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Friday, May 25, 2012
यह कैसा पढ़ाई का दबाव
युवाओं आत्महत्या नहीं है समाधान
अच्छाई और बुराई का बोझ
ऎसा भी प्रेम...
| एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा। बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया। फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, "यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।" और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?" उस फकीर का उत्तर था, "जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। 00000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000 पानी लाने के लिए एक और शादी कर ली! ठाणे।। एक आदमी को गांव में सूखे की वजह से तीसरी शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा! शाहपुर तालुके के देंगलमल गांव में 65 साल के रामचंद्र (बदला हुआ नाम) ने बताया कि मेरी पहली पत्नी बीमार रहती है और 13 लोगों के परिवार के लिए पानी लाने दूर नहीं जा सकती, जबकि दूसरी पत्नी काफी कमजोर है। रामचंद्र के परिवार में 3 बेटे, उनकी पत्नियां और 3 पोते हैं। वह अपनी 3 बेटियों की शादी कर चुके हैं और वे अपनी ससुरालों में हैं। रामचंद्र ने बताया, 'मेरी पहली शादी 20 साल की उम्र में हुई थी। पहली पत्नी से 6 बच्चे हुए।' जब पहली पत्नी बीमार पड़ी तो रामचंद्र ने यह सोचकर दूसरी शादी की कि दूसरी पत्नी घर के काम देख लेगी। लेकिन, दूसरी पत्नी इतनी कमजोर थी कि वह घर के काम नहीं कर पाती थी। आखिरकार 10 साल पहले रामचंद्र ने तीसरी शादी की। रामचंद्र अपनी शादी के पक्ष में तर्क देते हुए बताते हैं कि उनके गांव में 6 महीने तक पानी की बहुत किल्लत थी। उन्हें बगल के गांव से पानी लाने के लिए डेढ़ किलोमीटर दूर जाना होता था और कई बार 3 किलोमीटर दूर भत्सा नदी तक भी। गांववालों ने पहले सोचा कि वह अपने शारीरिक सुख के लिए तीसरी शादी कर रहे हैं। गांव के हुसैन शेख बताते हैं, 'पहले हमने उनकी तीसरी शादी का विरोध किया, लेकिन बाद में हमें लगा कि वह ठीक कर रहे हैं। अब तीसरी पत्नी उनके घर के लिए पानी का इंतजाम कर लेती है।' अपनी बहू के साथ रोज पानी ढोने में 5 घंटे खर्च करने वाली 70 साल की साकरी शेंडे कहती हैं, 'ज्यादातर रामचंद्र की तीसरी पत्नी ही पानी ढोती है। जब वह बीमार पड़ती है, तब घर के बाकी लोग पानी ढोते हैं।' |
Thursday, May 17, 2012
बलात्कार का एक चेहरा यह भी
बलात्कार को किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता, वस्तुतः दुनिया भर की औरतें बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का शिकार होती हैं। बलात्कार अब शहरों की सीमाओं को लाघंकर गांव-कस्बों में भी पहुंच गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 'भारत देश में प्रतिदिन लगभग 50 मामले बलात्कार के थानों में पंजीकृत होते हैं।' इस प्रकार भारत भर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती है। लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई ब्यां नहीं करती। हालांकि बलात्कार अधिकतर अनजाने लोगों द्वारा किया जाता है, लेकिन अब ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें किसी परिचित द्वारा ही बलात्कार किया गया। इन परिचितों में सहपाठी, सहकर्मी, अधिकारी, शिक्षित और नियोक्ता अधिक होते हैं। ''विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, ''भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।'' वही महिलाओं के विकास के लिए केंद (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) द्वारा किए गए एक अध्ययन ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए वो चैकाने वाले थे। इसके अनुसार, ''भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।'' क्या यह पूरी सच्चाई ब्यां करती है कि बलात्कार के आंकड़ों से बलात्कारों की संख्या निर्धारित की जाए। शायद हम एक पक्ष की बात करते नजर आयेंगे, क्योंकि अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि की बात करें तो हम स्वतः समझ जायेंगे कि आज के परिप्रेक्ष्य में बलात्कार हो रहा है या मात्र किसी दबाव या रंजिश के चलते इसको स्त्री समुदाय एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। शायद मेरी इस टिप्पणी से बहुत सारे लोग सहमत न हो पर, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। अगर बलात्कार की खबरों पर चर्चा करें तो ऐसी बहुत सारी खबरें हमारे सामने से गुजरती है जिसको गले से उतारना मुश्किल लगता है। एक खबर, '28 साल के युवक ने 32 वर्ष की महिला को अपनी मोटर साइकिल में लिफ्ट दी, और फिर खेत में ले जाकर बलात्कार किया। एक और खबर, 20 साल के युवक ने 19 साल की लड़की को पुलिया के नीचे खीच कर बलात्कार किया। ऐसी तमाम खबरों से हम समाचारपत्र व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा रूबरू होते रहते हैं। इनमें कितनी सच्चाई है यह मैं और आप नहीं बल्कि वो दोनों ठीक तरह से बता सकते हैं। आज के परिपे्रक्ष्य में जिस तरह का माहौल हमारे बीच में तेजी से पनपा है उससे हम सब अंजान नहीं हैं कि किस तरह युवक और युवती दोनों में प्रेमालाप पनपता है और फिर एक समय सीमा के उपरांत यह प्रेम शारीरिक संबंधों में तबदील हो जाता है। ऐसा नहीं है कि प्रेम के बाद इन लोगों के बीच संबंध बने ही, परंतु अधिकांश 10 में से 9 लोगों के बीच संबंध स्थापित हो ही जाते हैं, जो समाज की नजर से नहीं आते। इसे एक विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण कहें या फिर शरीर में आये हारमोन का बदलाव, सोचने वाली बात है। वहीं इस लुकाछिपी के खेल में कभी-कभार इनके संबंधों की जानकारी लड़की के परिजनों को पता चल जाती है तो सारी प्रेम कहानी एक सिरे से खारिज कर लड़की के परिवार वाले लड़की पर दबाव बनाकर लड़के पर बलात्कार का झूठा आरोप लगवा देते हैं। जिसकी सुनवाई हमेशा से ही लड़की के पक्ष में होती है। क्यांेकि लड़की को पीड़ित के दृष्टिकोण से देखा जाता है। बलात्कार का एक और चेहरा हमारे समाने परिलक्षित होता है जिसकी हकीकत से सभी बेखबर और पुलिस के नजरियें से इन खबरों को प्रकाशित करने वाले पत्रकार और समाज का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग इस तरह के प्रेमालाप को बलात्कार मान लेता है। मैं यह नहीं कर रहा हूं कि बलात्कार नहीं होते, बलात्कार होते हैं, नन्हीं बच्चियों के साथ, वृद्धाओं के साथ, सामूहिक लोगों द्वारा, अपनी हवस का शिकार इन लड़कियों को बना लेते हैं। जो कभी-कभी समाज के समाने आ जाती हैं और बहुत बार एक चार दीवारी में दम तोड़ देती हैं। फिर भी एक लड़का एक लड़की के साथ बलात्कार नहीं कर सकता जब तक उनकी सहमति न हो। इस बात को खारिज करने के लिए महिला समुदाय मेरे विपक्ष में खड़ी हो सकती हैं, इसके साथ-साथ शायद एक वर्ग मेरे भी पक्ष में खड़ा हो जो मेरी बात से सहमति रखता हो, कि बलात्कार का एक और चेहरा जो समाज के समाने नहीं आ पाता और उसे बलात्कार का नाम दे दिया जाता है। इस आलोच्य में कहा जाए तो बलात्कार के कानून में संशोधन की आवश्यकता महसूस होती है। कि बलात्कार की पूछताछ दोनों पक्षों से सख्ती से होनी चाहिए, यदि बलात्कार हुआ है और सारे सबूत बलात्कारी के विपक्ष में जाते है तो उसे सजा होनी चाहिए। जबकि पुलिस पूरे मामलें को एक पक्ष से न देखकर विभिन्न दृष्टिकोणों से इसकी जांच करें कि क्या इनके बीच कभी कोई प्यार जैसा संबंध या फिर किसी रंजिश के चलते तो ऐसा नहीं किया जा रहा है। इसकी गहनता से जांच होनी चाहिए। तब जाकर बलात्कार की हकीकत सबसे समाने आ सकेगी। |
तानाशाह और उनके अजीबो-गरीब कामकैलिग्यूला (ईसा बाद 12-41)रोमन सम्राट कैलिग्यूला इतिहास के पन्नों पर पहले तानाशाहों में गिने जाते हैं जो कि अपने भड़कीले व्यवहार और तुनक मिजाज़ी के लिए जाने जाते हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में इतिहास पढ़ाने वाले वरिष्ठ व्याख्याता डॉक्टर बेनेट बताते हैं कि कैलिग्यूला ने एक बार आदेश दिया कि सारी नौंकाएं नेपल्स की खाड़ी में एक कतार में खड़ी हो जाएं ताकि वो उन पर चल कर एक एक शहर से दूसरे शहर जा सके. कैलिग्यूला को रेस के घोडे़ बेहद पंसद थे. कहा जाता है कि उन्होंने अपने प्रिय घोड़े के लिए अलग से घर बनवाया था, जिसमें उसकी सेवा के लिए सैनिक तैनात थे, साथ ही घोडे़ को सोने के मर्तबान में शराब पिलवाई जाती थी. यूनिवर्सिटी ऑफ एक्स्टर के प्रोफेसर पीटर वाइसमैन का मानना है कि कैलिग्यूला अच्छी तरह से जानता था कि वो क्या कर रहा है. उसने सार्वभौमिक सत्ता और ताकत के इस्तेमाल की सारी संभावनाओं को तलाशा. फ्रांसवा डूवलियर (1907-1971)फ्रांसवा डूवलियर का मानना था कि हर महीने की 22 तारीख को उनमें आत्माओं की ताकत आ जाती है. हैती के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसवा डूवलियर ने अपने चौदह साल के शासनकाल में तमाम मौकों पर अपना महिमा मंडन किया. वो घोर अंधविश्वासी थे और उनका मानना था कि हर महीने की 22 तारीख को उनमें आत्माओं की ताकत आ जाती है. इसलिए वो हर महीने की 22 तारीख को ही अपने आवास से बाहर निकलते थे. उनका दावा था कि 22 नवंबर 1963 को उन्हीं की आत्माओं की शक्तियों की वजह से अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या हुई थी. छह बार उनकी हत्या के लिए प्रयास किये गए थे लेकिन वो हर बार बच निकले थे. वर्ष 1971 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. इदी अमीन (1920-2003)इदी अमीन ने खुद को फील्ड मार्शल, विक्टोरिया क्रॉस और मिलिट्री क्रॉस से भी सम्मानित किया. सत्तर के दशक में युगांडा के शासक रहे इदी आमीन ने अपने जीवन को भरपूर जिया. खुद को उन्होंने बार-बार सम्मानित किया और पदकों का अम्बार लगा लिया. उन्होंने खुद को फील्ड मार्शल, विक्टोरिया क्रॉस और मिलिट्री क्रॉस से भी सम्मानित किया. उन्हें अपने आप से इतने ज्यादा मोह था कि वो खुद को क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के समकक्ष या उनसे बड़ा दिखाना चाहते थे. उनका कहना था कि राष्ट्रमंडल का प्रमुख उन्हें होना चाहिए न कि महारानी को. इस तरह की भी खबरें आती रहीं कि वो अपने राजनीतिक विरोधियों के कटे सर अपने फ्रिज में रखा करते थे. हालांकि ये कभी साबित नहीं हुआ. एक बार उन्होंने रात के भोजन की टेबल पर अपने सलाहकार से कहा था कि मैं तुम्हारा जिगर खाना चाहता हूं, मैं तुम्हारे बच्चों को भी खाना चाहता हूं. इदी अमीन की पांच पत्नियां और दर्जन भर बच्चे थे. सपरमूरत नियाजोव (1940-2006)नियाजोव ने अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की प्रतिमा बनवाई. तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति नियाजोव खुद को एक ऐसे तानाशाह के रूप में पेश करते थे जैसे कोहन के काल्पनिक पात्र 'डिक्टेटर' का चरित्र है. उन्होंने अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की परत चढ़ी प्रतिमा बनवाई थी जिसका मुख सूरज की तरफ था. हालांकि तुर्कमेनिस्तान की अधिकांश जनता गरीबी में जीवन जी रही थी, लेकिन नियाजोवने राजधानी में एक बर्फ का महल बनवाया और रेगिस्तान के बीचोबीच एक झील के निर्माण का आदेश दिया. उन्होंने अपने नाम पर शहर, पार्क बनवाए. यहां तक कि जनवरी महीने का नाम बदलकर उसका नामकरण अपने नाम पर कर दिया. वर्ष 1997 में धूम्रपान छोड़ने के बाद उन्होंने अपने सारे मंत्रियों को ऐसा ही करने को कहा था. उन्होंने नाटक, ओपेरा को तो प्रतिबंधित किया ही, साथ ही पुरुषों के लंबे बाल रखने पर प्रतिबंध लगा दिया. सद्दाम हुसैन की तरह ही उन्होंने एक किताब लिखी . रुखनामा तुर्कमेनिस्तान के इतिहास पर उनके विचारों का संग्रह है. स्कूल और विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया गया. 2006 में उनका निधन हो गया और 2011 में उनकी स्वर्ण प्रतिमा भी हटा दी गई. किम जोंग इल (1942-2011)किम जोंग इल खुद को कोरिया का प्रिय पिता कहलाना पसंद करते थे उत्तरी कोरिया के किम जोंग इल आधुनिक युग के तानाशाह माने जाते हैं. वो खुद को कोरिया का प्रिय पिता यानी डियर फादर कहलाना पसंद करते थे. किम जोंग इल ने अपनी सत्ता और ताकत का महिमामंडन के लिए सरकारी मीडिया का इस्तेमाल किया. आधिकारिक बयान के मुताबिक जब किम जोंग इल का जन्म हुआ तो आकाश में दो इंद्रधनुष और एक चमकता सितारा दिखाई दिए. और उनकी मृत्यु पर बर्फ से ढकी एक विशाल झील के दो टुकड़े हो गए. |
Saturday, May 12, 2012
पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाएं
Sunday, May 6, 2012
मनमानी का इलाज
| मनमानी का इलाज गरीबों के मुफ्त इलाज को लेकर निजी अस्पताल लंबे समय से आनाकानी करते रहे हैं। उन्हें बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी, इस शर्त पर कि वे अपने यहां कम से कम पचीस फीसद बिस्तर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित रखेंगे। उनकी जांच, आॅपरेशन, दवा आदि के मद में कोई पैसा नहीं लेंगे। मगर केंद्र सरकार के बार-बार अधिसूचना जारी करने, दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद उन्होंने नियम और शर्तों का पालन करना जरूरी नहीं समझा। बल्कि पिछले साल कुछ निजी अस्पतालों ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुहार लगाई कि उनके यहां कैंसर, हृदय रोग के इलाज जैसी विशिष्ट सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन रोगों का इलाज खासा खर्चीला है। ऐसे में गरीबों के लिए यानी पचीस फीसद मामलों में मुफ्त इलाज के प्रावधान से उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। तब सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार लगाई थी कि उन्हें ये बातें सस्ती दर पर जमीन लेने से पहले सोचनी चाहिए थीं। कुछ अस्पतालों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि जमीन आबंटन के समय गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त रखी ही नहीं गई थी। इस पर उच्च न्यायालय ने कहा है कि सस्ती दर पर भूखंड पाने वाला कोई भी अस्पताल इस तरह का कोई तर्क नहीं दे सकता। अदालत के इस आदेश से यह उम्मीद जगी है कि अब निजी अस्पतालों को सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करना ही होगा। पिछले हफ्ते संसद की लोकलेखा समिति ने सुझाव दिया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय एक ऐसा निगरानी तंत्र विकसित करे, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के निशुल्क इलाज संबंधी नियम और शर्तों के पालन में निजी अस्पतालों की मनमानी पर कड़ाई से नजर रखी जा सके। संसदीय समितियों की कई सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। लेकिन अदालत के आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि सरकार इस सुझाव पर अमल करे। निजी अस्पताल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का फायदा उठाते हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों, दवाओं, कुशल डॉक्टरों-नर्सों आदि के अभाव के चलते उनकी सेवाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर होता गया है। दूसरी ओर, निजी अस्पताल अपनी सेवाओं की मनचाही रकम वसूलते हैं। निजी स्कूलों को भी इस शर्त के साथ सस्ती दर पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी कि वे अपने यहां पचीस फीसद सीटें आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चों के लिए आरक्षित रखेंगे। मगर वे टालमटोल करते रहे। आखिरकार इस प्रावधान को शिक्षा अधिकार कानून में रखना पड़ा। निजी स्कूलों के मालिक-प्रबंधक फिर भी आनाकानी करते रहे और इस प्रावधान को उन्होंने अदालत में चुनौती दी। मगर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। साथ ही यह भी कहा कि निजी स्कूल गरीब बच्चों के लिए अलग से या अलग पाली में कक्षाएं नहीं लगा सकते। यह बात निजी अस्पतालों पर भी लागू होनी चाहिए, यानी सरकार को देखना होगा कि वे खैराती वार्ड जैसी कोई व्यवस्था न तलाश लें। चिकित्सा निरा व्यवसाय नहीं है। इससे मानवीय सरोकार हमेशा जुड़े रहे हैं। फिर निजी अस्पतालों से गरीबों के मुफ्त इलाज की अपेक्षा परोपकार के तौर पर नहीं की गई थी। उन्होंने रियायती दर पर जमीन पाने के लिए बाकायदा करार किया था। अगर वे इसका उल्लंघन करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने में सरकारों को संकोच नहीं करना चाहिए। मां को अधिकार देने की पहल हाल ही में योजना आयोग के दिए गए सुझाव को अगर वास्तविकता का जामा पहनाया जाता है, तो निस्संदेह भारतीय मां की परिस्थिति सामाजिक तौर पर सुदृढ़ होगी। एक लंबे समय से, समाज के संवेदनशील वर्ग द्वारा यह महसूस किया जा रहा था कि "भारतीय जननी" को कानूनी और सामाजिक तौर पर वह दर्जा हासिल नहीं हुआ, जोकि उसे मिलना चाहिए। इसी तथ्य को मद्देनजर रखते हुए मां को "फर्स्ट गार्जियन" (प्रथम अभिभावक) बनाने का प्रस्ताव योजना आयोग ने रखा है। अगर ऎसा हुआ, तो जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर स्कूल कॉलेज के एडमिशन फॉर्म समेत सभी सरकारी दस्तावेजों में "मां" का नाम ही मुख्य अभिभावक के रूप में दर्ज होगा। यह विडम्बना नहीं तो क्या है कि मां जो नौ महीने संतान को अपने खून से सींचती है, उसकी प्रथम अभिभावक नहीं होती। कुछेक कानूनी प्रावधानों के चलते मां अपने बच्चे की "वैधानिक अभिभावक" कहलाने की अधिकारिणी नहीं है। "हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट (1956)" की धारा 5-6 और "गार्जियन एण्ड वाड्र्स एक्ट (1980)" की धारा 19 को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है। इन कानूनों में नाबालिग बेटे या बेटी के पिता को ही वास्तविक अधिकारी या "नेचुरल गार्जियन" माना गया है। हां, यह बात अलग है कि विशेष परिस्थितियों में मां को बच्चे का अभिभावक बनाया जाता है, परन्तु विशेष परिस्थितियों की सत्यता सिद्ध करने के लिए न्यायालय का आश्रय लेना पड़ता है। विगत दशकों में भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक आमूलचूल परिवर्तन के साथ खड़ी हुई दिखाई दे रही है, विशेष कर आर्थिक तौर पर महिलाओं के सुदृढ़ीकरण ने समाज में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। शनै: शनै: ऎसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, जो विवाह के बंधन को न स्वीकारते हुए भी "मां" बनना चाहती हैं और इसके लिए वह कानूनन बच्चे गोद ले रही हैं और दूसरी ओर, सम्बन्ध विच्छेद की अवस्था में वो महिलाएं जो अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं, उनके लिए एक ऎसे आदमी के नाम का बार-बार जिक्र होना जिसके साथ अब वे नहीं रह रही हों, पीड़ादायक है। यह गौरतलब तथ्य यह है कि 17 फरवरी 1999 को उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय माता-पिता दोनों को ही समान रूप से संतान का अधिकारी बताया था। अपने बच्चे की देखभाल में अपना सर्वस्व अर्पित करने वाली मां अपने बच्चे के स्कूल या कॉलेज के एडमिशन फार्म पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती। इसी तरह के सवालों को लेकर "हिन्दू माइनरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट (1956)" की संवैधानिक वैधता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की गई। ऎसा कोई सामाजिक, आर्थिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है, जिसके कारण यह कहा जा सके कि महिला अपने बच्चे की अभिभावक बनने की अधिकारी नहीं है। अगर कोई ठोस तर्क नहीं है, तो क्यों एक मां को उसके अधिकार से वंचित किया जा रहा है? विगत वर्षो में उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णयों में देह व्यापार में संलग्न महिलाओं व उनके बच्चों के पुनर्वास पर गहरी चिंता व्यक्त की है। मानवीय आधार पर यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या देह व्यापार से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को स्वाभिमान से जीने का अधिकार नहीं है, जब भी ये बच्चे शिक्षा की ओर कदम बढ़ाकर आत्मनिर्भर होने का स्वप्न देखते हैं, तो उनकी मां स्कूल में एडमिशन के समय "पिता" के नाम के प्रश्न से भयभीत हो जाती है। हमें यह स्वीकारना ही होगा कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी क्यों न हों, मां अपने बच्चे की देखभाल पूर्ण समर्पण, त्याग और सक्षमता के साथ करती है, इसलिए एक स्त्री को जो दोयम दर्जे की स्थिति मिली हुई है, उसे योजना आयोग का यह प्रस्ताव पहले पायदान पर लाने की एक पहल है। जिम्मेदार कौन बगैर योजना के प्रशासन के नुमाइंदे कई बार ऎसी योजनाएं बनाते हंै, जिससे सरकार के साथ ही आमजन को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है। करीब सात साल पहले शासन ने रतनजोत से बॉयो-डीजल उत्पादन की योजना बनाई थी, तब कई निजी कंपनियां भी मैदान में कूद पड़ीं। कंपनियों ने किसानों को ललचाते हुए दो का पौधा 10 रूपए में बेचा। शासकीय अमले द्वारा भी लाखों की संख्या में रतनजोत के पौधे रोपे गए। अमले द्वारा रोपे गए पौधे जहां उदासीनता के चलते सूख गए। वहीं किसानों ने बड़े जतन से पौधों का रख-रखाव किया, लेकिन जब पौधे बीजोत्पादन करने लगे तो प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। तीन साल में जब बीजोत्पादन हुआ, तो बॉयो-डीजल संयंत्र नहीं लगे। यहां तक कि योजना के तहत जिन निजी कंपनियों ने भी बीज खरीदने का दावा किया था, वे भी भाग गई। सरकार ने भी रतनजोत के बीज खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं की। अधिकारियों ने यह कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली कि योजना ही बंद हो गई। यह ऎसा मामला है, जहां प्रशासनिक उदासीनता से न केवल किसानों की आस टूटी, बल्कि उनके जीवीकोपार्जन का एक अवसर भी हाथ से चला गया। सरकारी धन, जो अन्य विकास कार्यो में इस्तेमाल किया जा सकता था, वह भी बर्बाद हो गया। प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए। ऎसे में किसान ठगा महसूस कर रहे हैं। मंदसौर में बॉयो-डीजल प्लांट स्थापित करने की योजना एक बहुआयामी योजना थी, जिससे लाभ सरकार, जनता, पर्यावरण सबको होना था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। ऎसे में नई योजनाओं के क्रियान्वयन में किसानों की भागीदारी को फिर से प्राप्त करना एक मुश्किल काम हो जाता है, क्योंकि विश्वास एक नाजुक संवेदना होती है, जो किसान व सरकार के आपसी सहज संबंध को कायम रखने में बुनियाद का काम करती है। इसलिए प्रशासन को सचेत होकर नियोजन पर ध्यान देना चाहिए। |
इंसाफ की ओर
| इंसाफ की ओर अगर मानवाधिकारों का हनन होता हो, तो कोई भी व्यवस्था न लोकतांत्रिक कही जा सकती है न न्यायसंगत। इसलिए उच्चतम न्यायालय ने उचित ही समय-समय पर फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं को गंभीरता से लिया है। पथरीबल मामले में उसका फैसला इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है। इस फैसले ने आरोपियों को न्यायिक प्रक्रिया के घेरे में लाने का रास्ता साफ कर दिया है। बारह साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समय आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के छत्तीसिहंपुरा में छत्तीस सिखों की हत्या कर दी थी। चार दिन बाद इस जनसंहार के आरोप में सेना ने पांच लोगों को मार गिराया और उनके आतंकवादी होने का दावा किया। मगर सेना के इस दावे पर शुरू से सवाल उठते रहे। मारे गए लोगों की शिनाख्त के लिए राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। आखिर जांच से यह तथ्य सामने आया कि सैनिक अधिकारियों के हाथों मारे गए पांचों व्यक्ति साधारण गांववासी थे। परिजनों ने उनके लापता होने की एफआइआर दर्ज कराई थी। जब मुठभेड़ में उनके मारे जाने की खबर आई तो वे स्तब्ध रह गए। उनकी मांग पर शवों को कब्र से निकाल कर डीएनए जांच कराई गई। यह साबित हो गया कि ये शव उन्हीं लोगों के थे जिनके लापता होने की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। फिर इस मामले को 2003 में सीबीआइ को सौंप दिया गया। इसके तीन साल बाद विशेष अदालत में दायर किए गए आरोप पत्र में उसने साफ कहा है कि पचीस मार्च 2000 को पथरीबल में हुई घटना मुठभेड़ नहीं थी। पांचों व्यक्ति अनंतनाग और उसके आसपास से पकड़ कर लाए गए थे। उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाकर सुनियोजित तरीके से मार डाला गया। इसी तरह का एक वाकया असम के कामरूप जिले का भी है। इन दोनों मामलों में चूंकि सेना के अधिकारी आरोपी हैं, इसलिए मुकदमे की कार्यवाही बरसों से रुकी रही है। इस गतिरोध का एक आयाम सुरक्षा बल विशेषाधिकार अधिनियम से भी जुड़ा रहा है। इस अधिनियम के तहत किसी आपराधिक मामले में सैनिकों के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले केंद्र सरकार की इजाजत अनिवार्य है। इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई प्रश्न नहीं उठाया है, पर यह भी साफ कर दिया है कि आरोपियों को बख्शा नहीं जाएगा। उसने सैन्य प्राधिकरण से कहा है कि वह खुद तय कर ले कि कोर्ट मार्शल की कार्यवाही हो या सामान्य अदालत में मुकदमा चले। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि अगर सैन्य प्रतिष्ठान दो महीने में इस बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है तो वह मुकदमा चलाने की अनुमति पाने के लिए केंद्र सरकार से फरियाद करे। सीबीआई के अनुरोध पर सरकार को तीन महीने में निर्णय करना होगा। इस तरह एक लंबे कानूनी झगड़े का अंत हो गया है। पर पथरीबल की घटना के बारह साल बाद मामला सिर्फ इस मुकाम पर पहुंचा है कि न्यायिक प्रकिया शुरू करने की अड़चनें खत्म होती दिख रही हैं। जब-जब सुरक्षा बल विशेषाधिकार कानून के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आर्इं, सेना की ओर से यह दलील दी जाती रही कि आतंकवाद से निपटने के लिए यह कानून जरूरी है। पर इसमें सुरक्षा बलों के लिए विशेष प्रावधान कार्रवाई के दौरान होने वाली हिंसा को ध्यान में रख कर किए गए थे। जब सीबीआई जांच से फर्जी मुठभेड़ के आरोप की पुष्टि हुई, तो सेना ने कोर्ट मार्शल की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की? वैसा नहीं हुआ, तो केंद्र सरकार चुप क्यों बैठी रही? यह विचित्र है कि इतने अहम मामले में रक्षा मंत्रालय और सीबीआइ का रुख अलग- अलगरहा है। |