लिए बुलाया था, मगर उसके पास पैसे नहीं है कि वह डॉक्टर की फीस चुका पाए। इसलिए, भीख मांगना मजबूरी है।

इस मसले पर सरकारी अस्पताल चित्रकूट के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. देशराज सिंह ने बताया कि अस्पताल के बजाय घर में बुलाना शासन की मंशा के विपरीत है, मैं इस मामले की खुद जांच करूंगा और दोषी चिकित्सक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।

चित्रकूट के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. आर.डी. राम ने बताया कि उन्हें मीडिया के जरिए इस मामले की जानकारी मिली है। उप मुख्य चिकित्साधिकारी सदर को जांच सौंप दी गई है।

इस मामले से लोगों के इस आरोप पर मुहर लग गई है कि बलवंता जैसे तमाम गरीब रोजाना सरकारी चिकित्सकों की लापरवाही के शिकार हो रहे हैं और महज "कुछ" पाने की लालच में चिकित्सक अपने कर्तव्य को धता बता रहे हैं। इससे जहां सरकार की मंशा को ठेस पहुंचती है, वहीं मानवता भी तार-तार हो रही है।


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युवाओं आत्महत्या नहीं है समाधान


यु वाओं द्वारा आत्महत्या, इन दिनों टीवी चैनलों की "ब्रेकिंग न्यूका" और समाचार-पत्रों की "सुर्खियां" हैं। एक सर्वेक्षण द्वारा यह बात सामने आई है कि अपना लक्ष्य पूर्ण नहीं होने के कारण "मादक सपनों में डूबी" किशोर पीढ़ी अपराधग्रस्त और "कैरियर कान्शस" युवा पीढ़ी अवसादग्रस्त हो जाती है।

अपराधग्रस्त हत्या की ओर तथा अवसादग्रस्त आत्महत्या की तरफ बढ़ते हैं। कभी-कभी तो अपराधग्रस्त और अवसादग्रस्त दोनों ही आत्महत्या को विकल्प बनाते हैं। विशेषकर युवा पीढ़ी ने तो, ऎसा लगता है कि आजकल अवसाद और आत्महत्या से ही हाथ मिला लिया है।

प्रश्न उठता है कि किन कारणों से युवा आत्महत्या कर रहे हैं? क्या है युवाओं को आत्महत्या से रोकने का उपाय? जहां तक पहले प्रश्न का मामला है तो उसका उत्तर यह है कि युवाओं में आत्महत्या के प्रचलन का पहला कारण है परीक्षाओं/ विशेषकर प्रतियोगिता प्ररीक्षाओं में असफलता।

वर्तमान युवा पीढ़ी दरअसल कैरियर को लेकर बहुत "कान्शस" (सचेत) है, बल्कि यह कहना उचित होगा अब तो "सेंसिटिव" (संवेदी) हो गई है। "कैरियर कान्शस" से भी खतरा तो है लेकिन "कैरियर सेंसिटिव" से कम। बस यही वह बिंदु है अर्थात युवा पीढ़ी का अपने कैरियर को लेकर "सचेत" होने की बजाय "संवेदी" होना, जिसकी वजह से असफलता मिलने पर वह "ऊब" जाती है और अवसाद में "डूब" जाती है। यह अवसाद कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि युवक/युवती आत्महत्या कर लेते हैं। इन दिनों प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफल रहने से उपजे अवसाद के कारण आत्महत्या का ग्राफ बढ़ रहा है।

एक वाक्य में यह कि प्रतियोगिता परीक्षा में सफल रहने पर युवक/युवती का "इम्प्रेशन" बढ़ता है जबकि असफल रहने पर "डिप्रेशन"। लगातार "डिप्रेशन" आत्महत्या का कारक है। दूसरा कारण है "प्रेम प्रकरण" में असफलता। यह देखा गया है कि किशोरावस्था से ही "विपरीत लिंगी आकर्षण" पैदा होता है जो युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही "प्रेम" में परिवर्तित हो जाता है। कॉलेज के दौर में युवक-युवती "सेमेस्टर परीक्षा" की तैयारी के बजाय "प्रेम-परीक्षा" की तैयारी में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। इसका परिणाम असफलता के रूप में सामने आता है, तो युवती तथा युवक आत्महत्या को "आसरा" बनाते हैं।

इन दिनों समाचार-पत्रों में ये शीर्षक बहुत पढ़ने को मिल रहे हैं, जैसे- प्रेम में निराश युवक ने आत्महत्या की, युवती ने प्रेम में असफल रहने पर पंखे से लटककर मौत को गले लगाया, युवा प्रेमी जोड़े ने साथ-साथ जहर खाया। ये बताते हैं कि प्रेम प्रकरण में कामयाबी नहीं मिलना (इसके दो पक्ष हैं, एक तो युवक द्वारा युवती को नकार देना या युवती द्वारा युवक को नकार देना तथा दूसरा परिवार द्वारा विवाह की अनुमति नहीं देना) भी युवक-युवती को आत्महत्या की ओर धकेलता है। तीसरा कारण है टीवी चैनलों द्वारा हिंसा और अश्लीलता परोसना। अवसाद को छोड़ दें तो "रियल्टी शो" दरअसल "क्रुएलटी शो" हो गए हैं। कई चैनलों द्वारा तो हिंसा, अश्लीलता और नकारात्मकता इस तरह परोसी जा रही है कि बच्चे, हिंसक, किशोर, अपराधी और युवा आत्मघाती हो रहे हैं। सवाल यह है कि युवाओं को आत्महत्या से रोकने के लिए क्या उपाय हों? कई उपाय हैं।

पहला तो यह कि प्राइमरी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक "जीवन जीने की कला" या "सकारात्मक जीवन-दर्शन" विषय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। दूसरा, यह कि परीक्षाओं/ प्रतियोगिता परीक्षाओं के परिणामों में "पारदर्शिता" लाई जाए। तीसरा, यह कि प्रेम करने वाले समझें कि प्रेमी/ प्रेमिका के प्रेम से बढ़कर माता-पिता का प्रेम होता है। चौथा, यह कि टीवी चैनलों के नकारात्मक कार्यक्रमों को रोका जाए। वास्तव में युवाओं को यह समझना होगा कि सकारात्मकता से ही दूर होगा व्यवधान, आत्महत्या नहीं है समाधान!

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अच्छाई और बुराई का बोझ

बिल्ली का एक छोटा बच्चा भी जानता है कि क्या चीज पास दिखे तो भाग जाना चाहिए और क्या नजर आए तो उसे दबोच लेना चाहिए। लेकिन हमारा बच्चा काफी बड़ा हो जाने के बाद भी ऐसी बुनियादी बातों में गलतियां कर बैठता है। ऐसा क्यों? सभी जीव अपने बच्चों को ऐसे कौशल सिखाते हैं, जो उनके जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं।

अकेला इंसान ही है जो अपने बच्चों को नैतिकता सिखाता है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। इसकी वजह शायद यह हो कि इंसानों का जिंदा रहना उनके निजी प्रयासों से ज्यादा एक-दूसरे की मदद और आपसी भरोसे पर निर्भर करता है। लेकिन अभी के लिए यह समझ पर्याप्त नहीं है।

हम अपने बच्चों को अपनी औकात भर अच्छा बनना सिखाते
हैं, लेकिन वास्तविक दुनिया का सामना होते ही उनकी अच्छाई उनकी दुश्मन बन जाती है। जिंदा रहने के लिए उन्हें बुराई से समझौता करना पड़ता है। बल्कि घुटने टेक कर उसके सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है। ठीक है, हम उन्हें बुराई नहीं सिखा सकते, लेकिन समय रहते इसकी पहचान तो करा सकते हैं।

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न्याय की गति

अदालतों का कामकाज अत्यंत धीमी गति से चलने के कारण जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ती गई है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश की लगभग चौदह सौ जेलों में करीब तीन लाख सत्तर हजार कैदी हैं। इनमें सत्तर फीसद विचाराधीन कैदी हैं। यह बेहद अन्यायपूर्ण स्थिति है कि बगैर अदालत से सजा हुए इतनी बड़ी संख्या में लोग बरसों-बरस कैद में रहने को विवश हों। यह स्थिति जेलों की व्यवस्था पर भी एक भारी और अनावश्यक बोझ है। इसलिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस सुझाव को स्वीकार किया जाना चाहिए कि जेलों में सांध्यकालीन अदालतें लगाई जाएं, ताकि छोटे-मामलों का जल्दी से निपटारा हो और विचाराधीन कैदियों की संख्या में तेजी से कमी लाई जा सके। विचाराधीन कैदियों के मामलों के निपटारे के लिए वैकल्पिक उपाय किए जाने की बात पहले भी उठी है। दो पालियों में अदालत चलाने, लोक अदालत लगा कर मामलों की सुनवाई करने से लेकर हल्के या मामूली अपराधों के आरोप में जेल में डाल दिए लोगों की सजा में कमी करने और मामलों को तेजी से निपटाने जैसी घोषणाएं की गर्इं। लेकिन अब तक ऐसे प्रयास छिटपुट तौर पर ही हो पाए हैं। अदालतों की ओर से निर्धारित तारीखों पर कई बार नौकरी या दूसरे किसी कारण से गवाहों के उपस्थित न होने के चलते सुनवाई टलती रहती है। शाम के वक्त अदालतें लगाने से न सिर्फ ज्यादा मामलों की सुनवाई संभव हो सकेगी, बल्कि गवाहों को बिना अपने काम का नुकसान किए अदालत जाने में सुविधा होगी।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश होने के नाते बालाकृष्णन की यह बात काफी   महत्त्वपूर्ण है कि कई बार लोगों को गैरजरूरी रूप से जेल में बंद कर दिया जाता है। यह भी छिपा नहीं है कि किसी आपराधिक घटना के बाद होने वाली गिरफ्तारियों के वक्त पुलिस का रवैया कई बार भेदभावपूर्ण होता है। गौरतलब है कि विचाराधीन कैदियों में सबसे ज्यादा तादाद वैसे लोगों की है जो पैसे के अभाव के कारण अपने लिए वकील या मुकदमा लड़ने का खर्च नहीं उठा पाते। इसके अलावा, ऐसे मामलों की भी कमी नहीं है जिनमें जमानती धाराओं में बंद आरोपी जमानत लेने वाला नहीं मिल पाने के कारण जेल से बाहर नहीं आ पाते। यह एक तरह से न्याय के बाद का वह अन्याय है, जिसका कारण महज किसी का गरीब होना है। इसलिए आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि गरीब कैदियों को लिए सरकार की ओर से कानूनी मदद मुहैया कराई जाए।
विचाराधीन कैदियों का मसला सिर्फ जेल के प्रबंध से जुड़ा हुआ नहीं है। उससे कहीं ज्यादा गंभीर पहलू यह है कि बड़ी तादाद में लोग सिर्फ इसलिए कैद हैं, क्योंकि फैसले लंबित हैं। कई ऐसे लोग हैं जिन पर लगे आरोप साबित भी हो जाएं तो उसके लिए जो अधिकतम सजा हो सकती है, उससे ज्यादा वक्त वे पहले ही जेल में गुजार चुके हैं। कुछ साल पहले एक खबर आई थी कि एक महिला ने करीब सैंतीस साल विचाराधीन कैदी के रूप में गुजारने के बाद जेल में ही दम तोड़ दिया था। इस संदर्भ में लगभग साढ़े चार साल पहले पचास साल पुराने एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी याद रखनी चाहिए कि अगर न्यायपालिका में लोगों का भरोसा बहाल रखना है तो लंबे समय से लटके मुकदमों के निपटारे की कोई व्यवस्था करनी होगी।


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ऎसा भी प्रेम...


एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा। बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।

फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, "यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।"

और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?" उस फकीर का उत्तर था, "जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले।

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पानी लाने के लिए एक और शादी कर ली!

 ठाणे।। एक आदमी को गांव में सूखे की वजह से तीसरी शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा! शाहपुर तालुके के देंगलमल गांव में 65 साल के रामचंद्र (बदला हुआ नाम) ने बताया कि मेरी पहली पत्नी बीमार रहती है और 13 लोगों के परिवार के लिए पानी लाने दूर नहीं जा सकती, जबकि दूसरी पत्नी काफी कमजोर है।

रामचंद्र के परिवार में 3 बेटे, उनकी पत्नियां और 3 पोते हैं। वह अपनी 3 बेटियों की शादी कर चुके हैं और वे अपनी ससुरालों में हैं।

रामचंद्र ने बताया, 'मेरी पहली शादी 20 साल की उम्र में
हुई थी। पहली पत्नी से 6 बच्चे हुए।' जब पहली पत्नी बीमार पड़ी तो रामचंद्र ने यह सोचकर दूसरी शादी की कि दूसरी पत्नी घर के काम देख लेगी। लेकिन, दूसरी पत्नी इतनी कमजोर थी कि वह घर के काम नहीं कर पाती थी। आखिरकार 10 साल पहले रामचंद्र ने तीसरी शादी की।

रामचंद्र अपनी शादी के पक्ष में तर्क देते हुए बताते हैं कि उनके गांव में 6 महीने तक पानी की बहुत किल्लत थी। उन्हें बगल के गांव से पानी लाने के लिए डेढ़ किलोमीटर दूर जाना होता था और कई बार 3 किलोमीटर दूर भत्सा नदी तक भी।

गांववालों ने पहले सोचा कि वह अपने शारीरिक सुख के लिए तीसरी शादी कर रहे हैं। गांव के हुसैन शेख बताते हैं, 'पहले हमने उनकी तीसरी शादी का विरोध किया, लेकिन बाद में हमें लगा कि वह ठीक कर रहे हैं। अब तीसरी पत्नी उनके घर के लिए पानी का इंतजाम कर लेती है।'

अपनी बहू के साथ रोज पानी ढोने में 5 घंटे खर्च करने वाली 70 साल की साकरी शेंडे कहती हैं, 'ज्यादातर रामचंद्र की तीसरी पत्नी ही पानी ढोती है। जब वह बीमार पड़ती है, तब घर के बाकी लोग पानी ढोते हैं।'

Thursday, May 17, 2012

बलात्कार का एक चेहरा यह भी



HTML clipboard बलात्कार एक ऐसा अपराध है जो पीड़ित महिला को भीतर तक तोड़ देता है। जिसके कारण पीड़िता जीते जी मर जाती है। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि, ''बलात्कार की पीड़ित महिला, बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवन भर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है जिसे उसने नहीं किया।''
बलात्कार को किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता, वस्तुतः दुनिया भर की औरतें बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का शिकार होती हैं। बलात्कार अब शहरों की सीमाओं को लाघंकर गांव-कस्बों में भी पहुंच गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 'भारत देश में प्रतिदिन लगभग 50 मामले बलात्कार के थानों में पंजीकृत होते हैं।' इस प्रकार भारत भर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती है। लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई ब्यां नहीं करती।
हालांकि बलात्कार अधिकतर अनजाने लोगों द्वारा किया जाता है, लेकिन अब ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें किसी परिचित द्वारा ही बलात्कार किया गया। इन परिचितों में सहपाठी, सहकर्मी, अधिकारी, शिक्षित और नियोक्ता अधिक होते हैं। ''विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, ''भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।'' वही महिलाओं के विकास के लिए केंद (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) द्वारा किए गए एक अध्ययन ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए वो चैकाने वाले थे। इसके अनुसार, ''भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।''
क्या यह पूरी सच्चाई ब्यां करती है कि बलात्कार के आंकड़ों से बलात्कारों की संख्या निर्धारित की जाए। शायद हम एक पक्ष की बात करते नजर आयेंगे, क्योंकि अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि की बात करें तो हम स्वतः समझ जायेंगे कि आज के परिप्रेक्ष्य में बलात्कार हो रहा है या मात्र किसी दबाव या रंजिश के चलते इसको स्त्री समुदाय एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। शायद मेरी इस टिप्पणी से बहुत सारे लोग सहमत न हो पर, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
अगर बलात्कार की खबरों पर चर्चा करें तो ऐसी बहुत सारी खबरें हमारे सामने से गुजरती है जिसको गले से उतारना मुश्किल लगता है। एक खबर, '28 साल के युवक ने 32 वर्ष की महिला को अपनी मोटर साइकिल में लिफ्ट दी, और फिर खेत में ले जाकर बलात्कार किया। एक और खबर, 20 साल के युवक ने 19 साल की लड़की को पुलिया के नीचे खीच कर बलात्कार किया। ऐसी तमाम खबरों से हम समाचारपत्र व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा रूबरू होते रहते हैं। इनमें कितनी सच्चाई है यह मैं और आप नहीं बल्कि वो दोनों ठीक तरह से बता सकते हैं।
आज के परिपे्रक्ष्य में जिस तरह का माहौल हमारे बीच में तेजी से पनपा है उससे हम सब अंजान नहीं हैं कि किस तरह युवक और युवती दोनों में प्रेमालाप पनपता है और फिर एक समय सीमा के उपरांत यह प्रेम शारीरिक संबंधों में तबदील हो जाता है। ऐसा नहीं है कि प्रेम के बाद इन लोगों के बीच संबंध बने ही, परंतु अधिकांश 10 में से 9 लोगों के बीच संबंध स्थापित हो ही जाते हैं, जो समाज की नजर से नहीं आते। इसे एक विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण कहें या फिर शरीर में आये हारमोन का बदलाव, सोचने वाली बात है। वहीं इस लुकाछिपी के खेल में कभी-कभार इनके संबंधों की जानकारी लड़की के परिजनों को पता चल जाती है तो सारी प्रेम कहानी एक सिरे से खारिज कर लड़की के परिवार वाले लड़की पर दबाव बनाकर लड़के पर बलात्कार का झूठा आरोप लगवा देते हैं। जिसकी सुनवाई हमेशा से ही लड़की के पक्ष में होती है। क्यांेकि लड़की को पीड़ित के दृष्टिकोण से देखा जाता है।
बलात्कार का एक और चेहरा हमारे समाने परिलक्षित होता है जिसकी हकीकत से सभी बेखबर और पुलिस के नजरियें से इन खबरों को प्रकाशित करने वाले पत्रकार और समाज का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग इस तरह के प्रेमालाप को बलात्कार मान लेता है। मैं यह नहीं कर रहा हूं कि बलात्कार नहीं होते, बलात्कार होते हैं, नन्हीं बच्चियों के साथ, वृद्धाओं के साथ, सामूहिक लोगों द्वारा, अपनी हवस का शिकार इन लड़कियों को बना लेते हैं। जो कभी-कभी समाज के समाने आ जाती हैं और बहुत बार एक चार दीवारी में दम तोड़ देती हैं। फिर भी एक लड़का एक लड़की के साथ बलात्कार नहीं कर सकता जब तक उनकी सहमति न हो। इस बात को खारिज करने के लिए महिला समुदाय मेरे विपक्ष में खड़ी हो सकती हैं, इसके साथ-साथ शायद एक वर्ग मेरे भी पक्ष में खड़ा हो जो मेरी बात से सहमति रखता हो, कि बलात्कार का एक और चेहरा जो समाज के समाने नहीं आ पाता और उसे बलात्कार का नाम दे दिया जाता है।
इस आलोच्य में कहा जाए तो बलात्कार के कानून में संशोधन की आवश्यकता महसूस होती है। कि बलात्कार की पूछताछ दोनों पक्षों से सख्ती से होनी चाहिए, यदि बलात्कार हुआ है और सारे सबूत बलात्कारी के विपक्ष में जाते है तो उसे सजा होनी चाहिए। जबकि पुलिस पूरे मामलें को एक पक्ष से न देखकर विभिन्न दृष्टिकोणों से इसकी जांच करें कि क्या इनके बीच कभी कोई प्यार जैसा संबंध या फिर किसी रंजिश के चलते तो ऐसा नहीं किया जा रहा है। इसकी गहनता से जांच होनी चाहिए। तब जाकर बलात्कार की हकीकत सबसे समाने आ सकेगी।
प्यार जिंदगी का वह खुबसूसूरत अहसास

प्यार जिंदगी का वह खुबसूसूरत अहसास है जिसे हर कोइ महसूस करना चाहता हैं। एक ऐसा पवित्र जस्बाद जो हर रिश्ते की बुनियाद है। इस अहसास को अगर महसूस करों तो मानो जन्नत मिल जाती है, रब तक पहुंचने का यह सबसे आसान तरीका है। सच्चा प्यार और रब दोनों ही बडी मुश्किल से मिलते हैं। प्यार का रिश्ता बड़ा ही अटूट रिश्ता है, जो कुछ पल का नहीं जंम जंमातर का होता है। यह एक पल का नहीं एक साल का नहीं यह रिश्ता तो सदियों का होता है। प्यार किसी से कभी भी हो सकता है। प्यार के अनेक रुप होते है। मां का प्यार भाइ बहन का प्यार दोस्तों का प्यार। सबके लिए प्यार की परिभाषा अलग अलग है। लेकिन किसी ने प्यार में सच्चे दोस्त को पाया तो किसीने दोस्त में सच्चे प्यार को पा लिया। अंत में जीत सच्चे प्यार की ही होती है। सच्चे प्यार की तो लोग मिसाल दिया करते है। लैला मजनू, हीर रांझा, सोनी महीवाल, शाहजहान मुमताज,इनके प्यार के किस्से तो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षर में लिखे गये थे। इनकी प्यार की ऊंचाइ को छूना सबके बस में नहीं है।
प्यार और सेक्स एक सिक्के के दो पहलू है। यह एक दूसरे के साथ ही चलते है, मगर यह जरुरी नहीं की हर रिश्ते में सेक्स हो, हर वह रिश्ता कामयाब है जो सेक्सु्अल अपील करता हो। किसी भी रिश्ते की बुनियाद प्यार और विश्वास होनी चाहिए नाकि सेक्स जैसे बाहरी जस्बाद, लेकिन आज के जमाने में प्यार के रिश्तों में मिलावट होने लगी है। लोग प्यार के नाम पर सेक्स परोसते है,उनके नजर में प्यार बस सेक्स करने का एक आसान सा जरीया हो गया है।
सेक्स को प्यार के साथ जोड़कर लोग प्यार जैसे पवित्र शब्द को रुसवा करने लगे है। प्यार का अनादर होने लगा है, लेकिन प्यार तो प्यार ही होता है। जंमों के रिश्ते बस पल भर की मौज या जरूरत बनकर रह गये है। आजकल तो हर पल रिश्ते बदलते है। पहले कहा जाता था कि हमारा समाज एक सोया हुआ समाज था, लेकिन अब यह समाज जाग चुका है। लोगों की जरूरत बढ़ गयी है, कपड़ा,रोटी व मकान के साथ साथ लोगों की आम जरूरतों में अब सेक्स भी शामिल हो गया है। जो बातें पहले बंद घरों में होती है अब वह खुले आम बाजारों में होने लगी है। पुराने जमाने की औरतों को कहां जाता था कि अगर वह अपनी पति को खुश नहीं रख पाई तो उनका जीवन व्यर्थ है। इसका क्या मतलब है…..तो क्या अगर वह अपने पति को सेक्सुअली खुश करती है तो ही उनका रिश्ता सफल है वरना नहीं ….अब सीधे औरत से पूछा जाता है कि बिस्तर पर आप अपने पति को कितने अंक देती है…..आज ढोल नगारे बजाकर यह बातें की जाती है…प्यार तो जैसे कहीं खो सा गया है।
आज लोगों को अगर प्यार है तो सिर्फ इंसान के शरीर से नाकि जस्बादों से। प्यार का रिश्ता भुख व हवस का बनकर रह गया है। प्यार तो मन से मन का मिलन है। लेकिन कुछ लोग तन से तन के मिलन को प्यार कहते है। प्यार जैसे चार दिवारों में बंद होकर रह गया है।
किसीके नाम ना बताने की शर्त पर…प्यार की यह कहानी सुनो
एक रिश्ता सो काल्ड प्यार का अगर इसे प्यार कहे तो गलत होगा। नए प्यार का अहसास था जिंदगी बहुत खुबसूरत,रंगीन और सुहानी लग रही थी..हमने साथ में काफी वक्त बिताया, ढेर सारे सपने सजाये साथ मे घुमना फिरना…लगा जैसे मेरे पैर तो जमीन पर ही नहीं है। नई जिंदगी मिल गयी हो जैसे…जीने मरने की कसमे ढेर सारे वादे किये।फिर अचानक उम्मीदें बढने लगी उसकी कामनाओं का सागर गहरा होता गया, प्यार जैसे कहीं खोने सा लगा उसे मुझसे कम मेरे जिस्म से ज्यादा प्यार होने लगा। वह मेरे पास तो आता था लेकिन मेरे लिए नहीं अपनी भुख मिटाने के लिए। मैने तो सुना था प्यार तो दो आत्माओं का मिलन है मगर यह क्या हुआ….यह प्यार नहीं एक सौदा था। तन का सौदा…धीरे धीरे मैं उससे दूर होती गई। बहुत दूर…..मैं पूछती हूं क्या यही प्यार है….मैने तो प्यार किया और उसने सौदा…….
राधा ने भी किशन से प्यार किया था, क्या उसने किशन को पाया? प्यार का दूसरा नाम त्याग, इन्तजार बलिदान और विश्वास है। किशन अंत में रुक्मिणी के ही हुए। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि राधा का प्यार सच्चा नहीं था। आज भी लोग राधा किशन की जोडी को ही अमर मानते है और साथ में उन दोनों की ही पूजा करते है। क्योंकि राधा ने कभी किशन को पाने की कोशिश नहीं की। अगर आपका प्यार सच्चा हो तो वह अमर हो जाता है। प्यार देने का नाम है। राधा के जीबन का अर्थ किशन थे। मीरा जो किशन की दीवानी थी। लोगो की इतनी तोहमत लगाने के बाद भी उसके लबो पर सिर्फ नाम होता था तो भगबान श्री कृष्ण का। त्याग और बलिदान की मूरत बनी। अपना सारा जीबन ब्यतित किया किशन के चरणों में। जहर का प्याला भी पिया हंसते हंसते। तो यह क्या प्यार नहीं था?

एक माँ जो अपने बच्चे को नौ महीने पेट में पालती है। इतना दर्द सहती है तो क्या उस ममता में प्यार नहीं है? एक दोस्त जो अपनी दोस्ती के लिए कुछ भी कर जाता है हर दुःख सुख बांटता है तो क्या यह प्यार नहीं है? वह सब सेक्सुअली किसीसे जुडे नहीं है तो क्या वह एक दूजे से प्यार नहीं करते? उन्होंने तो परमात्मा से मिलने का रास्ता बनाया है। हमने यहाँ प्यार के कितने रंग और रूप देखे। प्यार सिर्फ ढाई आखर का एक शब्द नहीं है, इस शब्द में पूरी दुनिया समाई है।

नाम ना बताने के शर्त पर एक और प्यार के अहसास से मिलते है।
वह आया कुछ पल के लिए। जाते जाते ढेर सारा प्यार का अहसास दे गया। एक रात आयी और चली गयी। कितने सपने सजाये लगा के मुझे भी प्यार हो सकता है, मैं भी प्यार के लायक हूं। लेकिन क्या सिर्फ एक ही रात के लिए। मैंने तो उस एक रात में अपनी पूरी दुनिया जिली, एक नयी ज़िन्दगी से मिली। क्या वह प्यार पल भर का ही था ? फिर छा गई काली अँधेरी रात। तंहाइ के बादल फिर मंडराने लगे। दे गया मुझे ज़िन्दगी भर का इंतजार। क्या वह प्यार नहीं था ? मैंने तो प्यार किया था। उसने सिर्फ हवास का रिश्ता बनाया था मुझसे।
हमारे देश में कुछ संस्कार आज भी जिंदा है जिसके बदौलत हम शादी जैसे पबित्र रिश्ते को मानते है। बिदेशो में तो "stay together live together " का चलन भी है। सेक्सपीयर ने अपने प्यार को अलग अलग रूप में भी दिखाया है. कभी वह रोमियो के जूलियट बने तो कभी……….
प्यार से बस प्यार करो उसे सेक्स के साथ मत जोड़ो। हमारा प्यार जो कहीं बाज़ार में सेक्स के नाम पर नीलाम हो रहा है। हमे उसे ढूंढ लाना है और उसे अपनी मर्य़ादा वापस दिलानी है. तभी यह समाज वापस से एक खुबसूरत संस्कारी और सुन्दर समाज कह लायेगा। जहा लोग प्यार से बस प्यार करेंगे और रिश्तों की इज्ज़त। नाकि उसे खरीदने बाज़ार जायेंगे।

प्यार जिंदगी का वह खुबसूसूरत अहसास है जिसे हर कोइ महसूस करना चाहता हैं। एक ऐसा पवित्र जस्बाद जो हर रिश्ते की बुनियाद है। इस अहसास को अगर महसूस करों तो मानो जन्नत मिल जाती है, रब तक पहुंचने का यह सबसे आसान तरीका है। सच्चा प्यार और रब दोनों ही बडी मुश्किल से मिलते हैं। प्यार का रिश्ता बड़ा ही अटूट रिश्ता है, जो कुछ पल का नहीं जंम जंमातर का होता है। यह एक पल का नहीं एक साल का नहीं यह रिश्ता तो सदियों का होता है। प्यार किसी से कभी भी हो सकता है। प्यार के अनेक रुप होते है। मां का प्यार भाइ बहन का प्यार दोस्तों का प्यार। सबके लिए प्यार की परिभाषा अलग अलग है।  लेकिन किसी ने प्यार में सच्चे दोस्त को पाया तो किसीने दोस्त में सच्चे प्यार  को पा लिया। अंत में जीत सच्चे प्यार की ही होती है। सच्चे प्यार की तो लोग मिसाल दिया करते है। लैला मजनू, हीर रांझा, सोनी महीवाल, शाहजहान मुमताज,इनके प्यार के किस्से तो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षर में लिखे गये थे। इनकी प्यार की ऊंचाइ को छूना सबके बस में नहीं है।

प्यार और सेक्स एक सिक्के के दो पहलू है। यह एक दूसरे के साथ ही चलते है, मगर यह जरुरी नहीं की हर रिश्ते में सेक्स हो, हर वह रिश्ता कामयाब है जो सेक्सु्अल अपील करता हो। किसी भी रिश्ते की बुनियाद प्यार और विश्वास होनी चाहिए नाकि सेक्स जैसे बाहरी जस्बाद, लेकिन आज के जमाने में प्यार के रिश्तों में मिलावट होने लगी है। लोग प्यार के नाम पर सेक्स परोसते है,उनके नजर में प्यार बस सेक्स करने का एक आसान सा जरीया हो गया है।

सेक्स को प्यार के साथ जोड़कर लोग प्यार जैसे पवित्र शब्द को रुसवा करने लगे है। प्यार का अनादर होने लगा है, लेकिन प्यार तो प्यार ही होता है। जंमों के रिश्ते बस पल भर की मौज या जरूरत बनकर रह गये है। आजकल तो हर पल रिश्ते बदलते है। पहले कहा जाता था कि हमारा समाज एक सोया हुआ समाज था, लेकिन अब यह समाज जाग चुका है। लोगों की जरूरत बढ़ गयी है, कपड़ा,रोटी व मकान के साथ साथ लोगों की आम जरूरतों में अब सेक्स भी शामिल हो गया है। जो बातें पहले बंद घरों में होती है अब वह खुले आम बाजारों में होने लगी है। पुराने जमाने की औरतों को कहां जाता था कि अगर वह अपनी पति को खुश नहीं रख पाई तो उनका जीवन व्यर्थ है। इसका क्या मतलब है…..तो क्या अगर वह अपने पति को सेक्सुअली खुश करती है तो ही उनका रिश्ता सफल है वरना नहीं ….अब सीधे औरत से पूछा जाता है कि बिस्तर पर आप अपने पति को कितने अंक देती है…..आज ढोल नगारे बजाकर यह बातें की जाती है…प्यार तो जैसे कहीं खो सा गया है।

आज लोगों को अगर प्यार है तो सिर्फ इंसान के शरीर से नाकि जस्बादों से। प्यार का रिश्ता भुख व हवस का बनकर रह गया है। प्यार तो मन से मन का मिलन है। लेकिन कुछ लोग तन से तन के मिलन को प्यार कहते है। प्यार जैसे चार दिवारों में बंद होकर रह गया है।

किसीके नाम ना बताने की शर्त पर…प्यार की यह कहानी सुनो

एक रिश्ता सो काल्ड प्यार का अगर इसे प्यार कहे तो गलत होगा। नए प्यार का अहसास था जिंदगी बहुत खुबसूरत,रंगीन और सुहानी लग रही थी..हमने साथ में काफी वक्त बिताया, ढेर सारे सपने सजाये साथ मे घुमना फिरना…लगा जैसे मेरे पैर तो जमीन पर ही नहीं है। नई जिंदगी मिल गयी हो जैसे…जीने मरने की कसमे ढेर सारे वादे किये।फिर अचानक उम्मीदें बढने लगी उसकी कामनाओं का सागर गहरा होता गया, प्यार जैसे कहीं खोने सा लगा उसे मुझसे कम मेरे जिस्म से ज्यादा प्यार होने लगा। वह मेरे पास तो आता था लेकिन मेरे लिए नहीं अपनी भुख मिटाने के लिए। मैने तो सुना था प्यार तो दो आत्माओं का मिलन है मगर यह क्या हुआ….यह प्यार नहीं एक सौदा था। तन का सौदा…धीरे धीरे मैं उससे दूर होती गई। बहुत दूर…..मैं पूछती हूं क्या यही प्यार है….मैने तो प्यार किया और उसने सौदा…….

राधा ने भी किशन से प्यार किया था, क्या उसने किशन को पाया? प्यार का दूसरा नाम त्याग, इन्तजार बलिदान और विश्वास है। किशन अंत में रुक्मिणी के ही हुए। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि राधा का प्यार सच्चा नहीं था। आज भी लोग राधा किशन की जोडी को ही अमर मानते है और साथ में उन दोनों की ही पूजा करते है। क्योंकि राधा ने कभी किशन को पाने की कोशिश नहीं की। अगर आपका प्यार सच्चा हो तो वह अमर हो जाता है। प्यार देने का नाम है। राधा के जीबन का अर्थ किशन थे। मीरा जो किशन की दीवानी थी। लोगो की इतनी तोहमत लगाने के बाद भी उसके लबो पर सिर्फ नाम होता था तो भगबान श्री कृष्ण का। त्याग और बलिदान की मूरत बनी। अपना सारा जीबन ब्यतित किया किशन के चरणों में। जहर का प्याला भी पिया हंसते हंसते। तो यह क्या प्यार नहीं था?

एक माँ जो अपने बच्चे को नौ महीने पेट में पालती है। इतना दर्द सहती है तो क्या उस ममता में प्यार नहीं है? एक दोस्त जो अपनी दोस्ती के लिए कुछ भी कर जाता है हर दुःख सुख बांटता है तो क्या यह प्यार नहीं है? वह सब सेक्सुअली किसीसे जुडे नहीं है तो क्या वह एक दूजे से प्यार नहीं करते? उन्होंने तो परमात्मा से मिलने का रास्ता बनाया है। हमने यहाँ प्यार के कितने रंग और रूप देखे। प्यार सिर्फ ढाई आखर का एक शब्द नहीं है,  इस शब्द में पूरी दुनिया समाई है।

नाम ना बताने के शर्त पर एक और प्यार के अहसास से मिलते है।

वह आया कुछ पल के लिए। जाते जाते ढेर सारा प्यार का अहसास दे गया। एक रात आयी और चली गयी। कितने सपने सजाये लगा के मुझे भी प्यार हो सकता है, मैं भी प्यार के लायक हूं। लेकिन क्या सिर्फ एक ही रात के लिए। मैंने तो उस एक रात में अपनी पूरी दुनिया जिली, एक नयी ज़िन्दगी से मिली। क्या वह प्यार पल भर का ही था ? फिर छा गई काली अँधेरी रात। तंहाइ के बादल फिर मंडराने लगे। दे गया मुझे ज़िन्दगी भर का इंतजार। क्या वह प्यार नहीं था ? मैंने तो प्यार किया था। उसने सिर्फ हवास का रिश्ता बनाया था मुझसे।

हमारे देश में कुछ संस्कार आज भी जिंदा है जिसके बदौलत हम शादी जैसे पबित्र रिश्ते को मानते है। बिदेशो में तो "stay together live together " का चलन भी है। सेक्सपीयर ने अपने प्यार को अलग अलग रूप में भी दिखाया है. कभी वह रोमियो के जूलियट बने तो कभी……….

प्यार से बस प्यार करो उसे सेक्स के साथ मत जोड़ो। हमारा प्यार जो कहीं बाज़ार में सेक्स के नाम पर नीलाम हो रहा है। हमे उसे ढूंढ लाना है और उसे अपनी मर्य़ादा वापस दिलानी है. तभी यह समाज वापस से एक खुबसूरत संस्कारी और सुन्दर समाज कह लायेगा। जहा लोग प्यार से बस प्यार करेंगे और रिश्तों की इज्ज़त। नाकि उसे खरीदने बाज़ार जायेंगे।


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तानाशाह और उनके अजीबो-गरीब काम

कैलिग्यूला (ईसा बाद 12-41)

रोमन सम्राट कैलिग्यूला इतिहास के पन्नों पर पहले तानाशाहों में गिने जाते हैं जो कि अपने भड़कीले व्यवहार और तुनक मिजाज़ी के लिए जाने जाते हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में इतिहास पढ़ाने वाले वरिष्ठ व्याख्याता डॉक्टर बेनेट बताते हैं कि कैलिग्यूला ने एक बार आदेश दिया कि सारी नौंकाएं नेपल्स की खाड़ी में एक कतार में खड़ी हो जाएं ताकि वो उन पर चल कर एक एक शहर से दूसरे शहर जा सके.

कैलिग्यूला को रेस के घोडे़ बेहद पंसद थे. कहा जाता है कि उन्होंने अपने प्रिय घोड़े के लिए अलग से घर बनवाया था, जिसमें उसकी सेवा के लिए सैनिक तैनात थे, साथ ही घोडे़ को सोने के मर्तबान में शराब पिलवाई जाती थी.

यूनिवर्सिटी ऑफ एक्स्टर के प्रोफेसर पीटर वाइसमैन का मानना है कि कैलिग्यूला अच्छी तरह से जानता था कि वो क्या कर रहा है. उसने सार्वभौमिक सत्ता और ताकत के इस्तेमाल की सारी संभावनाओं को तलाशा.

फ्रांसवा डूवलियर (1907-1971)

फ्रांसवा डूवलियर का मानना था कि हर महीने की 22 तारीख को उनमें आत्माओं की ताकत आ जाती है.

हैती के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसवा डूवलियर ने अपने चौदह साल के शासनकाल में तमाम मौकों पर अपना महिमा मंडन किया.

वो घोर अंधविश्वासी थे और उनका मानना था कि हर महीने की 22 तारीख को उनमें आत्माओं की ताकत आ जाती है.

इसलिए वो हर महीने की 22 तारीख को ही अपने आवास से बाहर निकलते थे. उनका दावा था कि 22 नवंबर 1963 को उन्हीं की आत्माओं की शक्तियों की वजह से अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या हुई थी.

छह बार उनकी हत्या के लिए प्रयास किये गए थे लेकिन वो हर बार बच निकले थे.

वर्ष 1971 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया.

इदी अमीन (1920-2003)

इदी अमीन ने खुद को फील्ड मार्शल, विक्टोरिया क्रॉस और मिलिट्री क्रॉस से भी सम्मानित किया.

सत्तर के दशक में युगांडा के शासक रहे इदी आमीन ने अपने जीवन को भरपूर जिया. खुद को उन्होंने बार-बार सम्मानित किया और पदकों का अम्बार लगा लिया.

उन्होंने खुद को फील्ड मार्शल, विक्टोरिया क्रॉस और मिलिट्री क्रॉस से भी सम्मानित किया.

उन्हें अपने आप से इतने ज्यादा मोह था कि वो खुद को क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के समकक्ष या उनसे बड़ा दिखाना चाहते थे.

उनका कहना था कि राष्ट्रमंडल का प्रमुख उन्हें होना चाहिए न कि महारानी को.

इस तरह की भी खबरें आती रहीं कि वो अपने राजनीतिक विरोधियों के कटे सर अपने फ्रिज में रखा करते थे.

हालांकि ये कभी साबित नहीं हुआ. एक बार उन्होंने रात के भोजन की टेबल पर अपने सलाहकार से कहा था कि मैं तुम्हारा जिगर खाना चाहता हूं, मैं तुम्हारे बच्चों को भी खाना चाहता हूं.

इदी अमीन की पांच पत्नियां और दर्जन भर बच्चे थे.

सपरमूरत नियाजोव (1940-2006)

नियाजोव ने अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की प्रतिमा बनवाई.

तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति नियाजोव खुद को एक ऐसे तानाशाह के रूप में पेश करते थे जैसे कोहन के काल्पनिक पात्र 'डिक्टेटर' का चरित्र है.

उन्होंने अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की परत चढ़ी प्रतिमा बनवाई थी जिसका मुख सूरज की तरफ था.

हालांकि तुर्कमेनिस्तान की अधिकांश जनता गरीबी में जीवन जी रही थी, लेकिन नियाजोवने राजधानी में एक बर्फ का महल बनवाया और रेगिस्तान के बीचोबीच एक झील के निर्माण का आदेश दिया.

उन्होंने अपने नाम पर शहर, पार्क बनवाए. यहां तक कि जनवरी महीने का नाम बदलकर उसका नामकरण अपने नाम पर कर दिया.

वर्ष 1997 में धूम्रपान छोड़ने के बाद उन्होंने अपने सारे मंत्रियों को ऐसा ही करने को कहा था.

उन्होंने नाटक, ओपेरा को तो प्रतिबंधित किया ही, साथ ही पुरुषों के लंबे बाल रखने पर प्रतिबंध लगा दिया.

सद्दाम हुसैन की तरह ही उन्होंने एक किताब लिखी . रुखनामा तुर्कमेनिस्तान के इतिहास पर उनके विचारों का संग्रह है. स्कूल और विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया गया.

2006 में उनका निधन हो गया और 2011 में उनकी स्वर्ण प्रतिमा भी हटा दी गई.

किम जोंग इल (1942-2011)

किम जोंग इल खुद को कोरिया का प्रिय पिता कहलाना पसंद करते थे

उत्तरी कोरिया के किम जोंग इल आधुनिक युग के तानाशाह माने जाते हैं. वो खुद को कोरिया का प्रिय पिता यानी डियर फादर कहलाना पसंद करते थे.

किम जोंग इल ने अपनी सत्ता और ताकत का महिमामंडन के लिए सरकारी मीडिया का इस्तेमाल किया.

आधिकारिक बयान के मुताबिक जब किम जोंग इल का जन्म हुआ तो आकाश में दो इंद्रधनुष और एक चमकता सितारा दिखाई दिए.

और उनकी मृत्यु पर बर्फ से ढकी एक विशाल झील के दो टुकड़े हो गए.

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Saturday, May 12, 2012

पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाएं

पर्यावरण, ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है जो संपूर्ण मानव समाज का महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य भौतिक तत्वों – पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ हैं। यदि मानव समाज प्रकृति के नियमों का भलीभाँति अनुसरण करें तो उसे कभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं में कमी नहीं रहेगी। मनुष्य अपनी आकश्यकताओं की पूर्ति के लिए वायु, जल, मिट्टी, पेड-पौधों, जीव-जन्तुओं आदि पर निर्भर हैं और इनका दोहन करता आ रहा हैं।

वर्तमान युग औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण का युग है। जहाँ आज हर काम को सुगम और सरल बनाने के लिए मशीनों का उपयोग होने लगा हैं, वहीं पर्यावरण का उल्लंघन भी हो रहा हैं। ना ही पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दिया जा रहा है और ना ही प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य तत्वों का सही मायने में उपयोग किया जा रहा हैं, परिणामस्वरूप प्रकृति कई आपदाओं का शिकार होती जा रही हैं।

वर्तमान समय में मनुष्य औद्योगिकीकरण और नगरीकरण में इस तरह से गुम हो चुका हैं कि वह स्वार्थपूर्ति के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन करने लगा है और पर्यावरण को असंतुलित बनाए हुए हैं। परिणाम स्वरूप मनुष्य को प्रदूषण, बाढ़, सूखा आदि आपदाओं का सामना करना पड़ता हैं। यदि मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य तत्वों की श्रृंखला का सुरक्षित तरीके से उपभोग करे तो पर्यावरण को संरक्षित रखा जा सकता हैं।

औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण के युग में प्रकृति पर अत्याचार होने लगा है, परिणामस्वरूप पर्यावरण में प्रदूषण, अशुद्ध वायु, जल की कमी, बीमारियों की भरमार दिन-प्रतिदिन एक गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई हैं, जिससे न तो मनुष्य प्रकृति को बचा पा रहा हैं और न ही खुद को । आज जहाँ मानव समाज विलासितापूर्ण जीवन की चाह लिए हुए प्रकृति का अति दोहन करता जा रहा हैं, वहीं वह अज्ञानतावश स्वयं की जान का भी दुश्मन बन चुका हैं।

पर्यावरण संरक्षण में वृक्षों का सबसे अधिक महत्व हैं। जिस तरह आज औद्योगिकीकरण के युग में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, वहाँ आज समाजसेवी संस्थाओं को जन-चेतना को जागृत और प्रोत्साहित करते हुए वृक्षारोपण को एक अनिवार्य गतिविधि बना देना चाहिए, ताकि मनुष्य अपनी विलासिताओं के लोभ में पर्यावरण का दुरूपयोग न कर सकें।

मानव की घोर भौतिकतावादी प्रवृत्ति, तीव्र औद्योगिकरण, प्राकृतिक संसाधनों का क्रूरतापूर्ण दोहन तथा उपभोक्तावादी संस्कृति ने प्रकृति की मूल संरचना और व्यवस्था में असंतुलन पैदा कर दिया है। जिसके प्रकारों, कारणों एवं प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित है।
प्रकार-
1. वायु प्रदूषण :- वायु में अवांछित तत्वों के प्रवेश के फलस्वरूप वायु प्रदूषण एक खतरनाक हद को पार करता जा रहा है। मोटर वाहनों, औद्योगिक संयंत्र, घरों के चूल्हों का धुआ, सी. एफ.सी. का अंधाधुंध प्रयोग इसका प्रमुख कारण है फलस्वरूप  कार्बन डाई-ऑक्साइड , कार्बन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों के बढने की संभावना बढ  गयी है।

2. जल- प्रदूषण :- अंधाधुंध औद्योगिकरण के कारण इनसे निकला गंदा जल नदियों में प्रवाहित करने, तेल प्रदूषण के फलस्वरूप जलीय जीवों को खतरा, मियादी बुखार, पेचिस, पीलिया, मलेरिया, हैजा जैसे रोग मुंह बाये खड़े हैं।
3.ध्वनि प्रदूषण :- वाहनों, कारखानों , विमानों, पॉप संगीत एवं फटाकों का शोर बहरा कर देने को उद्यत है। एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार -"ध्वनि प्रदूषण के कारण महानगरों के 10 प्रतिशत लोग मन को संकेन्द्रित नहीं कर पाते, 70 प्रतिशत लोग अपने को अशांत महसूस करते हैं तथा 66 प्रतिशत लोग तनाव एवं बेचैनी महसूस करते हैं।
4. भूमि प्रदूषण :- भूमि भी प्रदूषित हो चुकी है जिससे फसलें एवं उर्बरा शक्ति प्रभावित हो रही है। रासायनिक अपशिष्ट, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, पॉलीथीन, डिटजेंट , वृक्षों की कटाई, परमाणु विस्फोट आदि से भूमि प्रदूषित हो चुकी है।
5. अंतरिक्ष प्रदूषण :- अंतरिक्ष में 500 कृत्रिम उपग्रह चक्कर काट रहे हैं जिनसे रेडियोधर्मी पदार्थों के विकिरण का खतरा बना हुआ है।
समाधान :-
1. वृक्षारोपण एवं वनों का विनाश रोकना ।
2.जैविक खाद का प्रयोग ।
3.प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर प्रभावी नियंत्रण ।
4. नदियों में अपशिस्ट पदार्थों के प्रवाह पर रोक।
5. जनजागरूकता अभियान ।
6.कानूनों का कठोरता एवं ईमानदारी से पालन हो |





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Sunday, May 6, 2012

मनमानी का इलाज

मनमानी का इलाज

गरीबों के मुफ्त इलाज को लेकर निजी अस्पताल लंबे समय से आनाकानी करते रहे हैं। उन्हें बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी, इस शर्त पर कि वे अपने यहां कम से कम पचीस फीसद बिस्तर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित रखेंगे। उनकी जांच, आॅपरेशन, दवा आदि के मद में कोई पैसा नहीं लेंगे। मगर केंद्र सरकार के बार-बार अधिसूचना जारी करने, दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद उन्होंने नियम और शर्तों का पालन करना जरूरी नहीं समझा। बल्कि पिछले साल कुछ निजी अस्पतालों ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुहार लगाई कि उनके यहां कैंसर, हृदय रोग के इलाज जैसी विशिष्ट सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन रोगों का इलाज खासा खर्चीला है। ऐसे में गरीबों के लिए यानी पचीस फीसद मामलों में मुफ्त इलाज के प्रावधान से उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। तब सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार लगाई थी कि उन्हें ये बातें सस्ती दर पर जमीन लेने से पहले सोचनी चाहिए थीं। कुछ अस्पतालों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि जमीन आबंटन के समय गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त रखी ही नहीं गई थी। इस पर उच्च न्यायालय ने कहा है कि सस्ती दर पर भूखंड पाने वाला कोई भी अस्पताल इस तरह का कोई तर्क नहीं दे सकता। अदालत के इस आदेश से यह उम्मीद जगी है कि अब निजी अस्पतालों को सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करना ही होगा। पिछले हफ्ते संसद की लोकलेखा समिति ने सुझाव दिया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय एक ऐसा निगरानी तंत्र विकसित करे, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के निशुल्क इलाज संबंधी नियम और शर्तों के पालन में निजी अस्पतालों की मनमानी पर कड़ाई से नजर रखी जा सके। संसदीय समितियों की कई सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती   हैं। लेकिन अदालत के आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि सरकार इस सुझाव पर अमल करे।
निजी अस्पताल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का फायदा उठाते हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों, दवाओं, कुशल डॉक्टरों-नर्सों आदि के अभाव के चलते उनकी सेवाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर होता गया है। दूसरी ओर, निजी अस्पताल अपनी सेवाओं की मनचाही रकम वसूलते हैं। निजी स्कूलों को भी इस शर्त के साथ सस्ती दर पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी कि वे अपने यहां पचीस फीसद सीटें आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चों के लिए आरक्षित रखेंगे। मगर वे टालमटोल करते रहे। आखिरकार इस प्रावधान को शिक्षा अधिकार कानून में रखना पड़ा। निजी स्कूलों के मालिक-प्रबंधक फिर भी आनाकानी करते रहे और इस प्रावधान को उन्होंने अदालत में चुनौती दी। मगर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। साथ ही यह भी कहा कि निजी स्कूल गरीब बच्चों के लिए अलग से या अलग पाली में कक्षाएं नहीं लगा सकते। यह बात निजी अस्पतालों पर भी लागू होनी चाहिए, यानी सरकार को देखना होगा कि वे खैराती वार्ड जैसी कोई व्यवस्था न तलाश लें। चिकित्सा निरा व्यवसाय नहीं है। इससे मानवीय सरोकार हमेशा जुड़े रहे हैं। फिर निजी अस्पतालों से गरीबों के मुफ्त इलाज की अपेक्षा परोपकार के तौर पर नहीं की गई थी। उन्होंने रियायती दर पर जमीन पाने के लिए बाकायदा करार किया था। अगर वे इसका उल्लंघन करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने में सरकारों को संकोच नहीं करना चाहिए।


मां को अधिकार देने की पहल
हाल ही में योजना आयोग के दिए गए सुझाव को अगर वास्तविकता का जामा पहनाया जाता है, तो निस्संदेह भारतीय मां की परिस्थिति सामाजिक तौर पर सुदृढ़ होगी। एक लंबे समय से, समाज के संवेदनशील वर्ग द्वारा यह महसूस किया जा रहा था कि "भारतीय जननी" को कानूनी और सामाजिक तौर पर वह दर्जा हासिल नहीं हुआ, जोकि उसे मिलना चाहिए। इसी तथ्य को मद्देनजर रखते हुए मां को "फर्स्ट गार्जियन" (प्रथम अभिभावक) बनाने का प्रस्ताव योजना आयोग ने रखा है। अगर ऎसा हुआ, तो जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर स्कूल कॉलेज के एडमिशन फॉर्म समेत सभी सरकारी दस्तावेजों में "मां" का नाम ही मुख्य अभिभावक के रूप में दर्ज होगा। यह विडम्बना नहीं तो क्या है कि मां जो नौ महीने संतान को अपने खून से सींचती है, उसकी प्रथम अभिभावक नहीं होती। कुछेक कानूनी प्रावधानों के चलते मां अपने बच्चे की "वैधानिक अभिभावक" कहलाने की अधिकारिणी नहीं है। "हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट (1956)" की धारा 5-6 और "गार्जियन एण्ड वाड्र्स एक्ट (1980)" की धारा 19 को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है। इन कानूनों में नाबालिग बेटे या बेटी के पिता को ही वास्तविक अधिकारी या "नेचुरल गार्जियन" माना गया है। हां, यह बात अलग है कि विशेष परिस्थितियों में मां को बच्चे का अभिभावक बनाया जाता है, परन्तु विशेष परिस्थितियों की सत्यता सिद्ध करने के लिए न्यायालय का आश्रय लेना पड़ता है।

विगत दशकों में भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक आमूलचूल परिवर्तन के साथ खड़ी हुई दिखाई दे रही है, विशेष कर आर्थिक तौर पर महिलाओं के सुदृढ़ीकरण ने समाज में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। शनै: शनै: ऎसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, जो विवाह के बंधन को न स्वीकारते हुए भी "मां" बनना चाहती हैं और इसके लिए वह कानूनन बच्चे गोद ले रही हैं और दूसरी ओर, सम्बन्ध विच्छेद की अवस्था में वो महिलाएं जो अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं, उनके लिए एक ऎसे आदमी के नाम का बार-बार जिक्र होना जिसके साथ अब वे नहीं रह रही हों, पीड़ादायक है। यह गौरतलब तथ्य यह है कि 17 फरवरी 1999 को उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय माता-पिता दोनों को ही समान रूप से संतान का अधिकारी बताया था। अपने बच्चे की देखभाल में अपना सर्वस्व अर्पित करने वाली मां अपने बच्चे के स्कूल या कॉलेज के एडमिशन फार्म पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती। इसी तरह के सवालों को लेकर "हिन्दू माइनरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट (1956)" की संवैधानिक वैधता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की गई। ऎसा कोई सामाजिक, आर्थिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है, जिसके कारण यह कहा जा सके कि महिला अपने बच्चे की अभिभावक बनने की अधिकारी नहीं है। अगर कोई ठोस तर्क नहीं है, तो क्यों एक मां को उसके अधिकार से वंचित किया जा रहा है?

विगत वर्षो में उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णयों में देह व्यापार में संलग्न महिलाओं व उनके बच्चों के पुनर्वास पर गहरी चिंता व्यक्त की है। मानवीय आधार पर यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या देह व्यापार से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को स्वाभिमान से जीने का अधिकार नहीं है, जब भी ये बच्चे शिक्षा की ओर कदम बढ़ाकर आत्मनिर्भर होने का स्वप्न देखते हैं, तो उनकी मां स्कूल में एडमिशन के समय "पिता" के नाम के प्रश्न से भयभीत हो जाती है। हमें यह स्वीकारना ही होगा कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी क्यों न हों, मां अपने बच्चे की देखभाल पूर्ण समर्पण, त्याग और सक्षमता के साथ करती है, इसलिए एक स्त्री को जो दोयम दर्जे की स्थिति मिली हुई है, उसे योजना आयोग का यह प्रस्ताव पहले पायदान पर लाने की एक पहल है।

जिम्मेदार कौन
बगैर योजना के प्रशासन के नुमाइंदे कई बार ऎसी योजनाएं बनाते हंै, जिससे सरकार के साथ ही आमजन को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है। करीब सात साल पहले शासन ने रतनजोत से बॉयो-डीजल उत्पादन की योजना बनाई थी, तब कई निजी कंपनियां भी मैदान में कूद पड़ीं। कंपनियों ने किसानों को ललचाते हुए दो का पौधा 10 रूपए में बेचा। शासकीय अमले द्वारा भी लाखों की संख्या में रतनजोत के पौधे रोपे गए। अमले द्वारा रोपे गए पौधे जहां उदासीनता के चलते सूख गए। वहीं किसानों ने बड़े जतन से पौधों का रख-रखाव किया, लेकिन जब पौधे बीजोत्पादन करने लगे तो प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए।

तीन साल में जब बीजोत्पादन हुआ, तो बॉयो-डीजल संयंत्र नहीं लगे। यहां तक कि योजना के तहत जिन निजी कंपनियों ने भी बीज खरीदने का दावा किया था, वे भी भाग गई। सरकार ने भी रतनजोत के बीज खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं की। अधिकारियों ने यह कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली कि योजना ही बंद हो गई। यह ऎसा मामला है, जहां प्रशासनिक उदासीनता से न केवल किसानों की आस टूटी, बल्कि उनके जीवीकोपार्जन का एक अवसर भी हाथ से चला गया। सरकारी धन, जो अन्य विकास कार्यो में इस्तेमाल किया जा सकता था, वह भी बर्बाद हो गया।

प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए। ऎसे में किसान ठगा महसूस कर रहे हैं। मंदसौर में बॉयो-डीजल प्लांट स्थापित करने की योजना एक बहुआयामी योजना थी, जिससे लाभ सरकार, जनता, पर्यावरण सबको होना था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। ऎसे में नई योजनाओं के क्रियान्वयन में किसानों की भागीदारी को फिर से प्राप्त करना एक मुश्किल काम हो जाता है, क्योंकि विश्वास एक नाजुक संवेदना होती है, जो किसान व सरकार के आपसी सहज संबंध को कायम रखने में बुनियाद का काम करती है। इसलिए प्रशासन को सचेत होकर नियोजन पर ध्यान देना चाहिए।
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इंसाफ की ओर

इंसाफ की ओर
अगर मानवाधिकारों का हनन होता हो, तो कोई भी व्यवस्था न लोकतांत्रिक कही जा सकती है न न्यायसंगत। इसलिए उच्चतम न्यायालय ने उचित ही समय-समय पर फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं को गंभीरता से लिया है। पथरीबल मामले में उसका फैसला इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है। इस फैसले ने आरोपियों को न्यायिक प्रक्रिया के घेरे में लाने का रास्ता साफ कर दिया है। बारह साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समय आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के छत्तीसिहंपुरा में छत्तीस सिखों की हत्या कर दी थी। चार दिन बाद इस जनसंहार के आरोप में सेना ने पांच लोगों को मार गिराया और उनके आतंकवादी होने का दावा किया। मगर सेना के इस दावे पर शुरू से सवाल उठते रहे। मारे गए लोगों की शिनाख्त के लिए राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। आखिर जांच से यह तथ्य सामने आया कि सैनिक अधिकारियों के हाथों मारे गए पांचों व्यक्ति साधारण गांववासी थे। परिजनों ने उनके लापता होने की एफआइआर दर्ज कराई थी। जब मुठभेड़ में उनके मारे जाने की खबर आई तो वे स्तब्ध रह गए। उनकी मांग पर शवों को कब्र से निकाल कर डीएनए जांच कराई गई। यह साबित हो गया कि ये शव उन्हीं लोगों के थे जिनके लापता होने की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। फिर इस मामले को 2003 में सीबीआइ को सौंप दिया गया। इसके तीन साल बाद विशेष अदालत में दायर किए गए आरोप पत्र में उसने साफ कहा है कि पचीस मार्च 2000 को पथरीबल में हुई घटना मुठभेड़ नहीं थी। पांचों व्यक्ति अनंतनाग और उसके आसपास से पकड़ कर लाए गए थे। उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाकर सुनियोजित तरीके से मार डाला गया।
इसी तरह का एक वाकया असम के कामरूप जिले का भी है। इन दोनों मामलों में चूंकि सेना के अधिकारी आरोपी हैं, इसलिए मुकदमे की कार्यवाही बरसों से रुकी रही है। इस गतिरोध का एक आयाम सुरक्षा बल विशेषाधिकार अधिनियम से भी जुड़ा रहा है। इस अधिनियम के तहत किसी आपराधिक मामले में सैनिकों के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले केंद्र सरकार की इजाजत अनिवार्य है। इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई प्रश्न नहीं उठाया है, पर यह भी साफ कर दिया है कि आरोपियों को बख्शा नहीं जाएगा। उसने सैन्य प्राधिकरण से कहा है कि वह खुद तय कर ले कि कोर्ट मार्शल की कार्यवाही हो या सामान्य अदालत में मुकदमा चले। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि अगर सैन्य प्रतिष्ठान दो महीने में इस बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है तो वह मुकदमा चलाने की अनुमति पाने के लिए केंद्र सरकार से फरियाद करे। सीबीआई के अनुरोध पर सरकार को तीन महीने में निर्णय करना होगा। इस तरह एक लंबे कानूनी झगड़े का अंत हो गया है। पर पथरीबल की घटना के बारह साल बाद मामला सिर्फ इस मुकाम पर पहुंचा है कि न्यायिक प्रकिया शुरू करने की अड़चनें खत्म होती दिख रही हैं। जब-जब सुरक्षा बल विशेषाधिकार कानून के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आर्इं, सेना की ओर से यह दलील दी जाती रही कि आतंकवाद से निपटने के लिए यह कानून जरूरी है। पर इसमें सुरक्षा बलों के लिए विशेष प्रावधान कार्रवाई के दौरान होने वाली हिंसा को ध्यान में रख कर किए गए थे। जब सीबीआई जांच से फर्जी मुठभेड़ के आरोप की पुष्टि हुई, तो सेना ने कोर्ट मार्शल की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की? वैसा नहीं हुआ, तो केंद्र सरकार चुप क्यों बैठी रही? यह विचित्र है कि इतने अहम मामले में रक्षा मंत्रालय और सीबीआइ का रुख अलग- अलगरहा है।

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नियम सबके लिए एक हो

नियम सबके लिए एक हो
महाकाल लोगों की आस्था का प्रतीक। दूर-दूर से लोग इस ज्योतिर्लिग के दर्शन करने आते हैं। हर कोई चाहता है कि गर्भगृह में जाकर बाबा के दर्शन और उनका अभिषेक करे। गर्मियों की छुट्टी में दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है। भीड़ के साथ बढ़ रही हैं महाकाल प्रशासन की परेशानियां। मंगलवार को ही बाबा के दर्शन ढंग से नहीं होने को लेकर श्रद्धालुओं ने भारी हंगामा कर दिया। उसके बाद निर्णय लिया गया कि सुबह 11 से शाम 5 बजे तक गर्भगृह में प्रवेश बंद रखा जाएगा। गलती किसी की भी हो, लेकिन आम श्रद्धालु ही इससे सबसे ज्यादा परेशान होता है।

महाकाल के दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेश से भी श्रद्धालु आते हैं। जब वे इतने पास होते हुए भी गर्भगृह में नहीं पहुंच पाते तो निराशा स्वाभाविक है। हंगामे के बाद हरियाणा से आए एक श्रद्धालु का कहना था कि वह अब कभी महाकाल नहीं आएंगे। ये मात्र उज्ौन नहीं बल्कि प्रदेश की प्रतिष्ठा का प्रश्A है। आए दिन होने वाले हंगामे के लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए महाकाल प्रशासन, पंडे-पुजारी और श्रद्धालु सभी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। सबसे अधिक समस्या पैदा करते हैं वीआईपी। लगभग रोजाना महाकाल में कोई-न-कोई वीआईपी दर्शन के लिए आता है।

वीआईपी की व्यवस्था करने में ही अव्यवस्था फैलती है। घंटों लाइन में खड़े होकर गर्भगृह के पास पहुंचने वालों को जब पता चलता है कि कोई वीआईपी दर्शन कर रहा है, इसलिए उन्हें रोका गया है तो उनके सब्र का बांध टूट जाता है। वीआईपी के लिए वैसे तो कहीं कोई नियम मायने नहीं रखते, लेकिन भगवान के दरबार में तो सभी को एक माना जाना चाहिए। अलबत्ता जिनकी सुरक्षा को खतरा है, उन्हें इससे छूट दी जा सकती है। इसकी एक कड़ी पंडे-पुजारी भी हैं। चंद रूपयों के लालच में यजमानों को गर्भगृह में ले जाकर अभिषेक करवाने के लिए वे नियमों का ध्यान नहीं रखते। इधर गर्भगृह में भीड़ बढ़ी और उधर प्रवेश बंद हुआ। कई बार श्रद्धालु भी मनमानी पर उतारू हो जाते हैं।

वो चाहते हैं कि सबसे पहले उन्हें ही दर्शन हों। इसके कारण भी गड़बड़ी होती है और सुरक्षा गार्डो से तनातनी होती है। वीआईपी व्यवस्था में सुधार, पंडे-पुजारियों पर लगाम व श्रद्धालुओं को सुविधा देकर अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है। नियम कड़े बनाए जाएं और उसका पालन नहीं करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो तभी व्यवस्था में सुधार हो सकता है। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग नियम बनाना ठीक नहीं है। नियम सबके लिए एक होने चाहिए। कुछ खास त्योहारों जैसे शिवरात्रि, संक्रांति आदि पर गर्भगृह में प्रवेश बंद करना निश्चित ही उचित है, लेकिन आम दिनों में महाकाल प्रशासन को इससे बचना चाहिए।

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जिन्दगी से लंबी पीड़ा की कहानी

जिन्दगी से लंबी पीड़ा की कहानी
 

सूरतगढ़। चार बच्चों को छोड़ पति चल बसा। न सिर छिपाने के लिए स्थाई छत और न ही पेट भरने के लिए घर में दाने थे। उम्मीद थी कि फार्म में नौकरी लगकर बच्चों को संभाल लूंगी लेकिन फार्म प्रशासन ने भी सुध नहीं ली। यह पीड़ा है मृतक सादूराम की पत्नी शकुंतला देवी की, जो अनुकम्पा नियुक्ति की बाट जोह रही है।

सादूराम फार्म मे दैनिक वेतन भोगी के रूप मे कार्यरत था। उसे न्यूनतम मजदूरी मिलती थी। उसने कर्ज लेकर आठ बच्चों में से चार पुत्रियों की शादी कर दी। 2008 में लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। ऎसे में दो पुत्रों व दो पुत्रियों के भरण-पोष्ाण तथा कर्ज उतारने की जिम्मेदारी शकुंतला देवी पर आ गई। उसने लोगों के घर बर्तन साफ कर बच्चों का पेट भरने का जतन किया लेकिन पार नहीं पड़ी। अंतत: पन्द्रह वर्षीय पुत्र किसनकुमार ने परिवार की जिम्मेदारी उठा ली और फार्म मे ठेकेदार के अधीन न्यूनतम मजदूरी पर लग गया। दो वर्ष तक न्यूनतम मजदूरी पर काम करने के बाद वह अन्य स्थान पर मजदूरी करने लगा। लगातार मजदूरी नहीं मिलने से परिवार का पोषण मुश्किल हो गया।

बच्चों का क्या करूं
- चार बच्चों की जिम्मेदारी का कैसे निर्वहन करूं। बेटियां शादी योग्य हो गई, लेकिन फार्म में नौकरी नहीं मिलने के कारण शादी करना मुश्किल हो गया है। बच्चे पढ़ नहीं पाए। इस कारण अच्छा कार्य नहीं मिल पाएगा। फार्म प्रशासन उदारता दिखाए तो बच्चों का भविष्य संवर जाए।

कुपोषण के हालात
- शकुंतला देवी के साथ रहने वाली दोनों पुत्री कुपोषण का शिकार हो रही हैं। घर मे भी रूखी-सूखी खाकर पेट भरा। शकुंतला देवी के अनुसार दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कैसे किया, यह वही जानती है।

भूखे मर रहे हैं लोग
- फार्म मे मृतक आश्रित की नौकरी नहीं मिलने से कई परिवार भूखों मर रहे हैं। फार्म प्रबंधन को सहानुभूति का रवैया अपनाकर इन्हें तुरन्त नियुक्ति देनी चाहिए।

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गरीबी का पैमाना

गरीबी का पैमाना
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के ताजा आंकड़ों से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि देश की आधी से अधिक आबादी बदहाली में जी रही है। इस अध्ययन के मुताबिक जुलाई 2009 से जून 2010 के बीच साठ फीसद ग्रामीण रोजाना पैंतीस रुपए से कम पर गुजारा कर रहे थे। वहीं साठ फीसद शहरी जनसंख्या का औसत दैनिक खर्च छियासठ रुपए दर्ज किया गया। पर अगर साठ फीसद के बजाय नीचे की दस फीसद आबादी को लें तो हालत और खराब दिखेगी। सर्वेक्षण के समय ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे नीचे की दस फीसद आबादी का प्रतिव्यक्ति दैनिक खर्च महज पंद्रह रुपए से कम था। शहरों में यह हिसाब बीस रुपए से नीचे ठहरता है। विभिन्न राज्यों के बीच भी आय या व्यय के लिहाज से काफी अंतर है। मसलन बिहार, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा का प्रतिव्यक्ति उपभोक्ता खर्च केरल के मुकाबले आधे से भी कम है। शहरी और ग्रामीण भारत और विभिन्न राज्यों के प्रतिव्यक्ति दैनिक खर्च के आंकड़े देने के साथ ही इस सर्वेक्षण ने पूरे देश में गरीबी के बारे में भी एक अनुमान पेश किया है।
इस सर्वेक्षण के समय गरीबी रेखा ग्रामीण भारत के लिए करीब साढ़े बाईस रुपए और शहरों के लिए करीब साढ़े अट्ठाईस रुपए थी। इसके आधार पर गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का आंकड़ा 35.46 करोड़ है। जबकि 2004-05 में यह आंकड़ा 40.72 करोड़ था। यानी इस दौरान गरीबों की तादाद में कोई सवा पांच करोड़ की कमी आई। 2004 में ही कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी थी। वह इस आंकड़े को अपनी एक खास उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। पर ध्यान रहे कि इस अध्ययन में गरीबी आकलन के लिए वही कसौटी लागू की गई जो योजना आयोग ने तय कर रखी है। आयोग ने उसी को मूल्य सूचकांक के हिसाब से संशोधित करके ग्रामीण क्षेत्रों के लिए छब्बीस रुपए और शहरी क्षेत्रों के लिए बत्तीस रुपए का मापदंड कुछ महीने पहले पेश किया था। इस पर देश में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई और सुप्रीम कोर्ट ने भी आपत्ति जताई। विडंबना यह है कि उच्चतम न्यायालय के एतराज और देश भर में उठे विवाद के बावजूद योजना आयोग गरीबी रेखा को बदलने को तैयार नहीं है। सरकार और आयोग की ओर से सिर्फ यह आश्वासन दिया गया है कि पीडीएस के लाभार्थियों की संख्या में कोई कमी नहीं की जाएगी।
गरीबी के अंतरराष्ट्रीय पैमाने के हिसाब से सवा डॉलर प्रतिदिन पाने वाले को गरीब और एक डॉलर वाले को अति गरीब की श्रेणी में रखा जाता है। यह विचित्र है कि हमारे नीतिकार भूमंडलीकरण की दुहाई देते नहीं थकते और कुछ सेवाओं और संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने का दम भरते हैं, पर जब गरीबी के आकलन की बात आती है तो वे अंतरराष्ट्रीय मापदंड को स्वीकार नहीं करते। अगर वैश्विक पैमाने को भारत में लागू किया जाए तो गरीबी का कैसा नक्शा सामने आएगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल है कि सरकार और आयोग गरीबी रेखा को बदलने को राजी क्यों नहीं हैं? इसलिए कि अगर गरीबी रेखा तर्कसंगत होगी तो गरीबों की तादाद काफी बढ़ी हुई दिखेगी। फिर गरीबी घटने का दावा आंकड़ों में भी नहीं किया जा सकेगा। यही नहीं, तब प्रचलित आर्थिक नीतियों की नाकामी दिखेगी और उन्हें बदलने का दबाव भी पैदा हो सकता है। सत्ता में बैठे हुए लोग और नीति-निर्माता ऐसा हरगिज नहीं चाहते। यह अलग बात है कि विकास को समावेशी बनाने का राग वे जब-तब अलापते रहते हैं।
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दवा की दरकार

दवा की दरकार
सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में जरूरी चिकित्सीय सुविधाओं और मुफ्त वितरित की जाने वाली दवाओं के अभाव की शिकायतें आम हैं। इन्हें दूर करने के इरादे तो बहुत जताए जाते हैं, मगर कारगर कदम न उठाए जा पाने के कारण स्थिति जस की तस बनी रहती है। यही वजह है कि ज्यादातर लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना और महंगे इलाज के लिए मजबूर होना पड़ता है। जबकि  राज्य सरकारें इस दिशा में संजीदगी दिखाएं तो सरकारी अस्पतालों पर लोगों का भरोसा बहाल करना मुश्किल नहीं है। इस मामले में राजस्थान सरकार की पहल एक मिसाल कही जा सकती है। पिछले साल अक्तूबर में गहलोत सरकार ने राज्य के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर तीन सौ पचासी जीवनरक्षक दवाओं के मुफ्त वितरण का कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम की कामयाबी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इस अवधि में सरकारी अस्पतालों में आने वालों की तादाद करीब चालीस फीसद बढ़ गई है। हर दिन करीब दो लाख लोगों को मुफ्त दवाएं वितरित की जाती हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को काफी मदद मिल रही है। जाहिर है, दूसरे सरकारी कार्यक्रमों की तरह इसे शुरू करके अपने हाल पर नहीं छोड़ दिया गया। इसे सफल बनाने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। यों राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, जननी सुरक्षा, गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाएं देश भर में चलाई जा रही हैं, मगर अपेक्षित नतीजे नहीं आ पा रहे तो उसके पीछे राज्य सरकारों में संजीदगी की कमी सबसे बड़ी वजह है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के करीब अस्सी करोड़ यानी कुल आबादी के दो तिहाई लोगों तक आवश्यक दवाओं की पहुंच सुनिश्चित नहीं हो पाती। इसके अलावा इलाज पर आने वाले खर्च की वजह से हर साल करीब दो करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। क्योंकि बहुत सारे लोगों को सामान्य रूप से ठीक हो सकने वाले रोगों से निजात पाने के लिए भी जमीन-जायदाद बेचनी या गिरवी रखनी पड़ती है। तमाम स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बावजूद देश में तीन साल तक की उम्र के करीब छियालीस फीसद बच्चे और पंद्रह से उनचास साल के  बीच की करीब छत्तीस फीसद महिलाएं कुपोषण, रक्ताल्पता आदि की शिकार हैं। वहीं जीवनशैली और पर्यावरण में बदलाव के चलते पैदा होने वाली बीमारियों पर काबू पाना लगातार मुश्किल होता गया है। यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी होनी चाहिए। मगर समय-समय पर ऐसी रिपोर्टों के आते रहने के बावजूद हमारी सरकारों के कान पर जूं नहीं रेंगती। गरीबों को ध्यान में रख कर चलाई गई स्वास्थ्य योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। अस्पतालों में मुफ्त वितरित की जाने वाली दवाओं की खरीद में धांधली होती है। बच्चों को जरूरी प्रतिरोधक टीके नहीं लगाए जा पाते। टीकाकरण के सारे कार्यक्रम लक्ष्य से पीछे चलते रहते हैं। जब पूर्वी उत्तर प्रदेश से दिमागी बुखार से लोगों के मरने या पश्चिम बंगाल के अस्पतालों से शिशुओं की मौत जैसी खबरें आती हैं, तब सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की दुर्दशा जरूर चर्चा का विषय बनती है। फिर सब कुछ भुला दिया जाता है। जबकि इस तरह की बड़ी त्रासदी भी सरकारी अस्पतालों में व्याप्त संवेदनहीनता और उपेक्षा का नतीजा होती है। '
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